गुरु, परम्परा, धर्म और धार्मिकता

“ध्यान का अर्थ होता है : चुप, मौन, कोई विचार नहीं उठता, कोई विचार की तरंग नहीं उठती, झील शांत है..। यह शांत झील वर्तमान से जोड़ देती है। और जो वर्तमान से जुड़ा, वही योगी है। ध्यानी योगी है। और जो वर्तमान से जुड़ गया, वह परमात्मा से जुड़ गया; क्योंकि वर्तमान परमात्मा का द्वार है।” -ओशो

कई लोग यह कहते हैं कि मैं ओशो की कॉपी करता हूँ, ओशो के कहे वचनों को ही रिपीट करता हूँ, कुछ भी नया नहीं कहता | किसी ने तो मुझे यह भी कहा था कि आप ओशो सम्प्रदाय ज्वाइन कर लें, और ओशो का ही प्रचार-प्रसार करें |

तो मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं किसी भी सम्प्रदाय से नहीं जुड़ना चाहता | यह अलग बात है कि मैं ओशो से प्रभावित हूँ और उन्हें भी अपना गुरु ही मानता हूँ | लेकिन मैं स्वामी विवेकानंद से भी प्रभावित हूँ और उन्हें भी गुरु मानता हूँ, मैं महर्षि रमण से भी प्रभावित हूँ, उन्हें भी गुरु मानता हूँ, गौतम बुद्ध के शिष्य बोधिधर्मन से भी प्रभावित हूँ और उन्हें भी गुरु मानता हूँ | ठाकुर दयानन्द देव जी से भी प्रभावित हूँ, उन्हें भी अपना गुरु मानता हूँ और आज उन्हीं के आश्रम में निवास करता हूँ | लेकिन मैं स्वयं को भी अपना गुरु मानता हूँ और स्वयं के विवेकानुसार चलता हूँ |

आप लोगों के लिए यह समझना कठिन हो जायेगा, क्योंकि मैं उन सभी सिद्धांतों के विरुद्ध आचरण कर रहा हूँ जो गुरु और शिष्य परम्परा के अंतर्गत आता है | वास्तव में परम्पराओं को ढोने के सिद्धांत के ही विरुद्ध चल रहा हूँ मैं | इसलिए मेरी बातें सहजता से समझ पाने में आप लोगों को कठिनाई होती है |

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मेरे लिए गुरु का अर्थ केवल इतना है, कि मैं जिन विचारों से सहमत हूँ, उन विचारों का समर्थन वे पहले ही कर चुके हैं और जिन विचारों से असहमत होता हूँ, वे उन्हें समझा पाने में समर्थ होते हैं | जिन्हें वे नहीं समझा पाते, वह मुझे स्वयं ही अपने अनुभवों और अन्तःप्रेरणा से समझना होता है अतः मैं स्वयं भी अपना गुरु हुआ | गुरु का अर्थ होता है अन्धकार से उजाले की ओर ले जाने वाला | गुरु का अर्थ टीचर, शिक्षक, अध्यापक, वेदाचार्य, प्रोफ़ेसर, डीन नहीं होता | गुरु बिलकुल अलग ही चीज है, गुरु कुछ भी थोपता नहीं टीचर, ट्यूटर, प्रोफेसर की तरह | गुरु आपके भीतर ही छुपी संभावनाओं से परिचय करवाता है बिलकुल एक माली की तरह | जैसे मालिक बीज को कुछ सिखाता नहीं, बस उसका सहयोग करता है अपने ही गर्भ में छुपे पौधे को बाहर निकालने के लिए | माली पौधे को कुछ सिखाता नहीं कोई ज्ञान नहीं थोपता उसपर, उसे अपने ही रूप और गुणों को निखारने सँवारने में केवल सहयोगी होता है |

तो गुरुओं से मुझे वैसा रट्टामार ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, जैसा कि सामान्यतः धार्मिकों, पंडितों, पुरोहितों, आचार्यों, मौलवियों, पादरियों, कथावाचकों को प्राप्त होता है | गुरुओं से मुझे जीवन का सार प्राप्त होता है और वही सार मेरे लिए उपयोगी होता है | लेकिन मैं गुरुओं से पुर्णतः सहमत हो जाऊँ यह भी संभव नहीं | जैसे कि यहाँ ओशो के वक्तव्य से मैं सहमत नहीं हूँ |

ध्यान भी जीवन का उद्देश्य नहीं है, ध्यान ही सबकुछ नहीं है | केवल वर्तमान में रहना ही जीवन नहीं है और योगी हो जाना या परमात्मा से जुड़ जाना मात्र ही जीवन नहीं है |

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जरा सोचिये तो यदि हर कोई योगी हो जाए (योगी आदित्यनाथ की तरह नहीं) और परमात्मा से जुड़ जाए तो क्या हो ? हर को कोई ओशो की तरह बैठ जाए प्रवचन करने, कथा सुनाने या महावीर, बुद्ध हो जाए और बैठ जाये किसी पेड़ के नीचे, तो क्या हो ? उन्हें भिक्षा कौन देगा ? भोजन कौन खिलायेगा ? खेती कौन करेगा, सरकार कौन चलाएगा ?

योगी होना है तो श्री कृष्ण की तरह बनिए | श्री कृष्ण को योगिराज ही कहा गया है क्योंकि वे पूर्ण मानव थे | वे जीवन के सभी रस का आनंद लेते थे, वे जीवन के सभी भोगों को भोगते थे | वे न तो नारी को नरक का द्वार मानते थे और न ही एश्वर्य से दूर भागते थे | लेकिन फिर भी वे अलिप्त थे, त्यागी थे | क्योंकि वे असक्त नहीं थे भोग से ऐश्वर्य से |

ध्यान मात्र बीस मिनट का करिए ताकि मस्तिष्क को रिचार्ज कर सकें, तनाव मुक्त कर सकें उससे अधिक की आवश्यकता नहीं है | ध्यानी बनकर 24 घंटे ध्यान में बैठे रहने का कोई लाभ नहीं | न तो बुद्ध समाज को सुधार पाए, न ही महावीर सुधार पाए, हाँ उनके नाम पर पंथ बन गये, पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड बन गये, मंदिर बन गये प्रतिमाएं बन गयीं…लेकिन दुनिया तो अपनी ही चाल में चल रही है |

क्या लोग धार्मिक बन पाए ?

मुझे तो नहीं दीखता कोई व्यक्ति जो धार्मिक हो गया हो गया और अधर्म के विरुद्ध खड़े होने का साहस जुटा लिया हो ?

जितने भी मंदिरों में जाने वाले, पूजा-पाठ करने वाले, चढ़ावा चढ़ाने वाले, मंदिर बनवाने वाले, रोजा-नमाज रखने वाले, व्रत उपवास करने वाले या फिर साधू-संत बनकर घुमने वाले लोग वास्तव में धार्मिक हो गये होते, तो क्या किसी धूर्त-मक्कार, बेईमान का साहस होता कि वह जनता को मूर्ख बनाये ? क्या न्यायालय में न्याय के नाम पर चल रहे तमाशे बंद न हो गये होते अब तक ? क्या देश की पुलिस बेईमान होती ? उनमें भी तो बहुत से पुलिस वाले आस्तिक ही हैं, पूजा-पाठ, रोजा नमाज करने वाले हैं….फिर इतनी बेईमानी क्यों हैं वहां ?

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तो लोग धार्मिक नहीं हुए, केवल धार्मिकता का मुखौटा लगाकर घूम रहे हैं | और मैं इन्हीं धार्मिकों को धर्म सिखाने आया हूँ | इसीलिए ही मैं न तो संत बनना चाहता हूँ, न ही बुद्ध बनना चाहता हूँ, न महावीर बनना चाहता हूँ, न ही ओशो बनना चाहता हूँ | वास्तव में समाज जिसे पूजनीय आदरणीय मानता है, उनमें से कुछ भी नहीं बनना चाहता | मैं तो जो हूँ, वही होना चाहता हूँ यानि किसी की नकल नहीं |

लोग पूछते हैं कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है | मेरे जीवन का उद्देश्य है धर्म सिखाना, लोगों को धार्मिकता समझाना | क्योंकि आज लोग दिखावों को धर्म समझकर जी रहे हैं, आज लोग साम्प्रदायिकता, कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ, रोजा-नमाज, खान-पान को धर्म समझ कर जी रहे हैं | और वास्तविक धर्म से अनभिज्ञ हैं | बड़े बड़े साधू-संतों को देखा है मैंने जो धर्म से अनभिज्ञ हैं, धर्म से बिलकुल दूर हैं | और यही कारण है कि अधार्मिक तत्व आज ताण्डव मचा रहे हैं |

मेरी लड़ाई है अधर्मिकों के विरुद्ध, अधर्मियों के विरुद्ध न कि सम्प्रदाय, पंथ, जाति के विरुद्ध | मैं चाहता हूँ कि ध्यान हो या योग, पूजा-पाठ हो या रोजा-नमाज आपका व्यक्तिगत विषय होना चाहिए न कि कायरता को छुपाने और तमाशा दिखाने का बहाना |

~विशुद्ध चैतन्य

छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए

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