मतदान आपका अधिकार, किन्तु प्रश्न करना देशद्रोह

राजनैतिक पार्टियाँ जनहितों को ध्यान में रखकर नेता नहीं चुनती, यह देखकर चुनती हैं कि किस नेता से जनता डरती है, किसके पास गुंडे-मवालियों की सेना अधिक है और कौन सा नेता पार्टी को अधिक से अधिक आर्थिक लाभ पहुंचाता है | फिर चाहे वह नेता कुछ भी न करे, केवल फ़िल्मी या क्रिकेट सितारों की तरह बन-संवर कर घूमते रहें | पार्टियों को अपना बैंक बेलन्स बढ़ाना होता है, विकास के नाम पर जनता व देश को लूटने के नए नए हथकण्डे अपनाने होते हैं |

संविधान में पार्टियों द्वारा वोट लड़े जाने का प्रावधान नहीं था लेकिन बाद में इसे स्वीकृति दी गयी | पार्टियों द्वारा चुनाव लड़ा जाना कुछ वैसा ही होता है, जैसे भारत में रोमन, मुग़ल, ब्रिटिश, पुर्तगाली, फ्राँस आदि अपनी अपनी सेनायें लेकर आ जाएँ और भारतीयों से कहें कि वे खुद चुन लें कि किसकी गुलामी पसंद करेंगे |

जीतने के बाद पार्टियाँ जनता के साथ वैसा ही व्यवहार करती हैं, जैसा व्यव्हार कोई विदेशी आक्रान्ता पराजित राज्य के साथ करता है | जनता की आवाज दबा दी जाती है, विरोध करने वालों को देशद्रोही कहा जाता है और उनपर देशद्रोह का आरोप लगाया जाता है | मिडिया भी जनता के हितों को महत्व देना बंद कर देती है और रखैल का जीवन जीने लगती है | भाण्ड पाले जाते हैं जो विजेता की झूठी प्रशंसा करते फिरते हैं, जो शोषण व अत्याचार की खबरें सामने लाता है, उसे देशद्रोही कहकर जेल में डाल दिया जाता है या उसे बेबस और लाचार बनाकर छोड़ दिया जाता है |

और यह सब कोई पहली बार नहीं हो रहा, आदिकाल से यही होता चला आ रहा है | फिर भी भारतीय समाज आज तक इतना उन्नत व जागृत नहीं हो पाया कि वह अपने ही देश की इस अव्यवस्था को सुधार सके | आज भी हमें अपने नेता चुनने का अधिकार नहीं है, आज भी राजनैतिक दल ही नेता चुनते हैं और जनता से कहा जाता है कि इनमें से किसी को अपना नेता चुन लो |

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जैसे पहले स्वयंवर में राजाओं राजकुमारों के शौर्य व पराक्रम के विषय में बताया जाता था, ठीक इसी प्रकार आजकल यह बताया जाता है कि किस पर किन किन अपराधों के मुकदमें चल रहे हैं | नेताओं के विषय में यह नहीं बताया जाता कि उसने कौन कौन से जनहित के कार्य किये और उन कार्यों में कितने सफल रहे |

और आप कहते हैं कि अधिक से अधिक संख्या में वोट डालने पर व्यवस्था में सुधार होगा | मेरी समझ में नहीं आता कि कैसे होगा ? चुनना तो उन्हें ही है जिन्हें पार्टियों ने चुना है और वे सब कोई देश या जनता के हितों के लिए तो राजनीती में आते नहीं है | वे तो केवल लूट-पाट के उद्देश्य से ही आते हैं | पांच वर्षों में वे जनता को लूटकर कई गुना संपत्ति बढ़ा लेते हैं, लेकिन जनता वहीं की वहीं रह जाती है | ऐसे में वोट डालकर आप अपना कौन सा दायित्व निभा रहे हैं ?

क्या चुने गये नेताओं से आप सवाल कर पाने का साहस रखते हैं ? या फिर केवल वोट डालने भर का दायित्व है आपका, फिर चाहे देश का बेडागर्क हो, कोई फर्क नहीं पड़ता ?

यदि लुटेरों को ही देश सौंपने को आप अपना दायित्व समझ रहे हैं, वोट डालकर गौरवान्वित हो रहे हैं तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं इस दुनिया में |

लुटेरों, गुंडों-मवालियों की सरकार जब चाहे आप पर कोई भी कानून थोप सकती है, आपके खून पसीने की कमाई लूट सकती है नोटबंदी के नाम पर | आपके बेंक लुटवा सकती है और लुटेरों को ससम्मान विदेश भिजवा सकती है | बाद में चुनावी सीजन में उन लुटेरों को पकड़कर लाने की नौटंकी कर सकती है, लूट का माल वापस बैंकों तक कभी नहीं पहुँचता क्योंकि वह ठिकाने लगा दिए जाते हैं तब तक |

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झूठी खबरें, किस्से कहानियाँ सुनाई जायेंगी सेना के नाम पर, सेना की आढ़ लेकर और आप सवाल उठायें, प्रमाण माँगे तो आपको देशद्रोही कहा जाएगा | क्या आप इसीलिए वोट देते हैं ? क्या इसीलिए ही नेता चुनते हैं ? चुनाव हो जाने के बाद आपके पास क्या अधिकार है कि गलत चुने नेता को आप हटा सकें बिना अगले चुनाव की प्रतीक्षा किये ?

यदि आपके पास सरकार से सवाल करने का अधिकार नहीं है, आपके पास उनके झूठे किस्से कहानियों पर विश्वास करने के लिए प्रमाण मांगने का अधिकार नहीं है, आपको यह जानने का अधिकार नहीं है कि आपके चुने हुए नेता ने अपने क्षेत्र के विकास व हितों के लिए कौन कौन से काम किये….तो क्या लाभ ऐसे दायित्वों को निभाने का, जिसमें हानि जनता व देश को ही होता है ?

~विशुद्ध चैतन्य

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