समाज व सरकारें कभी भी नहीं थीं अन्याय, अपराध व आतंकवाद के विरुद्ध

जितने भी वाद हैं यानि मोदीवाद, अम्बेडकरवाद, माओवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, हिन्दुवाद, इस्लामवाद, ब्राह्मणवाद, दलितवाद…..राष्ट्रवाद…सभी इंसान को दिमाग से पैदल कर देते हैं, सोचने समझने की शक्ति छीन लेते हैं |

केवल मानवतावादी और सनातनधर्मी ही कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो अपना विवेक नहीं खोते, नेताओं, धर्म व जाति के ठेकेदारों के बहकावे में नहीं आते |

यदि देश की अधिकांश जनसँख्या भुखमरी में जी रही हो, अधिकांश जनसँख्या गरीबी में जी रही हो, तब यह एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है |

यदि आप दूसरों के कहने पर खुश होते हैं, दुखी होते हैं, रोते हैं, शोक मनाते हैं, न कि अपने भीतर उठे मनोभावों के प्रभाव से, तो निश्चित मानिए कि आपका विवेक और बुद्धि कोई और संचालित कर रहा है |

और जब देश की अधिकांश जनता दूसरों के अधीन कर देती है अपनी विवेक बुद्धि, तब कोई तानाशाह जन्म लेता है, तब कोई हिटलर जन्म लेता है, तब कोई लादेन जन्म लेता है | और यहीं से शुरू हो जाता है व्यक्ति, परिवार व देश का विनाश |

यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि इंसान को अपनी पार्टी, अपने नेता, अपने समाज, अपने सम्प्रदाय के दोष नहीं दिखाई देते | सामान्य छोटे मोटे दोषों की बात नहीं कर, उन दोषों की बात कर रहा हूँ, जिनके आधार पर वे दूसरे समूह, सम्प्रदाय या पार्टियों को दोषी बताते हैं, उन्हें गालियाँ देते हैं, भ्रष्ट कहते हैं और स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं |

यह भी बहुत ही आश्चर्य की बात है कि अपने ही समाज या पार्टी के दोषों को दूर कर पाने में असमर्थ समाज, सभ्य व धार्मिक लोग, दूसरे समाज से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे दोषों को दूर कर लें |

विवेक, बुद्धि व शक्तिहीन व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता

युद्ध नाद जब गया बजाया, कौन फिर अपना कौन पराया
यश अपयश की बात न सोचो, क्या पदवी क्या जात न सोचो
तुम्हें तो डटकर कर्म है करना, किसे है जीना किसे है मरना
ये तुम मुझ पर छोड़ दो अर्जुन, मोह हथकड़ियां तोड़ दो अर्जुन
शेर तुम्हीं हो वो हैं गीदड़, आज मचा दो उनमें भगदड़
गांडीव को तीर दो अर्जुन, हर पापी को चीर दो अर्जुन

शंख बजा संग्राम का अर्जुन, मुझे पता परिणाम का अर्जुन
गिरा हुआ तू धनुष उठा ले, मुझको अपना कवच बना ले
बंधे हैं क्यों हाथ तुम्हारे, मैं जो खड़ा हूं साथ तुम्हारे
तेरी युद्ध में जय ही जय है, मेरे होते तुम्हें क्या भय है
आंच न तुम पर आने दूंगा, मात कभी न खाने दूंगा
परम हितैषी दास न कहना, महापाप है पाप को सहना

धर्म का मूलभूत सिद्धांत है अधर्म, अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध रहना, आवश्यकता पड़ने पर हथियार उठा लेना और अपना, पराया का भेद किये बिना अधर्मियों, अत्याचारियों, अन्यायियों का सामना करना |

READ  आग लगा दो इन सबको..

जो धर्म पथ पर होते हैं वे ही धार्मिक कहलाते हैं और जो अधर्म के पथ पर होते हैं वे अधार्मिक कहलाते हैं |

लेकिन संसार के कई अनसुलझे रहस्यों में से एक यह भी है कि धार्मिक लोग कभी भी अधर्म के विरुद्ध नहीं होते | वस्तुतः धार्मिक, सभ्य, शरीफ वही कहलाते हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अधर्म, अन्याय व अत्याचार का समर्थन करते हैं या मौन रहकर तमाशा देखते रहते हैं |

यह एक ऐसी सच्चाई है जो मेरे लिए अनसुलझा रहस्य है और मैं एक ऐसा अन्वेषक हूँ, जो इस रहस्य को समझने के लिए बरसों से प्रयोग कर रहा हूँ |

ईराक, सीरिया, अफगान, बर्मा, पाकिस्तान….सभी की दुर्गति बिलकुल एक ही जैसी….लेकिन हम भारतीय कोई सबक नहीं लेंगे | वास्तव में इंसानों और मुर्गों में बहुत अधिक अंतर नहीं होता | दोनों ही खुद को बहुत ही अधिक बुद्धिमान समझते हैं लेकिन उनकी यही बुद्धिमता उन्हें ले डूबती है |
उदाहरण के लिए मुर्गे-मुग्रियों को देख लो | उनके ही सामने उनका ही एक सदस्य क़त्ल कर दिया जाता है, बाकी सभी यह मानकर चैन से चरते रहते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता | उस मुर्गे ने जरुर पिछले जन्म में कोई पाप किया होगा, इसीलिए उसे सजा मिली…हमने कोई पाप नहीं किया इसलिए हम ज़िंदा हैं |

यही ज्ञान सभी धार्मिकों के नस नस में बसा हुआ है | इसीलिए नेता लोग बड़ी चतुराई से आपको कहीं और उलझा देते हैं और करोड़ों रूपये बैंक से उड़ा लेते हैं, आदिवासियों को बेघर कर देते हैं | फिर यदि आदिवासी विरोध करें, हथियार उठा लें, तो फिर उन्हें नक्सली बताकर मार देंगे…और देश के बाकी मुर्गे तालियाँ बजायेंगे कि अच्छा हुआ नक्सली मारे गये लेकिन आदिवासी बच गये |
फिर एक दिन आएगा कि ईराक की तरह शिया सुन्नी विवाद खड़ा कर दिया जाएगा और फिर उन्हें ही आपस में लड़ा दिया जाएगा | भारत में तो काँग्रेसी-भाजपाई कहकर ही आपस में मार काट मचाया जा सकता है…यहाँ तो लड़ाने के बहुत ही आसान और विविध उपाय है |
लेकिन यह सब कर कौन रहा है और क्यों ?

उन्हें इल्लुमिनाती के नाम से दुनिया जानती है | कुल चालीस लोगों का परिवार हैं वे ऐसा माना जाता है | जिनके अधीन दुनिया के सभी नेता, व्यापारी, धर्म व जाति के ठेकेदार, राष्ट्राध्यक्ष, राजनैतिक पार्टिया काम करती हैं | जो सहयोग नहीं करता, वह इंद्रा, राजीव की तरह मारा जाता है |
माना जाता है कि इन्हें खून की होली देखने में बहुत ही सुख मिलता है | ये ऐसा परिवार है जिसके पास इतनी दौलत है जिससे पूरी दुनिया के सभी जीव जंतुओं को ये कई वर्षों तक भोजन पानी दे सकते हैं बिना एक रूपये कमाए |

READ  सावधान ! धर्म खतरे में है !!

धार्मिक कौन, अधार्मिक कौन जानिये

और यह सब इसीलिए हो रहा है, क्योंकि धर्म और अधर्म का अंतर ही नहीं पता धार्मिकों को जो लोग कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के निकाले जाने पर दुखी है, उन्हें दुःख नहीं आदिवासियों के बेघर होने पर | जिन्हें गर्व है हिन्दू होने पर, जिन्हें गर्व है मुसलमान होने पर उन्हें धर्म में कोई रूचि नहीं अधर्म के साथ खड़े हैं |

मैंने तीन या चार पोस्ट लिखे धर्म-अधर्म पर | बड़े गर्व से खुद को हिन्दू, मुसलमान कहने वाले नजर ही नहीं आये उस पोस्ट पर | क्योंकि धर्म में कोई रूचि नहीं | रूचि है तो केवल साम्प्रदायिकता में, रूचि है तो केवल हिन्दू-मुस्लिम खेलने में, रूचि है तो केवल अपने अपने नेताओं और राजनैतिक पार्टियों की चाटुकारिता में | भले उन नेताओं को कोई रूचि नहीं आम नागरिकों की समस्याओं में | भले उन नेताओं और पार्टियों को केवल अपनी अपनी जान और दौलत बचाने में रूचि हो, भले उन नेताओं को केवल जनता को लूटने, जनता की सम्पत्ति छीनकर भूमाफियाओं, खनन माफियाओं, बड़े उद्योगपतियों और व्यपारियो को सौंपने में हो…..चाटुकार उनकी जयकार में ही लगे रहेंगे |

और आज लगभग हर नागरिक इसी मानसिकता में जी रहा है | क्योंकि धार्मिक और सभ्य होने की परिभाषा बदल दी गयी और अब जो अधर्म को देखते हुए भी मौन रहे, अपनी आँखें बंद रखे वही धार्मिक व सभ्य कहलाता है |

कई लोग हैं जो मुझसे पूछते है कि आपने कौन सा पहाड़ उखाड़ लिया, आपने कौन सा बड़ा काम कर लिया…फेसबुक पर लिखने भर से खुद को बड़ा क्रांतिकारी समझने लगे ? कई लोग है जो कहते हैं कि जमीन पर काम करो, जमीन पर उतरो…..

उन सभी से पूछना चाहता हूँ कि जो लोग जमीन पर काम कर रहे हैं क्या उनके साथ आप खड़े हुए ? जो लोग जमीन पर ही रेंग रहे हैं, क्या आप उनके साथ खड़े हुए ? जो लोग पहले बड़े बड़े काम करके चले गये क्या आपने उनका अनुसरण किया ? जिसने अकेले ही पहाड़ खोद कर रास्ता बना दिया, क्या आप उसके साथ खड़े थे ? क्या आपने उसका अनुसरण करके कोई पहाड़ काटकर रास्ता बनाया अकेले ?

यदि नहीं तो मुझे क्यों सलाह देते फिर रहे हैं आप लोग ?

चार वर्णों की बात फिर आ जाती है | ऋषियों ने चार वर्ण यूँ ही नहीं बताये थे | चार वर्ण यानि मानवों के चार स्वभाव | इन चार वर्णों में सबसे बड़ी संख्या है शूद्र वर्ण की | शूद्र होती है वह प्रजा जिसे कोई मतलब नहीं होता कि उसके पड़ोसी पर कोई अत्याचार कर रहा है या नहीं | उसे कोई मतलब नहीं होता कि कोई नेता उन्हें मूर्ख बनाकर लूट रहा है, उनकी भूमि ही उनसे छीन रहा है, उनका मौलिक अधिकार ही उनसे छीन रहा है | वे इसे अपनी नियति मानकर जीते हैं, कभी विरोध नहीं करते | शूद्र होते हैं वे लोग जिनमें स्वाभिमान नहीं होता, जिनमें आत्मसमान नहीं होता, जिन्हें सही और गलत का अंतर नहीं पता होता | जैसे गाय, बत्तख, भेड़ें | इन्हें कोई भी कहीं भी हाँककर ले जा सकता है, कोई भी चारा फेंककर इन्हें अपने बाड़े में कैद कर सकता है |

READ  गीता दर्शन--भाग-1(ओशो) प्रवचन--11

लेकिन कुछ लोग दुनिया में ऐसे भी होते हैं जो सही और गलत का अंतर जानते हैं, जो धर्म और अधर्म का अंतर जानते हैं, जो अधर्म, असत्य व अन्याय का विरोध करते हैं…..जैसे कि चाणक्य | वह था वास्तविक ब्राह्मण | ये अधर्मियों के पक्ष में खड़े, पंडित-पुरोहित, साधू-संत ब्राहमण नहीं हैं |

वास्तविक क्षत्रिय थे चन्द्रगुप्त मौर्य, रानी लक्ष्मी बाई जो अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध निर्भीकता से लड़े |

रही वैश्यों की बात, तो उनका कोई बैरी नहीं होता, उन्हें किसी से कोई बैर नहीं होता | उन्हें तो जो भी ताकतवर दिखाई देगा, उनके साथ खड़े हो जायेंगे | उन्हें अपने व्यापार से मलतब होता है |

लेकिन इन सबसे अलग एक वर्ण और भी होता है और वह है संन्यासी का | संन्यासी वह जो किसी भी दड़बे में कैद न हो, जिसे किसी भी कीमत पर खरीदा न जा सके, जिसे कोई भी भयभीत न कर सके, जो कभी भी किसी निर्दोष का अहित न सोचे, जो हर अत्याचारी के विरुद्ध आवाज उठाये | वास्तव में संन्यासी चारों वर्णों के श्रेष्ठ गुणों के मिश्रण से तैयार होता है | लेकिन अब ऐसे संन्यासी नहीं पाए जाते |

और यही कारण है कि सरकारें वे चला रहे हैं जो व्यापारी हैं, वैश्य हैं जन्मजात | और जब देश वैश्यों के नेतृत्व में हो, और नकली ब्राह्मण और क्षत्रिय यानि जातिगत न कि वास्तविक ब्राहमण और क्षत्रिय उनके सहयोगी हों, तब प्रजा से उनका मौलिक अधिकार छीना जाने लगता है, उन्हें विवश कर दिया जाता है गुलाम का जीवन जीने के लिए, उन्हें विवश कर दिया जाता है दर-बदर की ठोकरें खाने के लिए |

सदैव स्मरण रखें:
पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड, रोजा-नमाज, व्रत-उपवास करने वाले, धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने या रटने वाले धार्मिक नहीं होते | पंडित-पुरोहित, पादरी-मौलवी, हाफ़िज़-आलिम, साधू-संत, महन्त-मंडलेश्वर भी धार्मिक नहीं होते | धार्मिक वही होते हैं, जो अधर्म (अत्याचार, अन्याय, शोषण, लूट-पाट…आदि) के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हैं | जो अपराधियों, अत्याचारीयों, अन्यायियों का बहिष्कार करने या उन्हें सुधारने का साहस रखते हों |

~विशुद्ध चैतन्य



लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of