चुनावी सीजन और प्रजा की नियति

हर सीजन का अपना महत्व है और उस सीजन से जुड़े त्यौहार या खेलों का अपना महत्व | हर कोई सीजन के त्योहार या खेलों के रंगों में रंगा होता है, हर कोई उसी विषय में चर्चा कर रहा होता है, किसी और विषय में किसी की कोई रूचि ही नहीं होती | जब क्रिकेट का सीजन चल रहा होता है, तब हर जगह क्रिकेट की ही चर्चा चल रही होती है | क्रिकेट ही की तरह लोकप्रिय खेल है ‘चुनाव’ यानि ‘Election’, इसका भी अपना सीजन होता है और इस सीजन में हर कोई चुनावी रंग में रंगा होता है | हर कोई अपने-अपने नेता और नेताओं, पार्टियों के स्तुतिगान और विरोधी पार्टियों की निंदा के मद में मस्त झूम रहा होता है |

बस हम जैसे संन्यासियों पर किसी भी अप्राकृतिक सीजन का कोई रंग नहीं चढ़ता | हाँ प्राकृतिक सीजन का रंग अवश्य चढ़ता है और जैसे पशु-पक्षी, वृक्ष, फूल-पौधे झूमते हैं हम भी झूमते हैं | लेकिन अप्राकृतिक यानि क्रिकेट और चुनाव जैसे सीजन का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता | जानते हैं क्यों ?

क्योंकि हम राजनैतिक पार्टियों, नेताओं और उनके समर्थकों, चाटुकारों और मतदाताओं से भी कई गुना अधिक स्वार्थी और अहंकारी होते हैं | “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना” वाली कहावत हम जैसे स्वार्थी अहंकारी संन्यासियों पर लागू नहीं होती |

क्रिकेट मुझे बचपन से ही कभी रुचिकर नहीं लगा, क्योंकि उससे मुझे कोई लाभ नहीं होता | न तो मुझे कोई सामान्य ज्ञान प्राप्त होता है, न कोई अध्यात्मिक ज्ञान और न ही कोई आर्थिक लाभ | खिलाड़ियों को अवश्य आर्थिक लाभ होता है, आयोजकों को आर्थिक लाभ होता है, सटोरियों को आर्थिक लाभ होता है….लेकिन मुझे कोई लाभ नहीं |

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ठीक इसी प्रकार चुनाव है | इसमें भी खिलाड़ियों को लाभ होता है, आयोजकों यानि पार्टियों और चन्दा देने वालों को लाभ होता है, लेकिन मुझे कोई लाभ नहीं होता | न ही देशवासियों को कोई लाभ होता है और न ही देश को कोई लाभ होता है | हाँ कुछ लोग मुझसे अवश्य असहमत होंगे, जिन्हें दो हज़ार रूपये, या छः हज़ार रूपये मिलेंगे या मिल चुके हैं अनुदान के रूप में | वे भी मुझसे असहमत होंगे जो राजनैतिक पार्टियों के आईटी सेल के वेतनभोगी हैं | क्योंकि उन्हें भी तीस चालीस हज़ार रूपये मिल ही जाते हैं विरोधियों के पोस्ट पर गाली-गलौज करने, ट्रोल करने के पारिश्रमिक के रूप में |

और सबसे बड़ी बात यह कि स्वार्थ में अंधी जनता को उसी के स्वार्थ और लोभ के जाल में घेर कर ये नेता और राजनैतिक पार्टियाँ ऐसा अँधा कर देती हैं कि हर कोई यही समझ रहा होता है कि वे गुंडों-मवालियों और लुटेरों की गेंग को अपना चुनकर राष्ट्रभक्ति निभा रहे हैं | आपको पता होता है कि जिस सामन्त को चुनने के लिए आपके सामने प्रस्तुत किया गया है, वही आपको लूटेगा, वही आपकी भूमि आपसे छीनेगा, वही आपके खून पसीने की कमाई ठग कर ले जाएगा….फिर भी चुनावी सीजन के नशे में धुत्त होकर उन्हें वोट कर देते हैं | और उसके बाद पाँच वर्षों तक उन्हें कोसते हुए अपना सर पीटते हैं | और अगले चुनावी सीजन में नशे में धुत्त होकर फिर वही गलती दोहराते हैं |

खैर….कोई बात नहीं….इसी को नियति कहते हैं | ईश्वर ने विवेक दिया है, उसका प्रयोग न करने की कसम खा रखी है सभी ने और शायद विवशता भी है | क्योंकि विवेक बुद्धि तो राजनैतिक पार्टियों के पास गिरवी रख दी है, तो उसका प्रयोग करेंगे भी कैसे ?

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~विशुद्ध चैतन्य

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