कुम्भ मेला और स्नान

कुम्भमेला का बहुत ही महत्व है और विशेषकर मौनी अमावस्या स्नान का | एक धारणा बना दी गयी है कि मौनी अमावस्या के स्नान से अश्वमेघ यज्ञ से दोगुना फल प्राप्त होता है | उसपर गंगा स्नान से सारे पापों से मुक्ति मिल जाती है | व्यक्ति मन व आत्मा से निर्मल हो जाता है |

अब चूँकि लोग वैज्ञानिक सोच के हो चुके हैं, तो वैज्ञानिक आधार भी खोज लिया गया कि कल्पवास से क्या क्या वैज्ञानिक कारक हैं जो लाभ पहुँचाते हैं | लेकिन जो लाभ सबसे अधिक लोगों को लुभाता है, वह यह कि पिछले पाप धुल जायेंगे, अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलेगा, मन निर्मल व निश्छल हो जाएगा और बिगड़े हुए काम बन जायेंगे |

लेकिन क्या वास्तव में कुम्भमेला जाने से, मौनी अमावस्या स्नान से कोई आध्यात्मिक या आत्मिक उत्थान होता है ? क्या मन निर्मल व निश्छल होता है ?

नहीं ऐसा कुछ नहीं होता | यदि ऐसा होता, तो कुम्भ मेला से लौटे लोग माँ-बहनों का मौखिक बलात्कार न कर रहे होते | यदि ऐसा होता तो लोगों की भाषा सभ्य व शालीन होती | यदि ऐसा होता तो नेता लोग सुधर गये होते क्योंकि वे कुम्भ मेला में स्नान अवश्य करते हैं | यदि ऐसा होता तो वे जेबकतरे सुधर गये होते जो लोगों की जेबें काटते फिरते हैं | वे ठग, वे बदमाश सुधर गये होते जो अपने पाप धोकर नयी उर्जा व जोश से लोगों को लूटने और ठगने पहुँचते हैं |

क्या बदलाव आता है ऐसे तीर्थ और स्नानों से व्यक्तियों के चरित्र व स्वभावों में ?

शायद कुछ भी नहीं |

मेरा कल्पवास कुम्भमेला पर

मैं स्वयं एक बार कुम्भ मेला गया था और दो महीने का कल्पवास भी किया था | लेकिन मेरा मन वहां बहुत ही खिन्न हो गया था | मुझे वहाँ की भीड़ सहन नहीं हो रही थी | मुझे वहाँ कुछ भी आध्यात्मिक जैसा दिखाई नहीं दे रहा था, हर तरफ राजनीती और व्यापार ही दिखाई दे रहा था |

जहाँ मेरा शिविर लगा था उसके पास ही आये दिन कोई न कोई हिंदुत्व का ठेकेदार नेता आकर भड़काऊ भाषण दे जाता था | सनातन धर्म जागृति संस्थान नामक शिविर में गया था मैं | वहां भी मैंने यही पाया की वे लोग मुस्लिमों के प्रति नफरत से भरे हुए थे | उनका मिशन केवल मुस्लिमों के विरुद्ध हिन्दुओं को भड़काना मात्र था | धार्मिकता के नाम पर जहर से भरे हुए लोग मुझे वहां मिले | साधू-संतों से भेंट हुई, कोई भी मुझे प्रभावित नहीं कर पाया क्योंकि वे मात्र भीड़ ही दिखाई दे रहे थे | और भीड़ के पास अपनी कोई विवेक बुद्धि नहीं होती |

वहीँ एक आश्रम है परमानन्द आश्रम | उस आश्रम के अध्यक्ष से मेरी बहुत ही अच्छी वार्ता हुई, उन्होंने मुझे अपने आश्रम में रहने की व्यवस्था की | वे चिंतित थे कि कुम्भ मेला की भूमि को भूमाफिया हथिया रहे रहे हैं | कई प्राचीन प्रतिमाएं वहां से लुप्त कर दी गयीं…लेकिन कुम्भ में आने वाले साधू-संतों को इन सब से कोई मतलब नहीं और न ही मतलब है कुम्भ में आने वाले श्रृद्धालुओं को | वे अकेले लड़ रहे थे | मैं जब तक वहां रहाँ उनकी सहायता करने का प्रयास करता रहा | साधू संतों से सहयोग के लिए कहा, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं पड़ी भूमाफिया के विरुद्ध कुछ कहने की, क्योंकि उसकी पहुँच बहुत ऊपर तक थी |

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तो मैं दो महीने वहाँ रहकर धर्म और अध्यात्म के नाम पर चल रहे तमाशे को देखा | यह समझ चुका था कि वहाँ किसी को कोई अध्यात्मिक या आत्मिक लाभ नहीं मिलता | क्योंकि जो लोग वहां से निकल कर जाते, उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता | उलटे पाप का बोझ उतर जाने से मन हल्का लगने लगता है और नए सिरे से नए पाप करने का जोश आ जाता है |

आप लोगों ने खबर भी पढ़ी होगी कि कई लोगों के पर्स गायब हुए, कई लोगों के सामान चोरी हुए क्योंकि चोर आदि भी नयी उर्जा से अपना कार्य कर रहे होते हैं |

केवल कुम्भ की ही बात नहीं है यह, जितने भी धार्मिक तीर्थस्थल हैं वे सभी अब निष्क्रिय हो चुके हैं | उनमें कोई शक्ति नहीं बची क्योंकि वहां सदियों से पापियों की भीड़ इकट्ठी होती रही और जहाँ भी इतनी भारी मात्रा में पापी इकठ्ठा होंगे वह स्थल शुद्ध व उर्जावान कैसे रह सकता है ?

कोई भी तीर्थ स्थल या धार्मिक स्नान किसी का आत्मिक या अध्यात्मिक उत्थान कैसे कर सकता है ?

यह वास्तव में चिंतन-मनन का विषय है कि जो समाज, जो परिवार किसी बच्चे को सही संस्कार नहीं दे पाता, जो उसे गाली-गलौज से मुक्त नहीं बना पाता, जो उसे सभ्य व शालीन नहीं बना पाता, वह समाज यह अपेक्षा रखता है गंगा मैय्या से कि वह उसके पाप धोकर उसे शुद्ध कर दे ? वह अपेक्षा रखता है कि तीर्थ स्थलों में जाने से कोई व्यक्ति निर्मल, निश्छल बनकर लौटेगा ?

क्या यह संभव है ?

बिलकुल नहीं | जो बिगड़ चुके हैं वे बिगड़ ही चुके हैं | किसी भी नदी के स्नान से, किसी भी तीर्थ यात्रा से उसे कोई लाभ नहीं मिलने वाला | हाँ लाभ उन्हें ही होगा जो वास्तव में स्वयं को रूपांतरित करने के दृढ़ निश्चय के साथ वहां पहुँचते हैं | किसी भी व्यक्ति को रूपांतरित तभी किया जा सकता है, जब वह स्वयं इच्छुक हो | अन्यथा इंसान तो क्या, भगवान् भी किसी को नहीं बदल सकता | यदि भगवान् में इतनी शक्ति होती कि किसी इंसान को बदल दे, तो वह नेताओं को बदल देता, वह धर्म व जाति के नाम पर समाज में नफरत फैलाने वालों को बदल देता, वह ठगों, बदमाशों को बदल देता….लेकिन जो अपराध कल थे वे आज भी यथावत चल रहे हैं और नए नए अपराधी अवतार लेते जा रहे हैं |

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आज स्थिति इतनी विकट हो गयी है कि थानों में पुलिस वाले पिट जाते हैं, सीबीआई खुद गिरफ्तार हो जाती है रिश्वतखोरी और नियमभंग करने के आरोप में | अपराधियों को सर आँखों पर बैठाया जाता है, उत्पातियों के सर पर नेताओं का हाथ रहता है | जबकि जो सच्चा है, जो ईमानदार है, उसे न समाज महत्व देता है, न ही सरकार | वह बेचारा दरिद्रता व कष्टों में जीता है बार बार दुत्कारा जाता है |

यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि जब कोई गाली-गलौज करे, तो कोई उसे नहीं कहेगा कि तुम गलत कर रहे हो, उलटे जो सही है, उसे ही सलाह देंगे कि तुम काहे इनके मुँह लगते हो ? शायद अधर्मियों के हितैषी धार्मिकों के हितैषियों से अधिक हैं | धर्म की आढ़ लेकर गुण्डागर्दी करने वालों के साथ, हत्याएं करने वालों के साथ हर कोई नजर आता है, लेकिन जो इनके विरुद्ध खड़े होते हैं, वे हमेशा अकेले ही पड़े नजर आते हैं |

फिर कहते हैं कि तीर्थों पर जाने से मौनी अमावस्या में स्नान करने से मन और आत्मा शुद्ध होती है | और यही है सबसे बड़ा ढोंग और पाखण्ड |

आध्यात्मिक व आत्मिक उत्थान की पहचान

यदि आपके भीतर कायरता, भीरुता का प्रभाव अधिक है, तो निश्चित मानिए कि आपका  आध्यात्मिक व आत्मिक उत्थान नहीं हो पाया | यदि आप किसी के साथ गलत होता देखकर भी चुप रह जाते हैं, अपनी नजरें चुराकर निकल जाते हैं, मौत का भय सताता है, तो निश्चित मानिए कि आपका आध्यात्मिक व आत्मिक उत्थान नहीं हो पाया | यदि आप दुनिया भर की पूजा पाठ, कर्मकाण्ड, भंडारे, भोज करवाते हैं, लेकिन अपने अधीनस्थों व आप पर निर्भर सदस्यों के साथ आपका व्यवहार अच्छा नहीं है, तो निश्चित मानिए कि आपका आध्यात्मिक उत्थान नहीं हो पाया | यदि आप बिना गालियों के सामान्य विरोध या तर्क भी नहीं रख पाते, तो निश्चित मानिए कि आपका आध्यात्मिक व आत्मिक उत्थान नहीं हो पाया | यदि आप धार्मिक स्थलों पर भी व्यापार, ठगी, धूर्तता से बाज नहीं आते, तो निश्चित मानिए कि आपका आध्यात्मिक व आत्मिक उत्थान नहीं हो पाया | यदि आप धूर्त, मक्कार नेताओं की संगत में रहते हैं यदि आप उनका समर्थन करते हैं, तो निश्चित मानिए कि आपका आध्यात्मिक व आत्मिक उत्थान नहीं हो पाया |

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आध्यात्मिक व जागृत व्यक्ति होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि बुरे लोगों के साथ उसे सदैव भला ही रहना है | उसे लक्ष्मीबाई भी बनना पड़ सकता है और महाराणाप्रताप भी, उसे अर्जुन भी बनना पड़ सकता है और श्रीकृष्ण भी, उसे दुर्वासा भी बनना पड़ सकता है और परशुराम भी….यदि अधर्मी उत्पात मचाने लगें, तो यह आवश्यक नहीं कि गौतम बुद्ध की नीति काम करे, वहां परशुराम और दुर्वासा की नीति भी अपनानी पड़ सकती है |

आध्यात्मिक होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह गाय बना डोलता रहे, गौतम बुद्ध बना डोलता रहे | आध्यत्मिक होने का अर्थ केवल इतना ही है कि हमारी वजह से किसी का अहित न होने पाए, जहाँ तक हो सके हमसे लोगों को कोई हानि न हो | लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हम किसी को यह अधिकार दे दें कि वह हमें हानि पहुँचाये, हमें हमारे ही घर से बेघर कर दे |

संतुलन होना चाहिए, न ही इतना नर्म कि कोई भी निगल जाये और न ही इतना कठोर कि हर कोई भयभीत हो जाए | आध्यात्म और आत्मिक ज्ञान संतुलन सिखाता है काम, क्रोध, लोभ, मोह का | ये चारों अश्व हैं जीवन संघर्ष के, इस दुनिया रूपी कुरुक्षेत्र के | इस जीवन को गतिमान रखने के लिए, आने वाले संघर्षों में विजयी होने के लिए काम, क्रोध. लोभ मोह नामक अश्वों की आवश्यकता है हमें | बस हमें इनका सदुपयोग करना आना चाहिए |

अन्यथा दुष्टआत्माएं हमें बिलकुल वैसे ही हानि पहुँचाएँगी जैसे अहिंसावादी बौद्धों को हानि पहुँचाई | यदि बोधिधर्मन ने ध्यान के साथ मार्शल आर्ट्स को न जोड़ा होता, तो शायद बौद्ध धर्म भी लुप्त हो चुका होता | तो गलत कुछ भी नहीं है, बस सदुपयोग होना चाहिए |

लेकिन यदि धार्मिकता के नाम पर आप अपनी कायरता छुपा रहे हैं या फिर धार्मिकता के नाम पर आप अपनी दुष्ट व विनाशकारी गुणों को प्रभुत्व दे रहे हैं, दूसरों को हानि पहुँचा रहे हैं, तो निश्चित मानिये आप ढोंग कर रहे हैं धार्मिकता का | फिर आप कुम्भस्नान करें या मौनी अमावस्या स्नान, कोई लाभ नहीं | फिर आप तीर्थों पर भटकें या मंदिरों मस्जिदों में, कोई लाभ नहीं | फिर आप गीता-क़ुरान के प्रकाण्ड विद्वान् बन जाएँ या फिर धार्मिक कर्मकांडों के, कोई लाभ नहीं |

यदि आपका व्यवहार, आपके गुणों में उत्थान नहीं हो रहा, आपके विचारों में उत्थान नहीं हो रहा, आप व्यक्तिगत स्वार्थों से मुक्त नहीं हो पा रहे, तो गहन चिंतन मनन की आवश्यकता है | क्योंकि आपका आध्यात्मिक व आत्मिक पतन हो रहा है |

~विशुद्ध चैतन्य


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