महिलादिवस पर कलयुगी संन्यासी के विचार

आज महिलादिवस था तो विश्वभर में कई आयोजन और गोष्ठियाँ हो रहीं हैं | लोगों से पूछा जा रहा स्त्रियों की स्वतंत्रता से सम्बंधित उनके विचार |

सामान्यतः एक संन्यासी होने के नाते मुझे इस विषय पर कुछ नहीं कहना चाहिए और कहना भी पड़े तो वही कहना चाहिए जो समाज सुनना चाहता है | अब चूँकि मैं बाकी सतयुगी साधू-संन्यासियों में से नहीं हूँ, कलयुग में जन्मा हूँ तो कलयुगी संन्यासी ही कहलाऊंगा तो मेरे विचार भी सतयुगी साधू-संन्यासियों जैसे नहीं होंगे |

वैसे भी आज विश्व में कलयुगी संन्यासी बहुत ही दुर्लभ हैं क्योंकि अधिकांश सभी सतयुगी साधू-संन्यासी ही हैं | आज जो भी साधू-संन्यासी बनता है वह सतयुगी, द्वापर युगीन किताबें पढ़कर ही संन्यासी बनता है और बिलकुल वैसा ही बनने का प्रयास करता है, जैसा कि धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है | समाज भी वैसे ही साधू संन्यासियों का सम्मान करता है, जो परम्पराओं को ढो रहा होता है, जो किताबी बनकर रह गया होता है | मौलिक साधू-संन्यासियों की समाज को में कोई इज्जत नहीं होती, कोई उन्हें साधू-संन्यासी मानता भी नहीं |

तो मैं अपनी ही बात करता हूँ अपने ही विचार रखूँगा यह जानते हुए भी कि समाज को मेरे विचार पसंद नहीं आयेंगे |

मैं जब २१ बरस का हुआ था, तब विवाह करने के लिए बहुत ही लालायित था | मैं नौ दस बरस से उस उम्र की प्रतीक्षा बेसब्री से कर रहा था, जब मैं विवाह योग्य हो जाऊंगा और बहुत ही सुंदर कन्या से विवाह कर पाउँगा | लेकिन मेरे पिताजी ने मेरे सभी अरमानों पर पानी फेर दिया यह कहकर कि तेरे भाग्य में अभी विवाह नहीं लिखा है, २८ से पहले तेरा विवाह हो ही नहीं सकता क्योंकि तू मांगलिक है |

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खैर मैंने भी हार नहीं मानी और खुद ही अपने लिए रिश्ता खोजा विवाह की सारी तैयारी कर ली | लेकिन पिताजी और पिताजी की एक परिचित ने जाकर वह रिश्ता भी तुड़वा दिया | उसके बाद बहुत कोशिश की, मेट्रीमोनियल साइट्स में विज्ञापन दिए, रिश्ते भी बहुत आये लेकिन किसी न किसी कारण से विवाह टलता रहा | फिर किसी ज्योतिषी ने मेरी कुंडली देखकर बताया कि ३६ की आयु में विवाह निश्चित है….लेकिन मैंने कहा कि यदि २५ की आयु तक विवाह नहीं हुआ तो फिर कभी नहीं होगा | क्योंकि उसके बाद मुझे विवाह की कोई आवश्यकता नहीं | तब तक मुझे अकेले ही जीने की आदत पड़ चुकी होगी |

और वही हुआ भी | आज अकेले जीने की ऐसी आदत पड़ गयी कि अपने कमरे में किसी दूसरे को बर्दाश्त करना भी मुश्किल लगता है | मैं आज भी अपने लिए बिलकुल अलग ही कमरा पसंद करता हूँ और एकांत में रहना पसंद करता हूँ |

मैं यह समझता था कि स्त्रियों को घर के काम करना पसंद हैं, मैं यह समझता था कि स्त्रियों को भोजन पकाना, खिलाना पसंद है, मैं यह मानता था कि स्त्रियाँ प्राकृतिक रूप से केयर टेकर होती हैं, वह दूसरों की बहुत ही चिंता करती हैं | मैं यह मानता था कि यदि स्त्री जीवन में आ गयी तो मेरा अधूरापन दूर हो जाएगा, मुझे एक ऐसा साथी मिल जाएगा जो तब भी मेरे साथ खड़ा होगा, जब सारा समाज मेरा विरोधी हो जायेगा |

लेकिन आज जब मैं स्त्रियों के पोस्ट पढ़ता हूँ, तो पाता हूँ कि अच्छा ही हुआ मेरा विवाह नहीं हुआ | इनके पोस्ट पढने के बाद ही जाना कि वास्तविकता बिलकुल अलग है | स्त्रियों को कंडिशन किया जाता है वैसा होने के लिए, जैसा हम पुरुष देखना चाहते हैं | जबकि वे वैसी नहीं हैं, प्राकृतिक रूप से वे हम पुरुषों की तरह ही होती हैं | वे भी घरेलु काम से उतनी ही घबराती हैं, जितना पुरुष घबराते हैं | वे भी घर संभालने की बजाये, ऑफिस दफ्तर संभालना चाहती हैं, वे भी वही सब करना चाहती हैं जो पुरुष करना चाहते हैं | घरेलु काम काज उन्हें भी बोझ लगता है और वे भी चाहती हैं कि पुरुष घर गृहस्थी संभालें और वे हवाई जहाज उड़ायें, फाइटर प्लेन उड़ाये……यानि पुरुषों से भिन्न बिलकुल नहीं हैं | बस समाज उन्हें मार पीटकर घरेलु बना देता है |

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मैं आज बहुत ही संतुष्ट व सुखी अनुभव करता हूँ कि मेरी वजह से किसी स्त्री का जीवन नरक नहीं बना | कम से कम मैंने एक स्त्री को तो मुक्त कर दिया, उसे अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह जीने का अधिकार दे दिया | या यह भी कह सकते हैं कि मैंने कम से कम एक स्त्री का अधिकार तो नहीं छीना | जिसे मेरे साथ बंधना था हो सकता है वह आज फाइटर प्लेन उड़ा रही हो, हो सकता है वह आज कोई बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी की कोई बड़ी अधिकारी हो और उसका पति घर के काम करता हो, शाम को उसके लौटने की प्रतीक्षा करता हो, घर लौटते ही चाय बनाकर लाता हो…..यह भी हो सकता है कि घर के सारे काम नौकर चाकर ही करते हों, दोनों पति पत्नी दफ्तर संभालते हों |

जो भी हो…मैं मुक्त हुआ ! मैंने जो भ्रांतियाँ पाल रखी थीं उससे मुक्त हुआ | मुझे आज समझ में आता है कि मेरी माँ जो मेरे लिए भोजन बनाती थीं, वह विवशता में बनाती थीं…….सब कुछ मिथ्या है, यहाँ हर कोई ढोंग कर रहा है | ये प्रेम, ये सेवा….सब ढोंग…..वास्तव में हर कोई अपने अपने सुखों के पीछे भाग रहा है दूसरों के लिए कोई नहीं जी रहा मैं भी नहीं | मैं भी अपने ही सुख खोजता हूँ और यही कारण है कि मैं एकांत पसन्द करता हूँ | मुझे दूसरों के साथ जीने में बहुत ही असहजता होती है | न जाने मेरी कौन सी बात, कौन सा व्यवहार किसी को आहत कर जाये, यही चिंता लगी रहती है | अकेला रहता हूँ तो तनाव मुक्त रहता हूँ, मुझे चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती कि मुझे कैसे उठना है,कैसे बोलना है, कैसे चलना है, कैसे पहनना है, कैसे जीना है |

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सौभाग्य शाली हूँ मैं कि ईश्वर ने मुझे बचा लिया एक बोझिल तनाव पूर्ण जीवन से | वास्तव में मेरा जीवन साथी जन्म ही नहीं लिया और लालच, स्वार्थ पर आधारित रिश्तों में जीवन साथी नहीं मिलते, केवल अनुबंधित शर्तों पर आधारित व्यावसायिक पार्टनर ही मिलते हैं | उनसे आत्मीयता का कोई सम्बन्ध नहीं होता, केवल लेन-देन होता है | और समाज इसी लेन देन पर आधारित सम्बन्धों को ईश्वरीय बताता फिरता है, ईश्वर द्वारा बनायीं गयी जोड़ी बताता फिरता है, स्वर्ग में बनी जोड़ी बताता फिरता है |

मैं तब अवश्य दुखी था कि ईश्वर ने मेरे साथ न्याय नहीं किया, लेकिन आज समझ में आता है कि ईश्वर जो कुछ भी करता है भले के लिए ही करता है | दुनिया चाहे कुछ भी कहे, कोई भी बहाने बनाये, लेकिन मैं मानता हूँ कि जो कुछ भी हुआ वह मेरे ही नहीं उसके भी भले के लिए हुआ, जो मुझे जुड़ता जीवन साथी बनकर |

विवाह के विषय में मेरे विचार अवश्य पढ़ें…मेरे अगले पोस्ट पर

~विशुद्ध चैतन्य

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