खुली सोच या खुले में शौच

कई बरस पहले एक आर्यसमाजी उपदेशक व प्रचारक के घर ठहरना हुआ मेरा | बहुत ही आदर सम्मान के साथ उन्होंने मेरे ठहरने की व्यवस्था की | लेकिन जब देर रात मुझे अचानक शौच जाने की आवश्यकता पड़ी तो, उन्होंने घर में बने शौचालय की बजाय, मुझे बाहर खेत में भेज दिया | खैर रात की बात थी और चांदनी रात थी मुझे कोई बुरा भी नहीं लगा | लेकिन सुबह सुबह फिर खेत में….

मुझे बहुत ही असुविधा हुई, क्योंकि रात मच्छरों ने मेरी हालत वैसे ही खराब कर दी थी, और सुबह मक्खियों ने दिमाग खराब कर दिया था | ऊपर से गाँव के कई स्त्री-पुरुष भी खेतों में बिखरे पड़े थे | मैं उनसे कहा कि जब घर में शौचालय है, तब खेतों में क्यों जाना पड़ता है ? क्या शौचालय खराब है ?

प्रचारक महोदय बोले, “नहीं नहीं शौचालय तो बिलकुल ठीक है…लेकिन सुबह सुबह खुले में शौच जाने से विचारों में खुलापन आता है | सुबह की ताज़ी हवा दिमाग से स्वस्थ रखती है, शरीर में चुस्ती फुर्ती बनी रहती है | घर में जो शौचालय है वह घर की स्त्रियों के लिए ही बनाई गयी है | बाकी यदि आपको सुबह खेतों में जाने में असुविधा होती है तो आप घर का शौचालय प्रयोग कर सकते हैं | वैसे मेरी तो सलाह यही है कि खेतों में ही जाना चाहिए शौच के लिए |इससे खेतों को खाद भी मिल जाता है और व्यक्ति निरोगी भी रहता है | मुझे देख लो, साठ पार कर चुका हूँ, लेकिन आज के नौजवानों से अधिक चुस्त दुरुस्त हूँ | कभी दिन में नहीं सोता, सारे दिन काम करता हूँ, बिना थके | फिर दूर दूर की यात्रायें भी करता हूँ, धर्म का प्रचार करता हूँ, किताबें लिखता हूँ…इतना सब करता हूँ और कभी शरीर में सुस्ती नहीं आती |”

मैंने कहा कि आपकी आप जाने, मुझे तो घर का ही शौचालय प्रयोग करना होगा, अन्यथा मुझे विदा लेना पड़ेगा यहाँ से | उस दिन से जब तक उनके पास रहा, घर का ही शौचालय प्रयोग करने लगा, बाहर खेतों में कभी नहीं गया |

खुले में शौच से दिमाग नहीं खुलता

होता यह है कि सुबह सुबह जब आप खुली हवा में निकलते हैं, खेतों, जंगलों के बीच से गुजरते हैं, तब ऑक्सिजन की मात्रा अधिक मिलती है, क्योंकि वातावरण स्वच्छ होता है | वाहनों का शोर नहीं होता, धूएँ और धुल की मात्रा बहुत ही कम होती है | और यदि सुबह सुबह ही शरीर स्वस्थ वातावरण में निकलता है तो स्वाभाविक ही है कि शरीर में तरोताजगी बनी रहती है | लेकिन खुले में शौच करना दिमाग के खुलेपन की पहचान नहीं है |

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खेतों में शौच से खाद बनता है यह सही है, लेकिन आपको यह भी देखना चाहिए कि आज मानव शौच कई केमिकलों से युक्त होता है | आज अधिकांश मानव एलोपैथिक दवाओं पर निर्भर है | किसी को कोई बिमारी, तो किसी कोई बिमारी और उन सभी बीमारियों की अलग अलग दवाएं | तो मानव शौच में उन सभी दवाओं का कुछ न कुछ अंश अवश्य रह जाता है | और यही दवाओं का मिश्रण, खेतों की उपज के साथ वापस मानव को प्राप्त होता है | अब आप स्वयं सोचिये, जो बिमारी आपको है ही नहीं, उससे सम्बंधित दवाएं आप को मिल जाएँ तो क्या कोई लाभ होगा ?

लाभ कि सम्भावना तो कम ही है, नयी नयी बीमारियाँ और घेर लेंगी | फिर जो मक्खियाँ आपके शौच में बैठती हैं, वही आपके शरीर पर भी बैठती हैं और अपना हाथ पैर आपके ही शरीर में साफ़ करती हैं | जरा सोचिये आपका ही शौच कोई आपके ही शरीर में पोंछे तो कैसा लगेगा ? यही काम मक्खियाँ बड़े प्रेम से करती हैं इसीलिए आपको बुरा नहीं लगता |

लेकिन अब जरा चिंतन-मनन करियेगा इस विषय पर | निश्चित ही आपको बुरा लगेगा और तब आपका दिमाग खुलेगा नहीं, फटने लगेगा | और यदि आपमें विवेक हुआ तो निश्चित मानिए आप यह स्वीकार लेंगे कि खुले में शौच से दिमाग नहीं खुलता, बल्कि दुनिया भर के रोगों का मार्ग खुलता है |

शौचालय और उनका महत्व

शौचालय हमारे दैनिक जीवन का उतना ही महत्वपूर्ण अंग है, जितना रसोई और शयनकक्ष | क्योंकि जिस प्रकार भूख और नींद समय पर न हो, तो व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है, ठीक उसी प्रकार शौच यदि समय पर न हो तो भी शरीर अस्वस्थ हो जाता है |

यात्रा के समय स्त्रियाँ पानी का सेवन कम करती हैं, ताकि पेशाब न जाना पड़े | यह बहुत ही घातक व्यवहार है | पानी की कमी से यात्रा सुखमय नहीं, कष्टमय हो सकता है और कई बार मंजिल अस्पताल बन जाता है |

तो शौचालय अपने घर पर ही बनवाएं और बिलकुल उतना ही महत्व देकर, जितना कि रसोई और शयनकक्ष को महत्व देकर बनवाया जाता है |

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मैंने तो कई मंदिरों में भी देखा है कि मंदिर तो बहुत ही आलिशान बनवाया, लेकिन शौचालय एक भी ढंग का नहीं | न कोई साफ़ सफाई, न ही कोई देख-रेख करने वाला | इससे पता चलता है कि मंदिर बनवाने वाले मानसिक रूप से उन्नत नहीं हो पाए |

मुझे थाईलैंड जाने का सौभाग्य मिला | मैंने वहाँ जो साफ़ सफाई देखी वह मुग्ध कर देने वाला था | लोगों का जो व्यवहार व अपनापन देखा वह भी मुझे मोहित कर गया था | और सबसे बड़ा आश्चर्य मुझे यह हुआ देखकर कि वहाँ हाईवे पर भी जगह जगह शौचालय बने हुए हैं और वे भी इतने साफ़ सुथरे कि ऐसा लगता है अभी नए नए बनाये गये हैं |

वहां एक चिल्ड्रन्स पार्क में गया था घुमने वहां शौचालय को वनस्पतियों से सजाया गया है, साफ़ सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है | वहां साधू संन्यासियों से शौचालय प्रयोग करने के पैसे नहीं लिए जाते | जबकि हमारे देश में तो साधू-संन्यासियों से भी पूरी कीमत वसूली जाती है |

लेकिन हमारे देश में शौचालयों को महत्व नहीं दिया जाता | हम आज भी शौचालय के विषय में वही आदिमयुगीन मान्यता पाले बैठे हैं | अब चूँकि देश के आम नागरिक ही शौचालय को लेकर जागरूक नहीं हैं, तो फिर ऐसे ही मंद्बुध्दी नागरिकों द्वारा चुने गये नेता व सरकार जागरूक कैसे हो सकती है ?

फिर हर काम के लिए सरकार पर निर्भर रहना भी ठीक नहीं | सरकार में अधिकाँश व्यापारी ही शामिल होते हैं, और उन्हें तो हर काम धंधा ही नजर आता है, उन्हें तो हर काम का कमिशन और रिश्वत चाहिए होता है |शौचालय पर भी नेता लोग घोटाले कर जाते हैं, शौचालय को भी वे लोग कमाई का जरिया बना लेते हैं |

होना तो यह चाहिए था कि सरकार जगह जगह निःशुल्क शौचालयों की व्यवस्था करे, साफ़ सफाई पर ध्यान दे | तभी सड़कों के किनारे खड़े होकर लोगों को पेशाब करने से रोका जा सकता है | लेकिन ऐसा होता नहीं, इसीलिए समाज को स्वयं ही परस्पर सहयोगिता से समस्या का समाधान निकालना चाहिए |

केवल लोगों को सड़कों पर पेशाब करने से रोकने का आदेश देना या उनपर जुर्माना लगाना कोई न्यायसंगत नहीं है | समाज को, सरकार को मिलकर शौचालयों की व्यवस्था करनी होगी और केवल व्यवस्था ही नहीं, उनकी साफ़ सफाई पर भी नियमित ध्यान देना होगा |

कई बार मुझे सार्वजनिक शौचालयों पर जाना पड़ता है, तब मुझे बहुत ही परेशानी होती है | इतनी बुरी स्थिति होती है शौचालय कि उल्टियाँ आने लगती है | लेकिन कोई और विकल्पं नहीं होता, तो हमें वहीं निपटना पड़ता है | कहीं और की बात छोड़िये, हमारे देवघर के मार्किट में जो शौचालय है, उसकी ही इतनी बुरी हालत होती है कि कोई उसमें घुसना भी नहीं चाहता | सब बाहर ही खड़े होकर पेशाब कर लेते हैं |

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और आश्चर्य की बात यह कि आसपास बड़े बड़े व्यापारी हैं आसपास, लेकिन उन्हें तक शर्म नहीं आती | लाखो रूपये पूजा पाठ के नाम पर खर्च कर देंगे, लेकिन उनके ही मार्किट के शौचालय, जिसे उन्हें और उनके ही ग्राहकों को प्रयोग करना है, उसकी देख रेख व सफाई के लिए फूटी कौड़ी खर्च नहीं करते |

हर काम के लिए सरकार को दोष नहीं दे सकते, समाज भी बराबर का दोषी होता है | वे सभी दोषी हैं जो शौचालयों के महत्व को नहीं जानते, वे पढ़े-लिखे लोग भी दोषी हैं जो समाज को जागृत नहीं करते | गाँव, मोहल्ले, कॉलोनी के नागरिक और मुखिया सभी दोषी हैं यदि उनके क्षेत्र में सड़कों के किनारे शौचालय और मूत्रालय नहीं हैं |

खुले में शौच करने की बजाय, खुली सोच के बनिए | शौचालयों को महत्व दीजिये, खुले में शौच करने वालों पर डंडा चलाने की बजाय, समस्याओं को खोजिये, उन समस्याओं को दूर करने के लिए यथोचित कदम उठाइए | जहाँ समाज के लोग स्वयं ही समस्या सुलझा सकते हैं, वहां समाज स्वयं सुलझाये, जहाँ सरकार का काम है, वहाँ सरकार पर दबाव बनाइये |

यदि आप लोगों को रोकते हैं खुले में शौच या मूत्र त्याग से, तो फिर यह समस्या नहीं सुलझेगी | पहले व्यवस्था बनाइये, लोगों को बताइये कि कहाँ-कहाँ शौचालयों की व्यवस्था है | सड़कों पर बोर्ड लगाकर दिशा बताइये, ताकि जो अत्यधिक प्रेशर में है, वह इधर उधर भटकने की बजाय, समय पर शौचालय तक पहुँच पाए |

आवश्यकता पड़े तो रैलियाँ निकालिए, हर घर में जाइए, उन्हें जगाइए, होश में लाइए | लेकिन जब तक समाज व सरकार स्वयं कोई सार्थक कदम नहीं उठाते मिलकर, तब तक खुले में पेशाब या शौच करने पर दण्डित करना समस्या का समाधान नहीं है | यह बिलकुल वैसी ही बात होगी, जैसे किसी भूखे को रोटी उपलब्ध करवाने की बजाये उसे चोरी न करने की नसीहत देना |

~विशुद्ध चैतन्य

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