त्राटक; एक जीवन शैली

अधिकांश साधक त्राटक को मात्र ध्यान की एक विधि समझते हैं | वास्तव में त्राटक एक जीवन शैली है | आइये समझाता हूँ कि कैसे ?

सोशल मिडिया आने के बाद से मानव के जीवन में बेचैनी अधिक बढ़ गयी, क्योंकि यहाँ दुनिया भर से लोग केवल अपने अपने समाज, सरकार या परिवार के दुखों को ही अधिक शेयर कर रहे हैं | कहीं औरत जलाकर मार दी गयी, तो कहीं बलात्कार हो गया, तो कहीं पुलिस कस्टडी में किसी की मौत हो गयी, तो कहीं किसानों या शिक्षकों पर लाठी चार्ज…..आप दिन भर यही सब पढ़ते रहते हैं अनचाहे ही | और फिर ऐसी पोस्ट करने वाले आपसे यह भी अपेक्षा रखते हैं कि आप उनकी पोस्ट को लाइक करें, शेयर करें अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचायें समाज को जागृत करने की दुहाई देकर | और आप एक सच्चे नागरिक होने के नाते ऐसा करते भी हैं |

लेकिन इस सब से होता क्या है ?

लाभ आपको कुछ नहीं होता, सिवाय इसके कि आपके मन की एकाग्रता छिन जाती है | आपके सबकॉन्शियस माइंड में यह सन्देश फीड हो जाता है कि दुनिया बहुत बुरी है, हर तरफ शोषण, अत्याचार, हाहाकार मचा है | और दुनिया भर का हाहाकार आपके मस्तिष्क में समा जाता है | परिणाम यह होता है कि मस्तिष्क एक कबाड़घर बनकर रह जाता है | आप दुनिया की सभी समस्याएँ नहीं सुलझा सकते लेकिन फिर भी दुनिया की सभी समस्याएँ सर पर ढोते फिरते हैं |

लुटेरे लूट ही रहे हैं सदियों से, राजनेता जनता को उल्लू बना रहे हैं सदियों से, अमीर और अमीर होते चले जा रहे हैं, गरीब और गरीब होते चले जा रहे हैं….जबकि सोशल मिडिया में सबसे अधिक जाग्रति के आन्दोलन चल रहे हैं | और वह भी राजनेताओं और पूंजीपतियों के दिशा निर्देशों पर | घूम फिर कर आप फिर किसी न किसी राजनैतिक, साम्प्रदायिक, जातिवादी दड़बे में कैद हो जाते हैं और परिणाम कुछ भी सार्थक नहीं आता | न तो आप ही ऊपर उठ पाते हैं और न ही समाज ऊपर उठ पाता है | न तो राजनेता सुधरते हैं और ना ही धर्म व जाति के ठेकेदार सुधरते हैं |

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त्राटक एक बीस मिनट तक किया जाने वाला वह अभ्यास है, जिससे आप यह सीखते हैं कि कैसे अपने मस्तिष्क को एकाग्रचित किया जाए | एक बार समझ में आ गया, तो फिर यह आपके जीवन में भी दिखने लगता है | आप किसी एक विषय को चुनते हैं, और उसपर एकाग्रचित हो जाते हैं | जैसे क्रिकेटर केवल क्रिकेट में ध्यान लगाता है और वह सफल क्रिकेटर बन जाता है | वह दुनिया भर की समस्याओं को सुधारने का ठेका लेकर नहीं बैठता | दुनिया में जितने भी अमीर व समृद्ध लोग हैं, वे समाज सेवा भी करते हैं, तो अपनी सुख-शांति भंग करके नहीं करते | वे अपने सुखों को महत्व देते हैं | वे अपने व्यवसाय पर ध्यान देते हैं और उसे आगे बढ़ाने के विषय में सोचते हैं | यदि वे भी ग़रीब लाचार समाज सेवियों की तरह केवल दूसरों की समस्याएँ ही सुलझाने में लग जाएँ, तो वे भी आजीवन गरीब ही रहेंगे ऊपर नहीं उठ पायेंगे | कोई राजनेता यदि जनता की समस्या सुलझाने लग जाए, तो वह भी पाँच वर्षों में कई गुना अधिक संपत्ति नहीं अर्जित कर सकता | क्योंकि समस्याएँ कभी समाप्त नहीं होतीं और वह आजीवन समस्याओं में ही उलझा रहेगा, अमीर नहीं हो पायेगा |

त्राटक का अभ्यास व्यक्ति को यह सिखाता है कि स्वयं को एकाग्रचित करो | स्वयं को केंद्र में लाओ और उन विषयों पर ध्यान एकाग्रचित करो, जिनसे आपके स्वयं का उत्थान होता है | प्रत्येक व्यक्ति को अपना उत्थान स्वयं ही करना होता है, कोई दूसरा नहीं आएगा उठाने | और ऊपर उठने के बाद फिर यदि लगता है कि समाज की सेवा करनी है, दुखियों की सहायता करनी है, तो अवश्य करिए | वैसे ऊपर उठने के बाद यदि लोग जनसेवा, समाज सेवा या राष्ट्र सेवा में रूचि लेते, तो कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथो में सारी दौलत सिमट कर न रह गयी होती |

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तो जो लोग समृद्ध हैं, जिनके पास अपार धन व राजनैतिक शक्तियां हैं, जब वे ही समाज सेवा, राष्ट्रसेवा व जन सेवा में रूचि नहीं लेते, तो मेरी तरह के गरीब, फुकरे, कंगाल लोग यदि समाज सेवा की डींगे हाकेंगे तो हास्यापद हो जाता है | अपनी सेवा तो कर नहीं पा रहे हैं, अपने लिए तो इतना भी धन नहीं जुटा पा रहे कि ढंग का खा-पी लें | और निकल पड़ते हैं समाज सेवा के लिए | न समाज का उत्थान कर पाते हैं आजीवन हम और ना ही स्वयं का |

सदैव स्मरण रखें:
दुनिया में हंम दुःख भोगने, अतृप्त रहने के लिए नहीं आये हैं | जैसे अमीरों को सारे ऐश्वर्य भोगने का अधिकार है, ठीक वैसे ही हमें भी है | जैसे अमीर लोग अपनी मेहनत, लगन व त्राटक से सुखी व समृद्ध होते हैं, वैसे ही हमें भी अपनी ही मेहनत, लगन व त्राटक से समृध होना है | लेकिन यदि हम दूसरों से छीनने की जुगत लगाते रहेंगे, आरक्षण की बैसाखी थामे रहेंगे, तो निश्चित मानिए कि हम कभी भी समृद्ध नहीं हो पाएंगे | न तो बिलगेट आरक्षण की बैसाखी लिए अमीर बना, न ही धीरूभाई अम्बानी, न टी सिरीज़ का गुलशन कुमार और न ही बाबा साहेब अम्बेडकर | अतः त्राटक को अपने जीवन में अपनाइए, अपनी रूचि पर ध्यान केन्द्रित करिए, अपने उद्देश्यों पर ध्यान केन्द्रित करिए, मार्ग स्वतः ही प्रशस्त होता चला जायेगा |

~विशुद्ध चैतन्य

त्राटक योग की विधि

  • सबसे पहले आप सिर, गर्दन एवं पीठ को सीधा रखते हुए किसी अंधेरे कमरे में ध्यान की मुद्रा में बैठें और आँखों को बंद कर लें।
  • जिस वस्तु पर ध्यान केंद्रित करना हो उसे नेत्रों के समांतर ऊंचाई पर रखा होना चाहिए। आप मिट्टी के दीपक में घी से जली ज्योति को प्रकाश ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।
  • जलती हुई मोमबत्ती अथवा जलते हुए मिट्टी के दीपक को आंखों से लगभग डेढ़ गज अथवा ढाई फुट की दूरी पर आंखों के ही समांतर ऊंचाई पर रखीं होनी चाहिए।
    अब आप बंद आखों को खोलें और जलते हुए मिट्टी के दीपक की ज्योति को तब तक देखते रहे जब तक आंखें थक नहीं जातीं या आंसू नहीं निकल आते। अब आंखें बंद कर लें और विश्राम करें।
  • इस क्रिया को 3 या 4 बार दोहराएं, जब तक कि व्यक्ति बिना पलक झपकाए 10 या 15 मिनट के लिए दृष्टि जमाने का अभ्यस्त नहीं हो जाता।
  • ध्यान रहे जब आप ज्योति को देखते हैं तो पलक को नहीं झपकनी चाहिए।
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विशुद्ध चैतन्यरविंदर सिंहGAURAV JAIN Recent comment authors
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रविंदर सिंह
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रविंदर सिंह

हार्दिक धन्यवाद ,,
बहुत अच्छा लेख है ,,
अगर इससे किसी की जीवनशैली
में परिवर्तन आ जाता है तो खुशी है

GAURAV JAIN
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GAURAV JAIN

गुरुजी कमाल की बात लिखी है।