स्वार्थियों के भगवान

भगवान् शब्द पंचतत्वों (भ = भूमिं + ग = गगन + व = वायु + अ = अग्नि + न = नीर) के प्रथमाक्षरों से बना है और सारे कर्मकांड व पूजापाठ का प्रयोजन यही था कि हम इन्हें समझ सकें और इनके साथ समन्वय बैठा सकें | लेकिन भय, लोभ और स्वार्थ हम पर हावी हो गया और हम उन्हें भगवान् मान बैठे जिनसे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है | धर्म स्वार्थ के लिए और भगवान् स्वार्थ के लिए बदले और बनाये जा रहें हैं |

लोगों को शिकायत है कि सचिन को भगवान कहने में क्यों आपत्ति है ? सचिन का तो कोई स्वार्थ नहीं है !

नहीं कोई आपत्ति नहीं है ! लेकिन क्या सचिन वास्तव में आपका भगवान् है ? क्या सचिन वास्तव में देश के लिए खेल रहा था या सट्टेबाजों के लिए खेल रहा था ? चलिए मान लेते हैं कि सचिन आपका भगवान् है, लेकिन सचिन से आपको लाभ हुआ या पेप्सी, कोक जैसे मल्टीनेशनल कंपनी को ? मीडिया को ? राजनीतिज्ञों को ? सट्टेबाजों को ? व्यापारियों को…? जरा दिमाग पर जोर डाल कर सोचिये !!! मैच फिक्सिंग से किसको लाभ होता था ?

जितने आधुनिक भगवान् हैं वे केवल अपना वह कार्य कर रहें हैं जो उन्हें प्रिय हैं और जिससे उन्हें मान-सम्मान व समृद्धि प्राप्त होती है | और यह सब प्राप्त होता है पैसे से जिसके लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी होती है और जो कुछ भी उन्हें प्राप्त होता है वे उसके हकदार होते हैं | इसमें कोई विशेष बात नहीं है | आप भी यदि उनके ही तरह लगन से काम करते तो आप को भी वही सब प्राप्त होता जो उन्हें प्राप्त है | लेकिन आप लोगों ने उन्हें भगवान् बना दिया | आप लोगों ने भगवान् को ही मजाक बना दिया केवल मीडिया और व्यापारियों के बहकावे में आकर | होश में आइये और स्वयं के भीतर सो रहे भगवान् को जगाइए | ~विशुद्ध चैतन्य

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