संन्यासी हरामखोर नहीं होता…..

भारत में वर्षा, वृक्ष, नदी और संत नि:स्वार्थ भाव के प्रतीक माने जाते हैं। ऐसा नहीं है कि भारत में ही संतों को महत्व मिलता है, विदेशों में भी संतों को महत्व मिलता है, जैसे कि संत-वेलेंटाइन |

यह विषय आज इसलिए चुना क्योंकि वर्तमान समाज व शिक्षा कर्मयोग को महत्व देती है | उनके लिए बाकी के तीन योग कोई मायने नहीं रखते | और इसका प्रमुख कारण है, शिक्षा का उद्देश्य नौकर बनना या नौकरी करना | कोई इंजीयर बने, डॉक्टर बने या आईएएस या आईपीएस, उदेश्य केवल नौकरी करना ही होता है | अब चूँकि सारा समाज ही नौकरों का है, महँगी से महँगी प

कल ही एक व्यक्ति को ब्लॉक किया जिसे अपने लिस्ट में शामिल किये चार दिन भी नहीं हुए थे, लेकिन आते है उसने उल्टियाँ करनी शुरू कर दी | बहुत से लोग मैसेज बॉक्स में उल्टियाँ करते हैं, वह अलग बात है, लेकिन फ्रेंडरिक्वेस्ट भेजकर फ्रेंडलिस्ट में शामिल होने के बाद उल्टियाँ करना तो केवल संघी-मुसंघी-बजरंगियों के ही संस्कार हो सकते हैं, किसी भारतीय के नहीं | इनके संस्कार विदेशी हैं, इनके कर्मकांड, विचार, व्यव्हार सभी विदेशी हैं, भारतीय नहीं |


इसका सबसे बड़ा कारण है कि हम सभी सुख चाहते हैं और वह भी कम से कम काम किये बिना | यदि ऐसा न होता, तो वाशिंगमशीन, सिलाईमशीन, ऑटोकैड, फोटोशोप, ऑटोट्यूनर आदि का अविष्कार ही न होता और न ही आज हर घर में इनमें से कोई एक चीज रखी होती | अपनी ज़िन्दगी आप लोगों ने खुद ही जटिल कर ली, खुद ही शिक्षा को ज्ञान प्राप्ति का केंद्र बनाने की जगह, नौकर उत्पादक व प्रशिक्षण केंद्र बना दिया | और अब वे लोग अखर रहे हैं जो प्राकृतिक अवस्था में जीते हैं |

शायद मैं अकेला ऐसा संन्यासी हूँ जो अपने हर अच्छे-बुरे अनुभव व भावों को व्यक्त करता हूँ वह भी तुरंत | क्योंकि मैं संन्यासी हूँ और संन्यासधर्म को किताबों से नहीं, व्यव्हार व अनुभवों से समझता हूँ | आप कितने ही बड़े शास्त्रज्ञ हों, कितने ही बड़े धर्म के ज्ञाता हों, कितने ही बड़े डिग्रीधारी हों, कितने ही बड़े अधिकारिक पोस्ट पर बैठे हों या कितने ही करोड़-अरब रुपयों का प्रतिदिन कारोबार करते हों…मुझे प्रभावित नहीं कर सकते और न ही मुझे चैलेन्ज कर सकते हैं | क्योंकि मेरी और आपकी कोई प्रतिस्पर्धा है ही नहीं | आप भौतिकता में डूबे हुए हैं और मैं आध्यात्मिकता में | आपका क्षेत्र मेरे क्षेत्र से बिलकुल भिन्न हैं तो प्रतिस्पर्धा का कोई प्रश्न ही नहीं उठता | हाँ यह और बात है कि मेरा आध्यात्म किताबी अध्यात्म से भिन्न है | मेरा अध्यात्म भौतक व आध्यात्मिक जगत को जोड़ता है, तोड़ता नहीं | मैं केवल शास्त्र पर टिका हुआ आध्यत्मिक नहीं हूँ, अधिकांश आधुनिक तकनीकी ज्ञान भी रखता हूँ, यहाँ तक कि अपना कंप्यूटर स्वयं असेम्बल, इंस्टाल व रिपेयर भी करता हूँ | मैं उतना ही ज्ञान लेना पसंद करता हूँ, जिससे मेरी वर्तमान आवश्यकताएं पूरी हो जाएँ, मुझे किसी भी विषय में विशेषज्ञता प्राप्त नहीं करनी | मुझे किसी से होड़ नहीं करनी और न ही किसी को नीचा दिखाना है | फिर भी यदि आपको ऐसा लगता है कि मैं आलोचनाएँ अधिक करता हूँ या किसी को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहा हूँ, तो पोस्ट को दोबारा ठीक से समझकर पढ़िए | मेरा हर पोस्ट केवल जागृत करने के लिए होता है, उन सोये लोगों को जगाने के लिए होता है, जो यह मानकर बैठे हैं कि उनके पास डिग्रियाँ हैं, अच्छी नौकरी है, अच्छा कारोबार है… इसलिए वे जागृत हैं |

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आप यदि किताबों में जकड़े हुए हैं फिर वह चाहे ईश्वरीय किताब ही क्यों न हो, आप भौतिकता में जकड़े हुए हैं | भौतिकता जड़ है, सीमित है, विनाशवान है, जबकि आध्यत्मिकता गतिमान है, प्रवाहमान है, उर्जावान है, अनंत है | अध्यात्मिक क्षेत्र में कोई दावा नहीं कर सकता कि वह जो जान चुका है, उससे आगे कुछ नहीं जानने के लिए | कोइ यह दावा नहीं कर सकता कि उनके आराध्यों ने जो कुछ समझाया उससे आगे समझने के लिए कुछ नहीं है | और जो ऐसा माने बैठे हैं, वे मृत हो चुके हैं, जड़ हो चुके हैं |

फिर जिन्होंने शिक्षा ली ही नौकरी करने के लिए, उनकी सोच व समझ होगी ही कितनी ? उतनी ही न, जितने से उनको नौकरी मिल जाए.. बस !!!

एक तस्वीर शेयर हो रहा है आजकल जिसमें उमाभारती को एक स्टूल पर खड़े दिखाया गया है और नीचे एक सुरक्षाकर्मी जिसे लोग आईएएस या आईपीएस बता रहे हैं | उमाभारती पाँचवी पास है या पीएचडी, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता | लेकिन जो स्टूल पकड़कर बैठा है, उससे उमाभारती की तुलना करना ही यह सिद्ध करता है कि ये पढ़े-लिखे लोग और ईश्वरीय किताबों के नाम पर आपस में लड़ने वाले लोगों की मानसिक्त संकीर्णता में कोई अंतर नहीं है | उस आइपीएस से पूछो कि उसने नौकरी क्यों की, जाकर कोई बिजेनस करता, कृषि में अपना भाग्य आजमाता ? और जब नौकरी की है, तो पद की गरिमा तो रखनी ही पड़ेगी, फिर उसका मालिक कोई अंगूठाछाप हो या पाँचवी पास क्या फर्क पड़ता है ?

धीरू भाई अम्बानी कितने पढ़े लिखे थे ? गुलशन कुमार कितने पढ़े लिखे थे ? लेकिन सैंकड़ों डिग्रीधारी उनके अधीन नौकरी कर रहे थे | क्यों ?

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तो शिक्षा को डिग्रियों के तराजू में मत तोलिये | और न ही कर्म के नाम पर मेरे जैसे संन्यासियों को ताना दीजिये..अपने गिरेबान में देखिये | आप स्वयं ऐसे चक्रव्यूह में फँसे हुए हैं जिससे आजीवन नहीं निकल सकते | और मैं तो जब तक नौकरी करता था, अपनी शर्तों पर करता था | बाद में जब न्यूज़चैनल में नौकरी करनी पड़ी विवशता में, तब समझ में आया कि नौकर केवल नौकर ही होता है | उसे मशीन की तरह काम करना है | उसे गलत का विरोध करने का भी अधिकार नहीं होता, जैसे कि वर्तमान में सरकारी नौकरों की हालत है | और आप समझते हैं कि ये नौकर कर्मयोग का पालन कर रहे हैं ?

नहीं ये लोग कर्मयोग का पालन नहीं कर रहे, बल्कि गुलामी कर रहे हैं | बस जैसे तैसे महिना पूरा हो जाये, तनखा मिल जाए और साठवर्ष के हो जाएँ तो पेंशन मिलने लगे.. इससे अधिक की समझ नहीं होती इनको | फिर इनसे आप कोई भी अनैतिक, अमानवीय कार्य करवा लो, सबकुछ करने को तैयार होते हैं |

जबकि “कर्म’ शब्द का अर्थ है “क्रिया, काम करना”। कोई भी मानसिक या शारीरिक क्रिया कर्म कहलाता है। इस कार्य का परिणाम भी कर्म ही कहलाता है। जो कुछ भी हम करते, कहते या सोचते हैं, उसका एक प्रभाव होता है, जो उचित समय पर हमको पूर्ण मात्रा में प्रतिफल देता है।

कर्म दो प्रकार के हैं :

सकाम कर्म – स्वयं के लाभ के लिए कर्म

निष्काम कर्म – स्वार्थहीनता वाले कर्म

स्वार्थपूर्ण विचार और कर्म ‘मेरे’ और ‘तेरे’ के बीच द्वन्द्वता (दो अलग-अलग होने की भावना) को और अधिक गहरा करते हैं। तथापि निष्काम-स्वार्थहीन होने की भावना हमको हमारे क्षुद्र अहंकार की सीमा से बहुत अपार और सुदूर ले जाता है यह सभी की एकता की ओर अग्रसर करता है। सकाम कर्म हमें चौरासी का चक्र (मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र) से बांधता है। निष्काम कर्म हमें इससे स्वतन्त्र कर देता है।

ढ़ाई करके भी नौकर बनने के लिए ही किये जाते हैं, इसलिए कर्मयोग प्रधान हो गया | अब कोई शांत बैठा दिख जाए किसी को, तो पेट में दर्द होने लगता है | ऐसा लगता है मानो उसके दिन रात की मेहनत की कमाई या अकेला बैठा आदमी उड़ा रहा है |

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तो व्यक्तिगत स्वार्थों को सर्वोपरि मानने वाले ये लोग मुझे कर्मयोग सिखाने चले आते हैं | ये निःशुल्क जो पोस्ट लिखता हूँ, यह निःशुल्क जो कुछ भी आप लोग मेरे ब्लॉग या आईडी में पढ़ते हैं… क्या यह सब कर्म नहीं है ? और कितने पैसे देते हैं आप लोग मुझे लिखने के लिए ? मुफ्त में पढने के बाद मुझे ही हरामखोर और मुफ्तखोर कहते हुए शर्म नहीं आती ?

चार डिग्रियाँ क्या बटोर ली, किसी निजी या सरकारी कम्पनी में नौकर क्या बन गये.. हम भगवाधारी हरामखोर दिखाई देने लगे ? अरे आप लोगों से तो वह काम भी ठीक से नहीं होता जिसकी तनखा लेते हो, फिर वह बैंक हो, या आइएस, आइपीएस या सांसद या मंत्री | और मुझे कर्मयोग सिखाने चले आते हैं |

मैं जो कुछ लिखता हूँ या समझाना चाहता हूँ, समझ में नहीं आता तो मुझे ब्लॉक कर दिया करें, यहाँ उल्टियाँ करने की कोई आवश्यकता नहीं है | यदि आप मेरा सम्मान नहीं कर सकते, तो मुझे फ्रेंडरिक्वेस्ट भी न भेजें… मैं निंदक नियरे राखिये वाले सिद्धांत का अनुयाई नहीं हूँ | मेरी निंदा करनी है तो मेरे ब्लोग्स हैं, फेसबुक पेज हैं, ट्विटर अकाउंट है… उसपर जाकर निंदा कीजिये.. मुझे कोई आपत्ति नहीं है |  लेकिन पर्सनल आईडी में घुसपैठ मत करिए क्योंकि वहां मैं जो कुछ भी लिखता हूँ, यह मानकर लिखता हूँ कि मेरे सर्कल में जो लोग हैं, वे मुझे समझते होंगे | इसलिए वे लेख आप लोगों की समझ के परे ही रहेंगे, अतः दूर रहे हैं वहाँ से |

संन्यासी हरामखोर नहीं होता लेकिन आप लोगों की समझ में के परे अवश्य होता है | क्योंकि आप लोगों ने भगवान् से लेकर साधू-संत, संन्यासी, सूफीसंत… सभी के लिए पटरियाँ बिछा रखीं हैं | और जो उन पटरियों से भिन्न दिशा पकड़ता है, वह हरामखोर दिखाई देने लगता है | आपको मोदी की चापलूस साधू संत श्रद्देय दिखाई देते हैं, समाज को धर्म और जाति के नाम पर आपस में लड़ाने वाले योगी, साधू-साध्वी श्रद्धेय दिखाई देते हैं, लेकिन मेरे जैसे संन्यासी हरामखोर और पाखंडी दिखाई देते हैं | दोष मेरा नहीं, आप लोगों के मानसिक व शैक्षणिक दरिद्रता का है | ~विशुद्ध चैतन्य

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