बुद्ध नहीं, धनानन्द बनना चाहते हैं लोग

प्रश्न उठता था मन में बार-बार कि लोग बुद्ध, जीसस, महावीर का नहीं, धनानन्द, लुच्चों-लफंगों का अनुसरण करते हैं…लेकिन क्यों ?

बरसों तक कारण नहीं समझ में आया लेकिन जब समझ में आया, तब आश्चर्य में पड़ गया | तब पहली बार ज्ञात हुआ कि न तो बुद्ध का ज्ञान पूर्ण है और न ही महावीर का और न ही जीसस का | सभी ने जो भी ज्ञान प्राप्त किया, वह कुछ विशेष वर्गों के लिए ही था, सम्पूर्ण मानव जाति के लिए नहीं | और यही कारण है कि इस्लाम, ईसाई, हिन्दू, बौद्ध, जैन, काँग्रेसी, भाजपाई, सपाई, बसपाई, शिवसेना, बजरंग दल, मोदी सेना, भीम आर्मी……और न जाने कितने अलग अलग सम्प्रदाय, पंथ, संगठन बन गये | सभी के अपने अपने आराध्य या आदर्श हैं, सभी की मान्यता है कि वे ही सही हैं, बाकि सभी गलत | सभी यही मानते हैं कि उनके ही दड़बे में इन्साफ होता है, उन्हीं के दड़बे में सुख-समृद्धि मिल सकती है, उन्ही के दड़बे का ईश्वर महान है, दयालु है, कृपालु है, दुःख हर्ता, दुःख भंजन है |

लेकिन जब मैं उन दडबों में झांककर देखता हूँ तो सभी की स्थिति एक ही जैसी है | सभी भगवान् और सरकार भरोसे बैठे हैं, सभी में दुखी-पीड़ित और शोषित हैं, सभी में अत्याचारी, अन्यायी, शोषक, धूर्त-बेईमान, कपटी, माफिया, ठग, लुटेरे पाए जाते हैं | और सभी “मैं सुखी तो जग सुखी” के सिद्धांत पर जीते हैं |

सभी दडबों में आतंकी पाए जाते हैं, सभी दडबों में हत्यारे और बलात्कारी पाए जाते हैं लेकिन सभी मानते हैं कि उनका दड़बा महान है | सभी दड़बों में कुछ विद्वान लोग होते हैं, जिन्हें अपने दड़बे के शोषित पीड़ित, भूखे, गरीब, बेबस लाचार लोग दिखाई नहीं देते | और यही विद्वान दूसरे दड़बों में अपना जाल फैलाए बैठे रहे हैं कि हमारे दड़बे में आ जाओ, स्वर्ग मिलेगा, जन्नत मिलेगा, हूरें मिलेंगी, सुख मिलेगा, समृद्धि मिलेगा |

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वास्तविकता यह है कि जितने भी वाद हैं, पंथ हैं वे सब पोखर, तालाब और दडबों में रूपांतरित हो चुके हैं | रट्टामार ज्ञान परोसा जाता है, और वही तोतों की तरह दोहराते हुए सारा समाज गिरता चला जा रहा है | अध्यात्मिक या धार्मिक होना किसी को रास नहीं आता क्योंकि यह सब सुनने में देखने में ही अच्छा लगता है | किस्से कहानियों, फिल्मों, आसमानी, हवाई किताबों में पढ़ने में अच्छा लगता है, लेकिन आचरण में उतरने में अपने ही प्राणों का संकट दिखाई पड़ने लगता है | और यही कारन है कि न कोई गौतम बुद्ध बनना चाहता है, न ही कोई महावीर बनना चाहता है और न ही जीसस |

समाज धनानन्द का अनुयायी है न कि बुद्ध महावीर जीसस का

समाज ने कभी भी आत्मचिंतन करने की आवश्यकता ही नहीं समझी | समाज ने कभी भी अपने ही समाज में झाँककर देखने की आवश्यकता नहीं समझी, केवल दूसरे समाज की बुराइयाँ खोजने में व्यस्त रहे है और किस्से कहानियों में सुनी अपने पूर्वजों और अपने समाज की महानता बघारने में ही व्यस्त रहे | कुछ समाज में तो मोदीवाद या इस्लामवाद लागू है | उन समाजों में अपने ही गिरबान में झाँकना गुनाह माना जाता है | और यदि कोई उनके समाज की कोई कमी बता दे तो उसे ईशनिंदक या देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है | जैसे मोदीवादियों की स्थिति है कि अपने अराध्य के विरुद्ध वे कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं, चाहे वह कितना ही घटिया इंसान क्यों न हो |

यदि सभी दडबों के अनुयाइयों के व्यवहारों को ध्यान से देखें, तो आप पाएंगे कि अधिकांश धनानन्द, हिटलर, मुसोलिनी, मोदी, इस्लामवादी ही हैं | इनमें स्वयं के समाज और व्यवहारों में कोई कमी नहीं दिखाई देती, जैसे मोदीभक्तों या अन्य राजनैतिक दलों के नेताओं के भक्तों को अपने नेता या दल में कोई कमी नहीं दिखाई देती | परिणाम यह होता है कि उनके ही समाज के आदर्श ग्रंथों की आदर्श शिक्षायें किताबी बनकर रह जाती हैं | यदि उनके ग्रंथो में कहा गया कि अपने पडोसी का ध्यान रखो, तो उसके भले के लिए ध्यान रखने की बजाय इस बात का ध्यान रखने लगते हैं कि कहीं वह तरक्की तो नहीं करने लगा | यदि तरक्की कर रहा है तो उसकी बुराइयाँ खोजो, उसे नीचे गिराओ |

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अब जीसस और उनके अनुयाइयों का ही उदाहरण ले लीजिये | जीसस ने कहा कि कोई आपके एक गाल में थप्पड़ मारे दूसरा गाल आगे कर दो, कोई आपकी हत्या का षड्यंत्र करे, तब भी उसे माफ़ कर दो | लेकिन उनके अनुयाई कर क्या रहे हैं ?

आतंकियों ने वर्ल्डट्रेड सेंटर गिरा दिया तो जीसस ने उनके लिए दूसरा वर्ल्डट्रेड सेंटर नहीं बना दिया, उलटे अफगनिस्तान पर ही आक्रमण कर दिया | जीसस ने कहा था कि जिन्होंने तलवार उठा रखा है, वे सब तलवारों से ही नष्ट हो जायेंगे |

जीसस कहना चाहते थे कि युद्धोन्माद से बचो, हर विवाद को तलवारों से नहीं सुलझाया जा सकता | वे समझाना चाहते थे कि अस्त्र शस्त्रों को अधिक महत्व मत दो….लेकिन आज सभी देश हथियारों की होड़ लगाए बैठा है | अपने देश के विकास पर ध्यान देने से अधिक हथियारों और सेनाओं पर ध्यान दे रहा है |

और तलवार सबसे पहले किसने उठाया यह कौन तय करेगा ? कैसे पता चलेगा कि पहला तलवार किसने और कब उठाया था ?

अब सारा समाज ही धन के पीछे दौड़ रहा है, अधिक से अधिक पाने की होड़ में पड़ा हुआ है, धन की भूख है कि मिट ही नहीं रही….ऐसे में कोई गौतम बुद्ध, महावीर या जीसस भला क्यों बनना चाहेगा ?

हर कोई डरा हुआ दूसरे दड़बों के अनुयाइयों से तो स्वाभाविक है कि हथियारों की होड़ ही बढ़ेगी | ऐसे में बुद्ध बनकर कोई मरना क्यों चाहेगा ? कौन चाहेगा कि उसे सूली पर चढ़ा दिया जाए और उसके मुँह से गाली निकलने की बजाय निकले, “हे प्रमु इन्हें माफ़ कर देना, ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं” |

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जिनके पास अथाह धन है, सारी सुख सुविधाएं हैं, सारे ऐश्वर्य भोग रहे हैं…..वे संतुष्ट नहीं हैं, वे बुध्द नहीं बनना चाहते, वे महावीर नहीं बनना चाहते, वे जीसस नहीं बनना छाहते…उनकी भूख शांत नहीं हो पा रही, तो फिर जो अभावों में जी रहे हैं, घुट घुट कर जी रहे हैं, दो वक्त की रोटी भी ढंग की नहीं खा पा रहे…उन्हें बुध और महावीर की कहानियां सुनाने का क्या लाभ ? उनसे हम कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वे बुध बन जाएँ, महावीर बन जाएँ, जीसस बन जाएँ ?

तो समाज जब तक मूल भुत समस्याओं को सुलझाने के लिए गंभीर नहीं होगा, जब तक वह धूर्त-मक्कार नेताओं की चाटुकारिता में मगन रहेगा, निश्चित मानिये कि समाज आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं हो पायेगा और नहीं सुखी व समृद्ध हो पायेगा | चाहे ऐसे समाज के पास कुबेर का खजाना आ जाये, ये सब अम्बानी-अडानी की तरह ही कर्जों में डूबे रहेंगे |

~विशुद्ध चैतन्य

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