धर्म से ही विमुख हो गया समाज

society against dharma

समाज या सम्प्रदाय हिन्दू हो, या इस्लामिक, या ईसाई, या सिख, या बौध, या जैन या वामपंथी, या दक्षिणपंथी या भाजपाई, या सपाई या बसपाई या कोंग्रेसी या आपिया या और कोई भी | अधर्म यानि अन्याय, शोषण, अत्याचार, भ्रष्टाचार, अशिष्टता, अभद्रता, दूसरों की संपत्ति हड़पने या छीनने के विरुद्ध नहीं होता | उसे कोई मतलब नहीं इन सब से क्योंकि यह सब सामान्य सामाजिक, राजनैतिक व्यवहार में स्वीकार्य हैं | समाज या सम्प्रदाय इसे अधर्म नहीं मानता क्योंकि उन्होंने अधर्म की नयी ही परिभाषा गढ़ ली है |

कहते तो हिन्दू धर्म है, इस्लाम धर्म है, इसाई धर्म है….और इसे मानने वाले धार्मिक कहलाते है | लेकिन धर्म यानि अधर्म के विरुद्ध आवाज उठाना, आवाज उठाने वालों का साथ देना इनके लिए बहुत ही दुष्कर कार्य प्रतीत होता है | इसलिए ही इन्होने धर्म की भी परिभाषा बदल दी |

अब धर्म का अर्थ है धार्मिक ग्रंथों का रट्टा लगाना, पूजा-पाठ, रोजा-नमाज करना, मंदिरों-मस्जिदों, धार्मिक स्थलों तीर्थों में मत्था रगड़ना मात्र रह गया है | आप ठगी करते हैं, बेईमानी करते हैं, दूसरों की संपत्ति हडपते हैं लोगों से झूठे वादे करते हैं, गरीबों को लूटकर अपनी तिजोरी भरते हैं सब स्वीकार्य है यदि आप धार्मिक ग्रंथों का रट्टा लगा लेते हैं, तिलक या टोपी लगा लेते हैं, जय श्री राम या अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगा लेते हैं |

लेकिन यदि कोई पूजा पाठ नहीं करता, रोजा-नमाज नहीं करता, धर्मिक ग्रंथो को हाथ भी नहीं लगाता तो तथाकथित धार्मिकों का समाज उसे बड़ी ही घृणा की दृष्टि से देखता है, उसे अधार्मिक मानता है भले ही वह धार्मिक कार्यों में लिप्त हो जैसे अन्यायियों, अत्याचारियों, शोषकों, भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध अवाज उठाता हो, अधर्मियों से हर रोज लड़ता हो |

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तो धर्म से ही विमुख हो गया समाज और ढोंग और आडम्बरों को धर्म मानकर जीने लगा | यही कारण है कि आज केवल बडबोले, गप्पी नेताओं को सर पर बैठाया जाता है | आज समाज नेताओं को चुनने के बाद उनसे प्रश्न करने की हिम्मत नहीं करता क्योंकि स्वयं को उनका गुलाम समझ बैठता है | यह कुछ वैसी ही बात हो गयी, जैसे किसी ने अपना नौकर चुना, अपना मैनेजर चुना और उसी से भयभीत होकर दुबक जाए | उससे प्रश्न भी न कर सके कि वह क्या कर रहा है, कहाँ पैसे खर्च कर है |

और चूँकि धर्म का ही ज्ञान नहीं समाज को, अधर्म का ही ज्ञान नहीं समाज को, इसीलिए लोग नास्तिक बन रहे हैं, इसीलिए लोग धर्म को ही सारे फसाद की जड़ मान रहे हैं | वास्तविकता यह है कि धार्मिक वही लोग हैं, जो सरकार से सीधे प्रश्न करने का साहस रखते हैं | धार्मिक वही लोग हैं, जो अपने आसपास हो रहे भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों पर नजर रखते हैं | धार्मिक वही लोग हैं जो भ्रष्ट नेता को वोट नहीं देते, भ्रष्ट अधिकारीयों को अपने क्षेत्र में टिकने नहीं देते | धार्मिक वही लोग हैं जो सांप्रदायिक व जातिवादी मानसिकता के नेताओं से दूरी बनाकर रखते हैं, उन्हें किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं करते |

लेकिन मैं जानता हूँ धार्मिक होना कोई बच्चों का खेल नहीं है और न ही कायरों के बस की बात है | धार्मिक तो अब बिरले ही बचे हैं अधिकांश तो धार्मिकता के नाम पर केवल ढोंग कर रहे हैं और अपनी कायरता छुपा रहे हैं |

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~विशुद्ध चैतन्य

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