व्यक्तिगत विषय है ईश्वर की भक्ति, इसे तमाशा न बनाएँ

ईश्वर की भक्ति भिन्न भिन्न प्रकार से की जाती हैं, जैसे कि पूजा, प्रार्थना, कीर्तन, भजन, आरती, ध्यान, नमाज….आदि | ईश्वर की भक्ति पुर्णतः व्यक्तिगत विषय है और ईश्वर से संपर्क बनाने का एक माध्यम | भक्ति भाव और भावनाओं पर आधारित है और ईश्वर को आपकी भावनाओं से सरोकार होता है | ईश्वर से संपर्क बनाने का श्रेष्ठ माध्यम है ध्यान | आप ध्यान की कोई भी विधि अपना सकते हैं | भजन-कीर्तन सक्रिय ध्यान की श्रेणी में आते हैं यदि भजन-कीर्तन के समय आपकी एकाग्रता दिखावे की बजाये भक्ति में हो, समर्पण में हो |

लेकिन मैं देखता हूँ कि अधिकांश लोगों ने दिखावों को ही भक्ति समझ लिया | होड़ लग जाती है भक्ति के नाम पर प्रदर्शन की, कौन कितना बड़ा भक्त है, कौन कितना अधिक खर्च कर सकता है, कौन कितना बड़ा आडम्बर कर सकता है…बस इसी होड़ को भक्ति समझ बैठे हैं कुछ लोग | कुछ लोग लाऊड स्पीकर से शोर मचाते हैं, अपना बेसुरा राग गला फाड़ फाड़कर गाते हैं और अपनी ही नहीं, दूसरों कि भी नींद खराब करते हैं |

फरवरी का महिना चल रहा है तो जगह जगह कोई न कोई आयोजन हो रहे हैं | हमारे ही गाँव में तीन फरवरी से छः फरवरी तक हनुमान जन्मोत्सव मनाया गया | पड़ोस के कथावाचक पंडित जी ने बहुत ही बड़ा आयोजन किया था | बड़े बड़े नेता और सरकारी अधिकारी आमंत्रित थे | लाउड स्पीकर उन्होंने भी लगवाया था, लेकिन शोर अधिक नहीं किया | बस कथा के समय कथा सुनाते पूरे गाँव को लाउडस्पीकर से, अन्यथा दिन भर शास्त्रीय संगीत बजता रहता जो कि कानो को प्रिय लगता है | इन्होने फूहड़ फ़िल्मी गानों की धुनों पर बने भजन नहीं चलाये और रात होते ही लाउड स्पीकर बंद कर देते थे |

अक्सर लोग मुझसे कहते हैं कि आपके लिखने से क्या फर्क पड़ता है ? क्या कोई बदलाव होता है ?

तो उत्तर है कि हमारे ही गाँव में यह जो बदलाव आया यही प्रमाण है | बहुत समय पहले मैंने सरस्वती पूजा पर एक व्यंग्य लिखा था, जिसपर मैंने सरस्वती पूजा पर फ़िल्मी गाने चलाने पर कटाक्ष किया था | ऐसे ही कई पोस्ट लिखे समय समय पर, जिसपर मैंने लाऊड स्पीकर से शोर करने को गलत बताया था | हमारे गाँव में यह जो बदलाव देखने मिला, शायद उसी का परिणाम हो | या यह भी हो सकता है कि मेरा कोई लेख पंडित जी ने नहीं भी पढ़ा हो, उनकी अन्तः प्रेरणा से ही ऐसा संभव हुआ हो | जो भी हो बदलाव तो आया ही |

लेकिन हमारे अड़ोस पड़ोस के गाँव के लोगों में कोई बदलाव नहीं आया था | वे वैसे ही पूरी रात डीजे सिस्टम लगाकर शोर मचाते रहते थे भक्ति के नाम पर |

कल कुछ रामनामी तीर्थ यात्री लाऊडस्पीकर पर रामनाम जपते हुए हमारे आश्रम में आ गये | वे हर वर्ष आते हैं और यहीं ठहरते हैं | और हर वर्ष उनके साथ इस बात को लेकर बहस होती थी कि रात को लाउड स्पीकर न चलायें | वे इसे अपनी भक्ति का अपमान समझते थे, लड़ने मरने पर आमादा हो जाते थे | फिर हमें यही कहना पड़ता था कि ठीक है आप लाऊड स्पीकर बंद मत करें, लेकिन थोड़ी आवाज कम कर लें | वे थोड़ी देर आवाज कम करके रखते, लेकिन जैसे ही हम सोने चले जाते, वे आवाज फिर बढ़ा देते थे और हमारी नींद खराब करते थे |

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मैं रात में ध्यान करता हूँ या फिर लिखता पढ़ता रहता हूँ चूँकि स्वभाव से निशाचर हूँ | दिन में सोना पसंद करता हूँ क्योंकि दिन में मेरे लिए कोई काम नही रहता | तो रात में जब लाउड स्पीकर चल रहा होता है, तब मुझे बहुत ही परेशानी हो जाती है | न तो ध्यान कर पाता हूँ और न ही कुछ लिख पढ़ पाता हूँ |

तो इस बार जब रामनामी आये तो आश्रमाध्यक्ष आश्रम में हैं नहीं, मेरे ही ऊपर सारी जिम्मेदारी थी | मैंने अपने अधिकारों का प्रयोग किया और आदेश पारित किया कि आश्रम में रात में लाऊडस्पीकर नहीं चलेगा | लेकिन सन्देश उनतक कुछ और पहुँचा | रामनामी भक्तों से कहा गया कि राम नाम का जाप बंद कर दो, स्वामी जी ने आदेश दिया है |

स्वाभाविक ही है कि वे तिलमिला गये | स्वामी जी कौन होते हैं हमें राम नाम का स्मरण करने से रोकने वाले ? क्या पागल हो गये हैं बाबाजी ?

पड़ोस के गाँव का एक ग्रामीण जो कि आश्रम का एक सेवक भी है, दौड़ता हुआ मेरे पास आया और बोला, “बाबाजी आप पागल हो गये हैं क्या ? आखंड राम नाम का जाप कर रहे हैं वे लोग, और आप उन्हें जाप बंद करने के लिए कह रहे हैं ?”

मैंने कहा कि मैंने कब कहा कि राम नाम का जाप बंद कर दो ? मैंने तो केवल यही कहा कि स्पीकर बंद कर दो |

वह बोला कि स्पीकर कैसे बंद सकते हैं ? और स्पीकर से आपको क्या समस्या है ? अगर ऐसे हर किसी के पसंद न पसंद से कोई भक्ति करने लगे तो भक्ति हो ही नहीं सकती | हमारे गाँव (उसका गाँव हमारे ही पड़ोस में है, जहाँ डीजे लगाकर शोर मचाया जा रहा था) में तो चार चार डीजे लगा रखे हैं | अब क्या उन्हें भी बंद करवा सकते हैं ? आपको पसंद नहीं है स्पीकर की आवाज तो क्या वे बंद कर दें स्पीकर ?

मैंने कहा कि बैठ यहाँ समझाता हूँ कि स्पीकर और भक्ति का क्या सम्बन्ध है |

भक्ति क्या है, पूजा क्या है, नाम जाप क्या है जानता है ?

वह चुप रहा

मैंने कहा कि ये सब व्यक्तिगत विषय हैं कोई तमाशा करने की चीज नहीं | ईश्वर के प्रति भक्ति का अर्थ होता है अपने ईश्वर से संपर्क करना, उसे अपनी समस्या कहना या कृतज्ञता व्यक्त करना | अब ईश्वर और भक्त के बीच का कोई विषय है, उसके लिए दुनिया में ढिंढोरा क्यों पीटना ? क्यों दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि हम बहुत बड़े भक्त हैं ?

फिर ईश्वर तक अपनी भक्ति पहुँचाने के लिए लाउडस्पीकर कि जरूरत थोड़े ही पड़ती है ? पहले जब लाऊड स्पीकर नहीं होते थे, तब भक्त अपनी भक्ति, अपनी पूजा ईश्वर तक कैसे पहुँचाते थे ? क्या स्पीकर नहीं होगा तो ईश्वर तक आवाज नहीं पहुंचेगी ?

तो ये जो लाउडस्पीकर लगाकर, शोर मचाकर भक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं, ये सभी ढोंगी हैं | इनको न तो ईश्वर से कोई सरोकार है और ना ही कोई भक्ति है ईश्वर में इनकी | इन्हें तो दुनिया को दिखाना है कि ये बहुत बड़े भक्त हैं और जितना अधिक शोर मचाएंगे, जितना महँगा और शोर करने वाला डीजे लगायेंगे, उतने बड़े भक्त कहलायेंगे | ये दिन भर माँ बहनों की गालियाँ बकेंगे और लाउडस्पीकर पर फ़िल्मी भजन चलाएंगे | दिन में जितनी बार ये अपने अराध्य का नाम नहीं जपेंगे, उससे कई गुना अधिक तो गालियां बकेंगे |

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इसीलिए ही मैं लाऊडस्पीकर लगाकर नामजाप करने वालों को ढोंगी पाखण्डी मानता हूँ | इन्हें गुस्सा आ जाता है, जब लाऊडस्पीकर बंद करने के लिए कहा जाता है | क्योंकि इनकी भक्ति ईश्वर के प्रति नहीं, लाउडस्पीकर के प्रति है | ये लाउडस्पीकर लेकर घूम ही इसलिए रहे हैं, ताकि दुनिया को बता सकें कि ये बहुत बड़े भक्त हैं | वास्तविकता ये स्वयं ही जानते हैं कि इनकी कोई भक्ति नहीं है ईश्वर के प्रति | वरना नाम जाप करने के लिए लाऊडस्पीकर और माइक की नहीं, एकान्त की आवश्यकता होती है, शांति की आवश्यकता होती है |

अब मैं ईश्वर की आराधना करता हूँ, लेकिन क्या कभी देखा है तुमने मुझे कोई पूजा पाठ करते हुए ?

वह बोला: “नहीं, हम तो आपको नास्तिक ही मानते हैं”

मैंने कहा कि यदि मैं नास्तिक होता, तो आश्रम में क्यों रहता भगवा डालकर ? यदि मैं ईश्वर की अराधना नहीं करता, उनपर विश्वास नहीं करता, तो क्या बिना आर्थिक सहयोग के आश्रम में रह पाता ? क्या आश्रम मुझे कोई पैसा देता है, या गाँव के लोग ही मुझे पैसा चढ़ाते हैं ?

वह बोला, “नहीं”

मैंने कहा कि फिर भी मेरी आर्थिक समस्याएं दूर हो ही जाती हैं न ?

वह बोला, “हाँ”

लेकिन ये लोग जो लाउडस्पीकर चलाकर शोर मचा रहे हैं, उनसे जाकर पूछो, दुनियाभर का कर्जा होगा उनके सर पर, घर में कोई न कोई बीमारी घेरे ही रहती होगी, किसी का कोर्ट कचहरी का चक्कर फंसा होगा…है कि नहीं ?

बोला: “हाँ ऐसा ही है” |

तो इससे यह प्रमाणित हो गया कि इनकी कोई भक्ति नहीं है ईश्वर के प्रति | ये केवल दिखावा कर रहे हैं भक्त होने का | जो ईश्वर का भक्त होता है वह कभी दूसरों की नींद खराब नहीं करता, वह कभी दूसरों को कष्ट देने का विचार भी मन में नहीं ला सकता | जबकि लाउडस्पीकर से शोर मचाने वाले कभी भी दूसरों की चिंता नहीं करते | उन्हें तो शोर मचाने में ही आनंद आता है और यह एक प्रकार की हिंसा ही है | इन्हें दूसरों को कष्ट पहुँचाकर आनन्द मिलता है | और ऐसे लोगों की सहायता करना तो दूर, ईश्वर इनकी सुनता ही नहीं | ईश्वर कहता है कि तेरी भक्ति तो दूसरों को दिखाने की थी, तो सहायता भी उन्हीं से माँग जिसे तू अपनी भक्ति दिखा रहा था, जिनकी नजरों में तुझे बड़ा भक्त दिखने की चाह थी, उन्हीं से सहायता भी माँग |

ईश्वर तो उसी दिन सुनेगा, जिस दिन दूसरों को दिखाने की बजाये शान्ति से उससे संपर्क करेगा, एकान्त में उसे पुकारेगा, वह मिलेगा, सुनेगा और समस्याओं का हल भी करेगा | बाकी जितना भी शोर मचा लो, जितने भी महँगे लाऊड स्पीकर लगा लो, ईश्वर नहीं सुनने वाला | लाऊड स्पीकर होता ही है दूसरों को सुनाने के लिए न कि ईश्वर को सुनाने के लिए | लाऊडस्पीकर केवल प्रदर्शन के लिए होता है, दूसरों तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए होता है | इसे दिन में चलायें अपनी बात या विचार पहुंचाने के लिए प्रयोग करें कोई आपात्ति नहीं है | लेकिन रात में प्रयोग करना सिवाय मूर्खता के और कुछ नहीं |

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“अब बात समझ में आयी या नहीं ?”

वह बोला: “जी समझ में आ गया”

तो अब जा जाकर लाऊड स्पीकर बंद करवा रामनामियों से | उन्हें कहना कि मैं उनके नाम जाप के विरोध में नहीं हूँ, केवल स्पीकर के विरोध में हूँ | मुझे रात में ध्यान करना होता है, लिखना पढ़ना होता है | और फिर यह आश्रम है साधू-संन्यासियों के रहने का स्थान | यहाँ साधू-संन्यासियों के नियम ही लागू होंगे बाहरी लोगों के शोर करने के लिए नहीं होते आश्रम | यहाँ साधू संन्यासी ही नियम तय करेंगे, बाहरी लोगों के नियम यहाँ लागु नहीं होंगे | उन्हें शोर करना ही है, तो फिर कहीं और ठिकाना खोजें, आश्रम में ठहरने नहीं दिया जाएगा |

वह गया, और जाकर उन्हें समझाया | तुरंत ही लाउडस्पीकर बंद कर दिया उन्होंने बिना किसी विरोध के | लेकिन मुझे आश्चर्य तब हुआ जब वह सेवक अपने गाँव पहुँचा और थोड़ी ही देर बाद उसके गाँव के डीजे भी बंद हो गये | रात भर बड़ी शांति रही, हाँ दूर गाँव के लाऊडस्पीकर की हलकी आवाज फिर भी आ ही रही थी |

तो गाँव के एक अनपढ़ व्यक्ति को समझाया प्रेम से | उसने अपनी भाषा में जाकर शोर मचाने वालों को समझाया और बिना किसी विवाद के स्पीकर बंद हो गये |

अब मैंने तय किया है कि एक नोटिस बोर्ड लगाऊंगा अपने आश्रम में जब भी कभी इतना पैसा आ जाये पोस्टर या बोर्ड बनवाने लायक | जिसमें लिखा होगा:

रात्री 9:00 बजे से प्रातः 9:00 बजे तक लाऊडस्पीकर प्रतिबंधित है आश्रम में
प्रतिबन्ध का कारण:

१: अड़ोस पड़ोस के ग्रामीण दिन भर कठोर श्रम करते हैं, रात्री उनके विश्राम के लिए होता है | अपने स्वार्थ के लिए उन थके हुए ग्रामीणों की नींद खराब न करें |

२. ईश्वर कि भक्ति या नाम जाप भक्त का व्यक्तिगत विषय होता है | उसे व्यक्तिगत ही रहने दें, तमाशा न बनाएं |

३. इस समय आप बाजार में नहीं, आश्रम में हैं और आश्रम साधू-संन्यासियों के ध्यान साधना का केंद्र होता है | आपको आश्रम में आश्रय मिला है तो इसका दुरूपयोग न करें और साधू-संन्यासियों के एकान्त व शांति को भंग करके पाप का भागी न बनें |

४. आश्रम परिसर में ऊँची आवाज में बातें न करें और न ही शोर मचाएं | क्योंकि ऐसा करना आश्रम कि मर्यादा के विरुद्ध होता है | और आप लाऊड स्पीकर चलाकर आश्रम की मर्यादा ही भंग कर रहे हैं |

५. यदि आपकी भक्ति वास्तव में ईश्वर के ही प्रति है, तो ईश्वर को दिल से पुकारें, लाऊडस्पीकर से नहीं | और यदि लाउडस्पीकर से पुकार रहे हैं तो आप ईश्वर को नहीं, उन लोगों को पुकार रहे हैं जिन्हें आप लाउडस्पीकर लगाकर सूना रहे हैं | ईश्वर को आपकी आवाज तब भी सुनाई दे जाती है, जब आपका पड़ोसी भी नहीं सुन पाता | अर्थात यदि आप अपने मन में भी ईश्वर को पुकारेंगे तो ईश्वर तक आपकी आवाज पहुँच जाएगी |

६: लाऊड स्पीकर वास्तव में ईश्वर तक आवाज पहुँचाने के लिए बने ही नहीं थे | इनका आविष्कार तो अपने अड़ोस पड़ोस तक अपनी आवाज पहुँचाने के लिए हुआ था | तो स्पीकर का सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं |

निवेदक: विशुद्ध चैतन्य
(संन्यासी, लीलामंदिर आश्रम)


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बिल्कुल सही स्वामी जी।