वसुधैव कुटुम्बकम + सर्वधर्म समभाव + पंथनिरपेक्षता = सेकुलरिज्म

आज हम अपने ही मूल भारतीय संस्कार व सिद्धांत से भटक गये हैं और साम्प्रदायिकता को महत्व देने लगे | केवल कुछ मूढ़ धार्मिक विद्वानों के प्रभाव में आकर | जो श्रेष्ठ विचार हमारे ग्रंथों में दिए गये उसे ही हम बिसार दिए और गालियाँ दे रहे हैं सर्वधर्म समभाव की भावना को ? जरा पढ़िए तो सही कि क्या कहते हैं हमारे ग्रन्थ और कर क्या रहे हैं हम:

जनं विभ्रति बहुधा, विवाचसम्, नाना धर्माणंम् पृथ्वी यथौकसम्।
सहस्र धारा द्रवीणस्यमेदूहाम, ध्रिवेन धेनुंरनप्रस्फरत्नी।।

अर्थात विभिन्न भाषा, धर्म, मत आदि जनों को परिवार के समान धारण करने वली यह हमारी मातृभूमि कामधेनु के समान धन की हजारों धारायें हमें प्रदान करें। -अथर्व वेद के 12वें मण्डल के प्रथम अध्याय

सेकुलरिज्म को गाली देने वाले आज राष्ट्र को ऐसी स्थिति में ले आये जहाँ सभी आपस में ही लड़-मर रहे हैं और नेताओं और उनके दुमछल्लों की रोटियाँ सिंक रहीं हैं निर्दोषों और मासूमों के चिताओं में | कहीं आदिवासियों और किसानों की भूमि छिनी जा रही है तो कहीं जातिवाद और साम्प्रदायिकता के ज़हर को हरा भरा रखने के प्रयास किये जा रहे हैं | ताकि लोग आक्रोश और क्रोध से भरे रहें और फिर चुनाव से पहले इसी चिंगारी को सुलगा कर दंगा-भड़काया जा सके |

लोग मर रहे हैं आतंकवाद और दंगों में लेकिन राष्ट्रवाद और धर्म के नाम पर धन और सत्ता के लोभी, कुर्सी और अय्याशी के खेल में डूबे हुए हैं | सभी इसी उधेड़बुन में लगे हुए हैं कि जितना हो सके लूट लो देश को फिर तो इन्हें लड़ता-मरता छोड़ कर हम विदेशों में सेटल हो जायेंगे |

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दुमछल्लों का कोई ईमानधर्म तो होता नहीं सो फेक आईडी बना बना कर राष्ट्र को गुमराह किये रहते हैं क्योकि उनके आकाओं ने उनको यही काम दे रखा है | दुःख तब है जब किशोर और युवाओं को ऐसे कामों में संलिप्त पाता हूँ | वे इसे एडवेंचर और खेल के रूप में लेते हैं और नहीं जानते कि इसके दुष्परिणाम कितने भयावह होते हैं |

शरीफों को तो तमाशा देखना होता है, जहाँ भी देखने मिल जाये और बहाने होते हैं उनके पास कि “हमारे पास तो हथियार नहीं हैं, उनके पास हैं,”….. “हम तो बाल बच्चेदार हैं,”….. “गुंडों-मवालियों के मुँह कौन लगे”…… “हमें तो अपनी जान प्यारी है.”…….

लेकिन जब दंगा होता है, तब ये गुंडे-मवालियों और फेक आईडी से ज़हर उगलने वालों का कुछ नहीं बिगड़ता और न ही बिगड़ता है कुछ इनके आकाओं का | प्रभावित होते हैं हम और आप जैसे भीरु प्रवृति के शरीफ लोग | कानून शरीफों को तुरंत सजा सूना देगी लेकिन उद्ददंड और अपराधी प्रवृति के लोगों के उत्पात को शान्ति से देखेगी और पकड़े भी गये तो कुछ नहीं बिगड़ता उनका | शरीफों की शराफत उन्हें और अधिक उद्ददंड बना देती है और मुठी भर गुंडे आकर सौ शरीफों को धमका कर चले जाते हैं |

वास्तविक जीवन में इनका विरोध करना तो छोड़िये, फेसबुक पर भी खड़े होकर तमाशा देखते रहते हैं कि पता नहीं कहीं फेसबुक से निकल कर ही न मार दे | मौत का यही डर आप लोगों को इंसानों की ज़िन्दगी नहीं जीने देती, जबकि ये मवाली सारे ऐश करके मरते हैं | ये सड़क-छाप राष्ट्रभक्त और धर्म-रक्षकों के कारण आज राष्ट्र कमजोर से कमजोर हुआ जा रहा है और आप लोग अभी भी तमाशा देख रहे हैं ?

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एक आतंकवादी सर पर कफन बाँध कर निकलता है निर्दोषों को मारने लेकिन हम उनका विरोध करने तक साहस नहीं जुटा पाते ! अपराधी अपराध करते हुए नहीं काँपता, लेकिन शरीफ लोग विरोध करते हुए भी काँपते हैं ! गोली से अपराधी भी मरते हैं, और शरीफ भी लेकिन कम से अपराधी को इस बात को सुकून तो होता ही होगा कि वह कायरों की मौत नहीं मरा ? लेकिन शरीफों की मौत और भेड़ों की मौत में मुझे कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखता | यदि मुट्ठीभर उपद्रवियों से सरकार और कानून डरी रहती है, तो सोचिये हम 80% सामान्य नागरिक यदि संगठित स्वर में विरोध करें तो क्या होगा ?

हम जैसे लोग तो आते हैं और मिट जाते हैं लेकिन ये शरीफों की नींद और कायरता टूटने का नाम ही नहीं लेती | कल हम फिर मिटा दिए जायेंगे लेकिन फिर आयेंगे जगाने के लिए सबको… क्योंकि जबतक आप लोग कायरता भरी नींद में पड़े रहेंगे हमें आना ही पड़ेगा | ~विशुद्ध चैतन्य

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