क्या समाज कभी सत्य, न्याय और धर्म के पक्ष में था ?

बचपन में जब किसी से मेरा झगड़ा हो जाया करता था, और गलती मेरी न भी होती तब भी मैं ही पिटता था | ऐसी ही एक घटना बताता हूँ आज:

मुझे ही नहीं मेरे सभी भाई बहनों को पुस्तकें पढ़ने का बहुत ही बुरा नशा था | पुस्तक किसी भी विषय की हो, फिर चाहे वह चंपक, नंदन, बिल्लू , पिंकी हो या शरतचंद, प्रेमचंद, जेम्स हेडली या कोई और हो | फिर वह इतिहास कि पुस्तकें हो या फिर किसी की जीवनी….हमें बस पढ़ने से मतलब होता था और कोई न कोई किताब हमारे हाथ में रहती ही थी |

मैं एक छोटी से लाइब्रेरी बनाई और अपने कालोनी के सभी बच्चों को उसकी जानकारी दी | पच्चीस पैसे एक कॉमिक्स के और उपन्यास या बड़ी किताबों के एक रूपये | शर्त यही थी कि घर नहीं ले जाना है वहीँ बैठकर पढ़ना है |

एक दिन एक लड़का जो कि मुझसे उम्र में दो तीन वर्ष बड़ा था और कद काठी में भी हट्टा कट्टा था | वह आया और मेरी सबसे प्रिय पुस्तक जो कि रशियन कथाओं की थी, वह देखने लगा | वह बहुत ही मोटी किताब थी, करीब ढाई सौ पेज की | उसी तरह की दो तीन किताबें और देखीं और अचानक उन सभी किताबों को बगल में दबा कर दौड़ पड़ा | मैं उसके पीछे भागा |

मेरे हाथ में कढ़ाई बुनाई करने वाला सुआ था क्योंकि मैं उस समय कढाई बुनाई सीख रहा था | वह फेंक कर मारा | उससे उसे चोट लग गयी लेकिन वह रुका नहीं | शाम को उसके माता पिता हमारे घर आ धमके |

न तो उन्होंने मेरी कोई बात सुनी और न ही अपने लड़के की गलती मानी, मुझे ही दोषी कहने लगे, पुलिस की धमकी देने लगे | मेरे पिताजी ने भी मुझसे कुछ नहीं पूछा और सीधे उन्हीं के सामने मुझे पीटने लगे |

ऐसी बहुत सी घटनाएं मेरे जीवन में घटित हुईं | क्या आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था ?

बहुत ही दुर्लभ होंगे ऐसे लोग जो यह कहें कि उनके साथ ऐसा नहीं हुआ, अर्थात उनके माता-पिता ने कभी भी उनके साथ अन्याय नहीं किया | और कोई बच्चा भला न्याय और अन्याय कैसे जान पायेगा ? उसे तो बस इतना ही पता होता है कि किसी अपने ने उसे मारा है तो बुरा नहीं मानना चाहिए | अपने तो जब भी पीटते हैं तो भले के लिए ही पीटते हैं | लेकिन क्या वास्तव में उस बच्चे का कोई भला होता है ? क्या कभी माता-पिता ने आत्मचिंतन किया कि बच्चे के कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ा होगा और भविष्य में उसका क्या असर होने वाला है उसपर

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शायद कोई भी माता-पिता नहीं इस विषय पर चिंतन-मनन नहीं करते | उन्हें अधिकार है कि वे अपने बच्चों को मारे-पीटें या भूखा रखें….ये उनकी अपनी उपज है अपनी संपत्ति है…बिलकुल वैसे ही जैसे किसान की फसल किसान की संपत्ति होती है | न्याय अन्याय का ज्ञान तो माता-पिता को भी नहीं होता और उनके माता-पिता को भी नहीं था | तो भला न्याय-अन्याय पर चिंतन मनन करेगा कौन ?

ऐसी ही फसल जब दंडाधिकारी बनते हैं, तो उन्हें भी न्याय अन्याय का कोई ज्ञान नहीं होता | उन्हें तो बस कागजी कार्यवाही पूरी करनी होती है, रस्म-अदायगी करनी होती है, बाकि न्याय हुआ या नहीं हुआ से कोई मतलब नहीं होता | उनकी किताबों के अनुसार जो न्याय है वही न्याय माना जाएगा चाहे न्याय न हुआ हो |

न्याय क्या है और अन्याय क्या है ?

भारत में बच्चे पैदा करना उतना ही स्वाभाविक प्रक्रिया है, जितना कि अनाज पैदा करना | और एक किसान अनाज की गुणवत्ता को महत्व नहीं देता, बस उसे इतना ही पता होता है कि अच्छा खाद और पानी डालो तो अच्छी फसल मिल जायेगी | उसे जैविक और कैमिकल युक्त खेती के लाभ हानि का भी कोई ज्ञान नहीं | उसे तो अच्छी लहलाती फसल दिखनी चाहिए, क्वांटिटी में अधिक होनी चाहिए पिछले वर्ष के मुकाबले और कुछ नहीं देखना उसे |

इसी प्रकार माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश करते हैं | बस अधिक से अधिक खाना खिला देना, पानी पिला देना, दूध-दही खिला देना, किसी प्राइवेट स्कूल में दाखिला करवा देना और परीक्षा में उसके बढ़ते मार्क्स देखकर खुश होना और पढ़ाई पूरी होने पर नौकरी दिलवा देना, मोटा दहेज़ ले देकर विवाह करवा देना…बस हो गया माता-पिता का दायित्व पूरा | बचा क्या बना, कैसा बना वह सब सोचने की फुर्सत नहीं किसी एक पास, क्योंकि सभी की लाइफ बहुत व्यस्त है |

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तो न्याय अन्याय की समझ विकसित ही नहीं हो पाती देश व समाज की प्रथम इकाई में | यह सब देखकर कुछ ऐसे उद्गार उठते हैं मेरे मन में:

क्या आप सात्विक, धार्मिक, सभ्य, शांतिप्रिय व्यक्ति कहलाना चाहते हैं ?

क्या आप चाहते हैं कि आप हर किसी के हृदय में वास करें, हर कोई आपको गले लगाना चाहे, हर लड़की आप पर न्योछावर होना चाहे यदि आप मर्द हैं तो और हर लड़का आपके लिए अपनी जान कुर्बान करना चाहे यदि आप लड़की हैं तो ?

क्या आप चाहते हैं कि मरने के बाद भी लोग आपको शान्ति और अमन का देवता मानकर पूजते रहें ?

तो अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध मौन धारण कर लें ! उत्पातियों, दंगाइयों, गालीबाजों, माँ-बहनों के मौखिक बलात्कारियों को खुली छूट देकर अपनी आँखें मूँद लें |धूर्त मक्कार नेताओं की चाटुकारिता करें, उनकी स्तुति वंदना करें |

मेरे एक मित्र का एक पोस्ट मेरे सामने आया, वह भी पढ़ लीजिये और उसके बाद एक और पोस्ट है उसपर भी एक नजर डाल लीजिये…फिर आगे बढ़ते हैं:

मित्र के पोस्ट में भी यही प्रश्न छुपा है कि गलत का विरोध करने पर लोग गलत करने वाले के बचाव में क्यों उतर आते हैं गलत का विरोध करने वाले के हितैषी बनकर ? जबकि ऐसा बहुत ही कम देखने मिलता है कि गलत करने वाले के समर्थन में तो लोग खुलकर सामने आ जाते हैं, माता-पिता ही नहीं, पूरा परिवार व समाज भी साथ खड़ा हो जाता है | और कई बार तो बड़े बड़े नेता भी खड़े हो जाते हैं साथ…लेकिन गलत का विरोध करने वाले के साथ हमेशा कायर व डरे हुए लोग ही खड़े नजर आते हैं और वह भी अप्रत्यक्ष रूप से गलत करने वाले का बचाव ही करते पाए जाते हैं | केवल इस भय से कि कहीं हमारे अपने के साथ कुछ बुरा न हो जाए | जबकि गलत करने वाले के समर्थक इस बात की कोई चिंता नहीं करते कि उनके साथ कुछ बुरा हो सकता है क्योंकि वे गलत के समर्थन में खड़े हैं, वे अन्याय के समर्थन में खड़े हैं, वे अधर्म के समर्थन में खड़े हैं |

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ऐसा क्यों ?

परिणाम फिर सामने आता है कुछ वैसा ही जैसा कि न्यूज़ लिंक में अपने पढ़ा | परिणाम सामने आते हैं फिर वैसे ही जैसे कि आये दिन हमें पढ़ने मिलता है कि कहीं किसी का गुंडों ने आगजनी की तो कहीं मोबलिंचिग की भीड़ ने | ये सब लोग क्या आसमान से टपकते हैं यदि आपका समाज धार्मिक है, सभ्य है, और आपके धार्मिक ग्रन्थ अपराध, अराजकता, वैमनस्यता, द्वेष व घृणा का पाठ नहीं पढाता ?

कारण वही है कि न्याय व अन्याय का भान नहीं है, ज्ञान नहीं है, संस्कार नहीं है…बचपन से ही नहीं सिखाया या समझाया गया कि न्याय क्या है | बस न्याय के नाम पर मार-पीट दिया बिना अपराध जाने केवल दूसरों के आरोप लगाने मात्र भर से | फिर न्याय का अर्थ यह भी नहीं होता कि एक ही लाठी से सभी को हांकी जाए, एक ही तरह की सजा सभी पर लागू की जाए | क्योंकि सजा देते समय आयु, परवरिश व परिस्थियों का भी आकलन किया जाना चाहिए | लेकिन जब न्याय और अन्याय का ही कोई भान नहीं, ज्ञान नहीं तो बाकी सब बातों पर चिन्तन मनन करेगा कौन ?

न्याय क्या है अन्याय क्या है वह जानेंगे आगे, उससे पहले कुछ और प्रश्न उठा लेते हैं:

क्यों अधर्म हावी रहता है धर्म पर ?

क्यों आजीवन ऐश्वर्य भोगता है अधर्म, जबकि धर्म घुट-घुट कर जीता है जीवन भर ?

क्यों धर्म की जीत हमेशा अंत में ही होती है, जब अधर्म बूढ़ा कमजोर और लाचार हो जाता है ?

क्यों असत्य हावी रहता है असत्य पर ?

क्यों आजीवन ऐश्वर्य भोगता है असत्य, जबकि सत्य घुट-घुट कर जीता है जीवन भर ?

क्यों सत्य की जीत हमेशा अंत में ही होती है, जब असत्य बूढ़ा कमजोर और लाचार हो जाता है ?


उपरोक्त सभी प्रश्नों के उत्तर छिपे हैं न्याय और अन्याय क्या है प्रश्न के उत्तर में | सबसे पहले हमें समझना होगा कि न्याय क्या है और अन्याय क्या है ?

क्रमश:

To be continued….

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बहुत ही सही और सार्थक पोस्ट
दुखद बात ये है कि माता पिता अपने बच्चों की तुलना फसल से करते हैं।