सेक्युलरिज्म, कम्युनलिज्म, दड़बा संस्कृति और सनातन धर्म

यह एक ऑरेंज यानी भगवा रंग का जैकेट है । यह उतना ही भगवा है, जितना धार्मिकों में धार्मिकता | जितना सत्य व न्याय के प्रति धार्मिकों की निष्ठा |

बिल्कुल इसी तरह धार्मिकता, सत्य व न्याय, प्रेम, सहयोगिता से रंगा हुआ होता है हिंदुत्व और दुनिया के आसमानी, हवाई क़िताबों पर आधारित, मज़हबें, पंथ और रिलीजन ।

यही कारण है कि अधर्मियों, अपराधियों, अराजक तत्वों का प्रभुत्व है, उन्हीं के अधीन जीना पड़ता है धार्मिकों व सत्य की राह पर चलने वालों को । वे ही आपको नेता देते हैं और उन्हीं में से किसी को अपना नेता चुनना पड़ता है ।

और फिर गाल बजाते फिरते हैं कि धर्म बुरा नहीं होता कुछ धार्मिक लोग बुरे होते हैं । और ये जो कुछ थोड़े से धार्मिक बुरे लोग होते हैं वे उतने ही थोड़े से हैं, जितना थोड़ा सा काला रंग है इस जैकेट में ।

यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि इंसान को अपनी पार्टी, अपने नेता, अपने समाज, अपने सम्प्रदाय के दोष नहीं दिखाई देते | सामान्य छोटे मोटे दोषों की बात नहीं कर, उन दोषों की बात कर रहा हूँ, जिनके आधार पर वे दूसरे समूह, सम्प्रदाय या पार्टियों को दोषी बताते हैं, उन्हें गालियाँ देते हैं, भ्रष्ट कहते हैं और स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं |

यह भी बहुत ही आश्चर्य की बात है कि अपने ही समाज या पार्टी के दोषों को दूर कर पाने में असमर्थ समाज, सभ्य व धार्मिक लोग, दूसरे समाज से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे दोषों को दूर कर लें | नीचे कुछ समाचारों के लिंक दे रहा हूँ उन्हें देखिये फिर आगे बढ़ते हैं:

ये जो भी समाचार आपने देखें ऊपर, ये सभी सामान्य समाचार हैं, और हर दिन इसी प्रकार के समाचार किसी न किसी समाचार पत्रों में छपते रहते हैं | लेकिन समाज इस भ्रम में जीता रहता है कि समाज में अधिकांश धार्मिक हैं, केवल कुछ लोग गलत हैं | वास्तविकता बिलकुल उस ओरेंज जैकिट जैसी ही है | किसी ने टोपी लगा ली, किसी ने तिलक लगा लिया, किसी ने भगवा गमछा डाल लिया, या किसी ने भगवा धोती ही लपेट लिया और हो गया धार्मिक | और ये उतना ही धार्मिक होते है, जितना कि पोस्ट के शुरू में दिया जैकेट भगवा है |

लोग कहते हैं कि इस्लाम बड़ी तेजी से फ़ैल रहा है | कुछ लोगों का मानना है कि आरएसएस तेजी से फ़ैल रहा है | कुछ लोगों का कहना है हिदूसेना, बजरंगदल, मोदीसेना, हिन्दुवाहिनी सेना आदि तेजी से फ़ैल रहे हैं….

सभी का दावा है कि लाखों की संख्या में लोग उनके दड़बे में शामिल हो रहे हैं | कारण क्या है ?

आप सभी से जानना चाहता हूँ कि इन दडबों में शामिल होने पर क्या सेलेरी मिलती है ? क्या भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आर्थिक तंगी, भुखमरी से मुक्ति मिलती है ? क्या भूमाफियाओं के आतंक से मुक्ति मिलती है ? क्या इनमें शामिल होने के बाद इन्सान कमीनापन छोड़कर, इंसान बन जाता है ?

वास्तव में धार्मिकता केवल तिलक टोपी, गमछा, धोती में ही सिमट कर रह गया, इंसान तो धार्मिक कभी हुआ ही नहीं | जो धार्मिक होते हैं, उन्हें इन सब आडम्बरों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, वे किसी भी रंग के कपड़े में हों, कैसे भी रहते हों, वे धार्मिक ही रहेंगे | लेकिन जो धार्मिकता का ढिंढोरा पीटते हैं, शोर मचाते हैं अपनी धार्मिकता का लाउडस्पीकर के माध्यम से, या धर्म के नाम पर भीड़ इकट्ठी करके, उनमें से कोई धार्मिक नहीं होता |

क्योंकि ये बड़ी संख्या में भीड़ इकट्ठी करने वाले, लाउडस्पीकर से अश्लील फ़िल्मी गानों के धुनों पर भजन बजाने वाले, धार्मिक उत्सवों में डीजे पर फूहड़ गाने चलाने वाले, गुंडों-मवालियों और लुच्चों लफंगों की टोलियाँ बनाकर माँ-बहनों का मौखिक बलात्कार करके धर्म की रक्षा करने वाले और ऐसे लुच्चों-लफंगों का समर्थन करने वाले और इन्हें पैदा करने वाले कोई भी धार्मिक नहीं हैं | इनका मौन समर्थन करने वाले सबसे बड़े ढोंगी और पाखण्डी हैं |

दड़बा संस्कृति

बुरा लगता है धार्मिकों को जब मैं इन तथाकथित धार्मिको के समूह को दड़बा शब्द से संबोधित करता हूँ | क्यों बुरा लगता है ??

दड़बा नहीं तो और क्या हैं ये सब ?

दड़बा सामान्यतः उस छोटे से घर को कहा जाता है, जिसमें मुगियों को रखा जाता है |

दड़बा (hen house)

क्या इससे अलग होता है आपका धर्म या मजहब या पंथ ?

जितने भी मजहब या धर्म हैं, सभी इसी दडबों की तरह हैं, सिवाय सनातन धर्म के | सभी दडबों के मालिक होते हैं, ठेकेदार होते हैं और हर दड़बे में लड़ाकू मुर्गे-मुर्गियाँ भी होतीं हैं | जिन्हें कुछ लोग लड़ाने का शौक भी रखते हैं | अलग अलग दडबों के मुर्गों को लड़ाया जाता है, उनकी हार जीत पर सट्टा लगाया जाता है और बेचारे मुर्गे आपस में ही लड़कर एक दूसरे को लहू-लुहान कर देते हैं या मौत के घाट ही उतार देते हैं | लोग तालियाँ बचाते हैं, पैसे कमाते हैं |

READ  गुरु, परम्परा, धर्म और धार्मिकता

कभी सोचा है इस विषय में ?

धर्म के नाम पर आपको लड़ाया जाता है, पूरा वातावरण बनाया जाता है और आप लोगों को होश ही नहीं रहता…बिलकुल इन दडबों में रहने वाले मुर्गों की तरह | उन मुर्गों को भी यही सिखाया जाता होगा कि तेरा दड़बा महान है, तेरे दड़बे का मालिक महान है, बाकि सभी दड़बे निकृष्ट हैं | और दड़बे मालिक भी कौन, वे जो इन्हें मुर्गों की तरह लड़ाते हैं, नफरत भरते हैं इनके दिलों में दूसरे दडबों के प्रति |

फिर एक ही दड़बे में कई दड़बे और खड़े हो जाते हैं जैसे कि शिया, सुन्नी, कांग्रेस, भाजपा, ब्राह्मण, दलित, जाट, जाटव….आदि | इनमें भी अमीर गरीब का दड़बा | और दडबों कि मानसिकता इतनी गहरी बैठ गयी कि जब सनातन धर्म की बात करता हूँ तो छूटते ही कहते है कि यह भी तो दड़बा है |

और जब सनातनी सभी दडबों की कमियाँ बताना शुरू करते हैं, उन्हें सही राह पर लाने का प्रयास करते हैं, आपस में नफरत भूल एक करने का प्रयास करते हैं तो सभी दुश्मन हो जाते हैं | यानि नफरत इन्हें इतनी प्यारी ही कि मिल जुलकर रहने की बात करने वाला इन्हें शत्रु दिखाई देने लगता है, किसी अलग ग्रह का प्राणी दिखाई देने लगता है |

इन दडबों की सबसे बड़ी कमी यह होती है कि इन्हें सारी बुराई दूसरों के दडबों में ही दिखाई देती है | अपने दडबों की बुराइयाँ इन्हें जीते जी तो दिखाई नहीं देती, मरने के बाद का कह नहीं सकता |

इन्हें दिखाई नहीं देता अपने ही दड़बे में भूख से मरते लोग, अपने ही दडबों में बैठे धर्म व जाति के नाम पर उत्पात मचाते लोग….और फिर डायलॉग मारते हैं कि कुछ लोगों के बुरे हो जाने से धर्म बुरा नहीं हो जाता | जबकि धर्म कहते ही उसे हैं जो बुरा न हो, जिससे किसी को कष्ट न पहुँचता हो, जिससे कोई निर्दोष पीड़ित न होता हो, जिससे न्याय होता हो, सुख मिलता हो, शांति स्थापित होती हो, वही धर्म कहलाता है | लेकिन ये लोग अपने ही दडबों में बैठे अधर्मियों का बचाव करते हैं और कहते हैं कि धर्म बुरा नहीं होता |

जबकि सनातन धर्मियों को हर बुराई स्पष्ट दिखाई देती है और वह भी साम्प्रदायिक दीवारों, कुओं, तालाबों को भेदकर | वह किसी भी गलत को हिन्दू-मुस्लिम के तराजू में नहीं तोलता, वह केवल गलत को ही गलत कहता है और यह अपेक्षा करता है कि समाज उन बुराइयों को दूर करे |

जो धर्म के पक्ष में न हो, जो अधर्मियों से भयभीत हो, जो अधर्मियों का साथ देता हो, जो अधर्मियों के अधर्म को देखकर भी अनदेखा करता हो, जो धूर्त मक्कार नेताओं के पक्ष में खड़ा होता हो, जो अत्याचारियों के पक्ष में खड़ा होता हो, वह कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता | लेकिन इन दडबों ने बचाव का रास्ता निकाल लिया | दडबों को ही धर्म घोषित कर दिया और अब शान से कहते हैं कि कुछ बुरे लोगों की वजह से धर्म बुरा नहीं हो जाता | वास्तविकता यह है कि दड़बा यानि सम्प्रदाय, या पंथ…धर्म नहीं है | केवल समूह है एक ही मान्यताओं को मानने वालों का | और इन समूहों में अच्छे और बुरे दोनों ही मिलेंगे | लेकिन इन्हें धार्मिक नहीं कहा जा सकता | क्योंकि बुरे लोगों की संख्या अधिक ही रहती है इन दडबों में और कुछ गिने चुने लोगों को छोड़कर बाकी तथाकथित सभ्य लोग मौन समर्थक होते हैं बुरे लोगों के | बस कुछ ही होते हैं जो बुरे लोगों का विरोध करते हैं और ऐसे लोग सभी दडबों में पाए जाते हैं | लेकिन ये होते दडबों के कैदी ही हैं मुक्त नहीं हो पाते |

तो मैं दड़बा कहता हूँ इन समूहों को आप धर्म कहते हैं और कुछ लोग कम्युनलिज्म कहते हैं | लेकिन धर्म नहीं है यह निश्चित है

सेक्युलरिज्म और सनातन धर्म

सेक्युलरिज्म की परिभाषा:
Secularism is a system of social organization and education where religion is not allowed to play a part in civil affairs.

रिलिजन की परिभाषा:
Religion is belief in a god or gods and the activities that are connected with this belief, such as praying or worshipping in a building such as a church or temple.

READ  ...फिर कहते हैं कि सरस्वती की पूजा हमारे देश में होती है और विद्वान अविष्कारक विदेशों में पैदा होते हैं

सेक्युलरिज्म सनातन धर्म नहीं है लेकिन उसका समकक्ष अवश्य है | हिंदी में सेक्युलरिज्म को धर्मनिरपेक्षता कहा गया | धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ धर्म से विमुख होना नहीं, बस उससे अप्रभावित रहना होता है | धर्मनिरपेक्षता में धर्म अर्थात सम्प्रदाय है न कि धर्म | सम्प्रदायों को ही धर्म की संज्ञा दे देने के कारण सबकुछ गड़बड़ हो गया | यह बिलकुल वैसी ही स्थिति हो गयी, जैसे किसी मुर्ख द्वारा विकलांगों को दिव्यांग की उपाधि दे देने से हुआ | कभी दिव्यांग या दिव्यांगी नाम रखा जाता था अपने बच्चों का बड़े प्रेम से, अब कोई अपने बच्चों का नाम दिव्यांग या दिव्यांगी नहीं रखेगा |

जिसने विकलांग को दिव्यांग कहा, उसे भाषा ज्ञान नहीं था | और जो उसका समर्थन किये, वे नम्बर एक के चापलूस थे | और जब चापलूसों से भरा हुआ देश होगा, तब भाषाओँ की दुर्दशा इसी प्रकार होती रहेगी |

तो रिलिजन का अर्थ हुआ किसी विशेष मत, या पंथ को माननेवालो का समूह | जबकि धर्म बहुत व्यापक है अर्थात यह किसी मत-मान्यताओं पर आधारित नहीं है और न ही किसी समूह से बंधा हुआ है | धर्म के दस लक्ष्ण बताये गये हैं और ये दसों लक्ष्ण सम्प्रदायों, समूहों के दायरे से बाहर हैं | अर्थात ये सभी में पाए जाते हैं बिन किसी भेद भाव के | जैसे दया, करुणा, प्रेम, त्याग, क्षमा….आदि | ऐसा नहीं है कि कोई मुसलमान है तो वह इन सबसे अछूता रहेगा या कोई हिन्दू है या मुस्लिम है तो यह इन सबसे अछूता रहेगा | सभी में प्रेम होता है, करुणा होता है, दया होता है, क्षमा करने की प्रवृति होती है |

धर्म किस मान्यताओं का समूह नहीं है…दया, करुणा, प्रेम, त्याग….आदि कोई मान्यताएँ नहीं हैं जैविक स्वभाव हैं और चाहे इन्सान हों या पशु, सभी इससे परिचित हैं |

सेक्युलरिज्म में अच्छी बात यह है कि वह साम्प्रदायिकता से मुक्त है | सेक्युलर होने का अर्थ मात्र इतना है कि आपकी जो भी मान्यताएँ हों, हमें उससे कोई परेशानी नहीं, जब तक हमें आप जानबूझकर परेशान न कर रहे हों | सेक्युलर को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका दोस्त हिन्दू है या मुस्लिम है या सिख है या इसाई है….वह सभी के साथ समभाव से मिलेगा | वह अपने दोस्त के साथ मंदिर भी चला जायेगा और मस्जिद भी चला जाएगा भले वह स्वयं कोई पूजा पाठ न करता हो या किसी मत विशेष की मान्यताओं पर विश्वास न करता हो |

लेकिन जब सेक्युलरिज्म के नाम पर भी दड़बा मानसिकता हावी हो जाए, तब वह मूर्तीपूजकों को पीटेगा, नमाज करने वालों को पीटेगा…और वही सब करेगा जो बाकी दडबों के लोग करते हैं|

लेकिन जब हम सनातनी होने की बात करते हैं, तो वह सेक्युलरिज्म से बहुत ऊपर की स्थिति हो जाती है | सनातनियों का बैर किसी से नहीं होता लेकिन सभी उसके बैरी होते हैं | क्योंकि सनातनी सभी सम्प्रदायों के दोषों को सामने लाता है, लोगों को समझाता है कि यह गलत है, यह धर्म नहीं है, इसे सुधार लो | इससे तुम्हारे ही समाज को हानि हो रही है, तुम्हे ही हानि हो रही है….लेकिन साम्प्रदायिक समाज इसे अपना अपमान समझता है, अपने धर्म का अपमान समझता है, क्योंकि उसे धर्म का ही कोई ज्ञान नहीं |

सनातनी इसलिए भी बुरे बन जाते हैं क्योंकि वे जिस भी दड़बे के अंतर्गत आते हैं, उसके भी दोष निकालना शुरू कर देते हैं | यदि वे मुस्लिम हैं तो मुस्लिम समाज के दोष निकालने लगेंगे, यदि हिन्दू हैं तो हिन्दुओं के….उद्देश्य उनका केवल इतना ही होता है कि वे समाज को सही राह पर ला सकें | लेकिन समाज उनका शत्रु बन बैठता है बजाय समझने और अपने दोषों को दूर करने के |

सनातनी इसलिए भी बुरे बनते हैं क्योंकि वे सभ्य व धार्मिकों की तरह मौन धारण किये नहीं रहते अधर्मियों, अत्याचारियों के भय से | और चूँकि सनातनी मौन धारण करके शरीफ, सभ्य या धार्मिक होने का ढोंग नहीं करते, इसलिए समाज को लगता है कि इनकी वजह से आफत हमारे ही सर आने वाली है | ये तो मरेगा ही, हमें भी मुसीबत में डाल जाएगा | इसलिए सभी दडबों के धार्मिक व सभ्य लोग सनातनियों के विरोधी हो जाते हैं |

यही कारण है कि सनातनी बहुत ही दुर्लभ प्राणी होते हैं…बहुत ही कम पाए जाते हैं | क्योंकि अधिकांश या तो मार दिए जाते हैं या फिर उनकी आवाज ही दबा दी जाती है |

READ  रक्तबीज की अवधारणा को समझने के लिए हमें पहले रक्तबीज को समझना होगा

सनातनियों के विषय में बहुत ही भ्रान्ति है कि सनातनी कोई पंडित-पुरोहित टाइप का व्यक्ति होता होगा | वास्तविकता यह है कि सनातनी किसी भी देश में, किसी भी भेष में, किसी भी सम्प्रदाय में जन्म ले सकता है | उसकी पहचान केवल इतनी ही है कि वह गलत को गलत ही कहेगा और अधर्मियों से भयभीत होकर चुप नहीं रहेगा | जैसे कबीर, जैसे शम्स, जैसे तबरेज़ी, जैसे दाराशिकोह, जैसे नानक, जैसे जीसस, जैसे लक्ष्मीबाई, जैसे अशफाकुल्ला खान, जैसे बिस्मिल्लाह खान, जैसे राणाप्रताप, शिवाजी, भगतसिंह…..यानि जो भी अत्याचारियों, अधर्मियों के विरुद्ध निडरता से खड़ा होता है, वह सनातनी है | और जो सनातनी है वही धार्मिक है | क्योंकि धार्मिक व्यक्ति भेदभाव से मुक्त हो जाता है, साम्प्रदायिक संकीर्णता से मुक्त हो जाता है | धार्मिक व्यक्ति वह कभी नहीं हो सकता, जो अपराधियों, घोटालेबाजों, देश के लुटेरों, झूठे वादे करने वालों, साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वालों, समाज को आपस में ही लड़ाने वालों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से साथ देता है या मौन सहमती देता है | जिसे मौत का भय होता है वह भी धार्मिक नहीं क्योंकि उसे ईश्वर पर ही विश्वास नहीं | वह अधर्मियों को ईश्वर से अधिक ताकतवर समझता है, इसीलिए अधर्मियों से डरता है |

और स्मरण रखें: साम्प्रदायिक कट्टरता धर्म नहीं है, न ही साम्प्रदायिकता कोई धर्म है | अपने समाज का सम्मान करना, उसकी परम्पराओं का पालन करना, निभाना शिष्टाचार है सभ्यता है | लेकिन दूसरे समाज का निरादर करना, उनकी मान्यताओं का अपमान करना, उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करना शिष्टाचार नहीं है | और जिसमें शिष्टाचार न हो, जिसमें शालीनता न हो, जो माँ-बहनों का मौखिक बलात्कारी (Oral Rapist) हो, वह कदापि धार्मिक नहीं हो सकता | और जो धार्मिक ही न हो पाए, वह सनातनी होने का सपना भी नहीं देख सकता | क्योंकि सनातनी होने के लिए बहुत ही बड़ा हृदय चाहिए | इतना बड़ा कि समस्त ब्रह्माण्ड उसमें समा जाए |

मेरे इतने बड़े लेख से भी यदि कुछ न समझ आया हो, तो यह कहानी पढ़ लीजिये:

दत्तात्रेय के जीवन में उल्लेख है। भीख मांगने एक द्वार पर दस्तक दी। घर में कोई न था; एक कुवाँरी लड़की थी। माता-पिता खेत पर काम करने गये थे।

उस कन्या ने कहा: “आप आए हैं, माता-पिता यहां नहीं, आप दो क्षण रुक जायें तो मैं चावल कूट कर आपको दे दूं, और तो घर में कुछ है नहीं। चावल कूट दूं, साफ-सुथरे कर दूं, और आपकी झोली भर दूं।’

तो दत्तात्रेय रुके। उस कन्या ने चावल कूटने शुरू किए तो उसके हाथ में बहुत चूड़ियां थीं, वे बजने लगीं। उसे बड़ा संकोच हुआ। यह शोरगुल, यह छन-छन की आवाज, साधु द्वार पर खड़ा–तो उसने एक-एक करके चूड़ियां उतार दीं। धीरे-धीरे आवाज कम होने लगी। दत्तात्रेय बड़े चौंके। आवाज धीरे-धीरे बिलकुल कम हो गई, क्योंकि एक ही चूड़ी हाथ पर रही।

फिर जब वह उन्हें देने आई चावल तो उन्होंने पूछा कि एक बात पूछनी है: “पहले तूने चावल कूटने शुरू किए तो बड़ी आवाज थी, फिर धीरे-धीरे आवाज कम होती गई, हुआ क्या? फिर आवाज खो भी गई!’

तो उस लड़की ने कहा कि सोच कर कि आप द्वार पर खड़े हैं, आपकी शांति में कोई बाधा न पड़े, मुझे बड़ा संकोच हुआ, चूड़ियां हाथ में बहुत थीं तो आवाज होती थी, फिर एक-एक करके मैं निकालती गई। आवाज तो कम हुई, लेकिन रही। फिर जब एक ही चूड़ी बची तो सब आवाज खो गई।

तो दत्तात्रेय ने यह वचन कहा:

वासो बहूनां कलहो भवेद्र्वात्ता द्वयोरपि।
एकाकी विचरेद्विद्वान कुमार्या इव कंकणः।।

कहा कि जैसे कुंवारी लड़की के हाथ पर चूड़ियों का बहुत होना शोरगुल पैदा करता है, ऐसे ही जिसके चित्त में भीड़ है, बड़ी आवाज होती है। जैसे कुंवारी लड़की के हाथ पर एक ही चूड़ी रह गई और शोरगुल शांत हो गया, ऐसे ही जो अपने भीतर एक को उपलब्ध हो जाता है, भीड़ के पार, भीड़ जिसकी विसर्जित हो जाती है–वह भी ऐसी ही शांति को उपलब्ध हो जाता है।

कहा: “बेटी तूने अच्छा किया! मुझे बड़ा बोध हुआ।’

जिसे बोध की तलाश है, उसे कहीं से भी मिल जाता है। जिसे बोध की तलाश नहीं है, वह बुद्ध-वचनों को भी सुनता रहे, ठीक बुद्ध के सामने बैठा रहे, तो भी कुछ नहीं है। बांसुरी बजती रहती है, भैंस पगुराती रहती है; उसे कुछ मतलब नहीं है।

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of