शूद्र ना पूजिए ज्ञान प्रवीणा

“पूजिए विप्र ज्ञान गुण हीना, शूद्र ना पूजिए ज्ञान प्रवीणा।”
-तुलसीदास (रामचरितमानस)

आज इन्टरनेट पर तुलसीदास रचित दोहे के इस अंश को खोजा तो पाया कि जितने भी दलित समाज उद्धारक हैं, सभी के पास अलग अलग रामचरितमानस है और सभी में दोहे भी अलग अलग तरह से लिखे गये हैं | सभी में व्याख्या करने वाले ने अपनी संकीर्ण, छुद्र व हीनभाव से ग्रस्त मानसिकता का ही परिचय दिया न कि विद्वता का | 

१. पूजहि विप्र सकल गुण हीना । शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा ।।

२. पुजिय विप्र शील गुण हिना ,शुद्र न गुण-गन ज्ञान प्रवीना

३. पूजिए विप्र जदपि ज्ञान गुण हीना, शूद्र ना पूजिए ज्ञान प्रवीणा।

४.पूजिय विप्र गुण हीना । तजिय शुद्र ज्ञान प्रवीना ।। 

सभी में लगभग व्याख्या कुछ इस प्रकार है:
रामचरित्र मानस में ब्राह्मण कवि कहते है की विप्र(ऊँची जात वाले) को गुण हीन होने पर भी पूजना चाहिये | इसके विपरीत शुद्र (obc) कितना भी ज्ञान प्रवीण गुणवान क्यों न हो उसे पूजना तो दूर उसे अपने करीब भी नही आने देना चाहिये उसे अपने से दूर हटाये | plz नोट- यह सब जन्म के आधार पर हैं न की कर्म या गुण .

ऐसी ही कई अन्य व्याखाएं मिल जायेंगी और इन व्याख्याओं में रामचरितमानस में जो कहा गया है, उसका मूल भाव ही तिरोहित कर दिया गया और अपनी मानसिकता थोप दी | ऐसी व्याख्याओं का मूल उद्देश्य केवल समाज में द्वेष फैलाना, जातिवादी प्रथा को बढ़ावा देना और समाज में अराजकता उत्पन्न करना मात्र है | न कि मूल ग्रन्थ का मूल भावार्थ प्रस्तुत करना |

यदि ग्रन्थ एक है, रचनाकार एक है…तो फिर दोहे अलग अलग कैसे ? यदि एक अक्षर भी गलत पड़ जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है, अल्पविराम या पूर्ण विराम भी गलत जगह पड़ जाये तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है….फिर यहाँ तो शब्द ही इधर-उधर हो रहे हैं इनमें तो |

मेरे पास जो रामचरित मानस है | उसके अनुसार दोहा कुछ इस तरह है:

सापत, ताड़त परुष कहंता | विप्र पूज्य अस गावहीं संता ||
पूजिअ बिप्र सील गुण हीना | सूद्र न जन गुण गन ज्ञान प्रबीना |

भावार्थ: शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ ब्राहमण भी पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं | शील और गुणों से हीन ब्राह्मण भी पूजनीय है | और गुणधर्मों से युक्त और ज्ञान में निपुण शूद्र भी पूजनीय नहीं है |

शूद्र क्या हैं पहले वह समझा देता हूँ

यदि शूद्र शब्दों को शास्त्रों के अनुसार समझने का प्रयास करता हूँ, तो बहुत उलझन हो जाती है, क्योंकि कोई अर्थ या व्युत्पति प्रभावित नहीं करती या सही नहीं लगती | और वे सही इसलिए नहीं लगती, क्योंकि वर्णों का अनुसार यदि देखें, तो शूद्र कोई निम्नकोटि की जाति या व्यक्तित्व नहीं है | जबकि अधिकांश विद्वानों का मत या परिभाषायें यह कहती हैं कि जो निम्नकोटि का है, वह शूद्र है | उदाहरण के लिए;

पाणिनि के व्याकरण में ‘उणादिसूत्र’ के लेखक ने इस शब्द की ऐसी ही व्यत्पत्ति की है, जिसमें शूद्र शब्द के दो भाग किए गए हैं, अर्थात् धातु ‘शुच्’ या शुक्+र।[11]प्रत्यय ‘र’ की व्याख्या करना कठिन है और यह व्युत्पत्ति भी काल्पनिक और अस्वाभाविक लगती है।[12]

पुराणों के अनुसार

पुराणों में जो परम्पराएँ हैं, उनसे भी शूद्र शब्द ‘शुच्’ धातु से सम्बद्ध जान पड़ता है, जिसका अर्थ होता है, संतप्त होना। कहा जाता है कि ‘जो खिन्न हुए और भागे, शारीरिक श्रम करने के अभ्यस्त थे तथा दीन-हीन थे, उन्हें शूद्र बना दिया गया’।[13] किन्तु शूद्र शब्द की ऐसी व्याख्या उसके व्युत्पत्यर्थ बताने की अपेक्षा परवर्ती काल में शूद्रों की स्थिति पर ही प्रकाश डालती है।

बौद्धों के अनुसार

बौद्धों द्वारा प्रस्तुत व्याख्या भी ब्राह्मणों की व्याख्या की ही तरह काल्पनिक मालूम होती है। बुद्ध के अनुसार जिन व्यक्तियों का आचरण आतंकपूर्ण और हीन कोटि का था[14], वे सुद्द[15] कहलाने लगे और इस तरह सुद्द, संस्कृत-शूद्र शब्द बना।[16]

यदि मध्यकाल के बौद्ध शब्दकोश में शूद्र शब्द क्षुद्र का पर्याय बन गया, [17] और इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि शूद्र शब्द क्षुद्र से बना है।[18]

दोनों ही व्युत्पत्तियाँ भाषाविज्ञान की दृष्टि से असंतोषजनक हैं, किन्तु फिर भी महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनसे प्राचीन काल में ‘शूद्र वर्ण’ के प्रति प्रचलित धारणा का आभास मिलता है।

समाज का प्रभाव

ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत व्युत्पत्ति में शूद्रों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया गया है, किन्तु बौद्ध व्युत्पत्ति में समाज में उनकी हीनता और न्यूनता का परिचय मिलता है। इन व्युत्पत्तियों से केवल इतना पता चलता है कि भाषा और व्युत्पत्ति सम्बन्धी व्याख्याएँ भी सामाजिक स्थितियों से प्रभावित होती हैं।

तो सभी ने जो भी अर्थ निकाले शूद्र के, वे सब सामाजिक मत-मान्यताओं से प्रभावित रहे और निष्पक्ष होकर मूल भाव समझने में चूक गये | क्योंकि शूद्र यदि निम्न कोटि का होता, मनुष्यों के चार प्रकार यानि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र स्वभाव के आधार पर न होकर जन्मजात जातियों पर आधारित होतीं | और तब चार ही प्रकार नहीं होतीं, न जाने कितने प्रकार की हो जाती |

मेरा अपना मत है कि मनु ने जो मानवों का वर्गीकरण किया था, वह मानवों के मूल प्रभावी स्वभाव व गुणों पर आधारित था | इस वर्गीकरण का उद्देश्य ऊँच नीच या जातिवाद नहीं था | इसका उद्देश्य बिलकुल वैसा ही था, जैसे आज ब्लडग्रुप का है | ब्लडग्रुप की खोज सर्वप्रथम सन 1901 में ऑस्ट्रिया के एक रोग विज्ञानी कार्ल लैंडस्टीनर ने A, B और O ब्लडग्रुप की खोज की थी, जिसमे पहले O ब्लडग्रुप का नाम C रखा गया था बाद में उसे बदलकर O कर दिया गया|

अब यदि कल A+ वाले स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर दें और O- वाले स्वयं को शूद्र या दलित घोषित कर दें तो क्या दोषी कार्ल लैंडस्टीनर ( Karl Landsteiner ) को माना जायेगा ? क्या कार्ल के इस शोधपत्रों का संस्कार का आयोजन किया जायेगा ? वह भी तब जबकि कार्ल ने ब्लडग्रुप केवल जनकल्याण के लिए खोजा था ?

जिस प्रकार एक ही माता पिता की चार संतानों में यह आवश्यक नहीं कि सभी का ब्लडग्रुप एक ही हो, ठीक वैसे ही एक ही माता-पिता से जन्में चार बच्चों में सभी ब्राहमण ही हों, या सभी शूद्र ही हों आवश्यक नहीं |

जैसे किसी एक शब्द के कई अर्थ और भाव होते हैं, ठीक इसी प्रकार शूद्र शब्द का भी है | शूद्र का अर्थ सेवक भी है, और अहंकार व विवेक शून्य भी है | सामान्यतः शूद्र वह वर्ग है, जो नौकरी यानि सेवा का कार्य चुनते हैं | क्योंकि वे बौद्धिक रूप से इतने योग्य नहीं होते, कि ब्राहमण हो पायें | न ही हृदय और शरीर से इतने शक्तिसंपन्न होते हैं कि क्षत्रियों का कार्य कर पायें और न ही वे कोई व्यवसाय ही कर पाने के योग्य होते हैं | ऐसे लोग शूद्र कहलाते हैं क्योंकि यदि इन्हें स्नातक की उपाधियाँ यानि डिग्रियाँ भी दे दी गयीं, तो व्यर्थ हो जाती हैं | ये डिग्रियाँ लेकर किसी नेता के चौखट पर बैठे नजर आते हैं, किसी राजनैतिक पार्टी या नेता के दुमछल्ले बन जाते हैं या फिर रोजगार कार्यालयों या आरक्षण केन्द्रों के चक्कर लगाते नजर आते हैं | क्योंकि ये कोई अलग मार्ग नहीं खोज पाते, ये शिक्षा का सदुपयोग कर पाने में असमर्थ होते हैं | यदि इन्हें राष्ट्रपति भी बना दिया जाए, तो ये हाथ जोड़े खड़े नजर आयेंगे अपने ही सलाहकारों के सामने | यदि ये पत्रकार बन गये तो रखैल बन जायेंगे नेताओं और राजनैतिक पार्टियों के | क्योंकि सेवा ही इनका मूल भाव है कोई अविष्कार करना, नेतृत्व करना या अपने ही लिए कोई नया मार्ग खोजना इनके बस की बात नहीं होती |

अब ऐसा नहीं है कि शूद्र ब्राहमणों, क्षत्रियों, वैश्यों के परिवार में नहीं पाए जाते | उनमें भी पाए जाते हैं | आप देख सकते हैं कई ऐसे लोग जिन्होंने अपने नाम के साथ पांडेय, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी….आदि ब्राह्मण जाति घोषक उपनाम यानि सरनेम लगा रखे हैं | लेकिन वे नम्बर एक के चाटुकार हैं, दलाल हैं | कई ऐसे होंगे जिन्होंने दलाली को ही अपनाया आजीविका के रूप में | इनमें स्वाभिमान नाम की कोई चीज नहीं होती, बस इन्हें पैसों से प्रेम होता है |

तो जब शूद्र कहा जा रहा है तो यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि किस सन्दर्भ में कहा जा रहा है | हो सकता है कि शूद्र का अर्थ हीनता न हो, केवल मानवों के मूल स्वभावों व गुणों की बात हो रही हो ?

स्मरण रखें: शूद्र का अर्थ दलित नहीं होता और न ही सभी दलित शूद्र होते हैं | दलितों में भी कई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य गुणधर्म वाले होते हैं | दलितों में भी कई सुलझे हुए उच्च मानसिकता के लोग होते हैं | और इसी प्रकार ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों में कई निम्न मानसिकता के लोग होते हैं, जो अपना स्वाभिमान, विवेक सबकुछ गिरवी रखकर अपने ही देश से विश्वाघात करने से नहीं चूकते |

ब्राह्मण होने का अर्थ श्रेष्ठ होना नहीं होता, ब्राह्मण होने का अर्थ है बौद्धिक कर्म में रूचि रखने वाला, जैसे कि पठन पाठन, अध्यापन, आविष्कारक, अन्वेषक आदि | इन्हें श्रेष्ठ तभी माना जाता है, जब ये लोग व्यक्तिगत स्वार्थों व हितों से ऊपर उठकर, सभी के हितों का चिन्तन करने लगते हैं | ये जो भी अविष्कार करते हैं, वे सभी के लिए उपयोगी हो जाते हैं…जैसे जुकरबर्ग का फेसबुक | यहाँ जुकरबर्ग ब्राह्मण हो गया और साम्प्रदायिक, राजनैतिक, जातिगत द्वेष, वैमनस्यता व अराजकता फैलाकर फेसबुक का दुरूपयोग करने वाले लोग शूद्र हो गये | क्योंकि इन्हें श्रेष्ठ प्लेटफार्म मिलने पर भी ये उसपर गंद ही फैलाते हैं, उत्पात ही मचाते हैं, अधार्मिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग करते हैं | यहाँ शूद्र का अर्थ हो जाएगा निकृष्ट व अधार्मिक कृत्यों में लिप्त लोग |

जिस फेसबुक को जूकर्बर्ग ने बिना कोई भेदभाव, ऊँच नीच किये सभी के लिए उपलब्ध करवाया, आज उसी प्लेटफार्म पर लोग ज़हर उगल रहे हैं, समाज को बाँट रहे हैं, आपसी सौहार्द बिगाड़ रहे हैं, समाज में फूट डाल रहे हैं | तो क्या जुकरबर्ग दोषी हो गया ?

इसी प्रकार विप्र का अर्थ सामाजिक मान्यताओं पर आधारित है न कि ज्ञान पर आधारित | इसीलिए विप्र का अर्थ ब्राह्मण बना लिया और विप्र एसोसियेशन, विप्र समाज आदि की कल्पना करके ब्राहमणों का संगठन या ग्रुप भी बना लिया |

पहले विप्र का अर्थ देखिये:

विप्र: पुं० [सं०√वप् (बीज फैलाना)+रनिपा० सिद्धि अथवा वि√प्रा (पूर्ण करना)+ड] १. ब्राह्मण। २. पुरोहित। ३. कर्मनिष्ठ और धार्मिक व्यक्ति। ४. पीपल। ५. सिरस का पेड़। ५. पापर या रेणु का नाम का पौधा। वि० १. मेधावी। २. विद्वान्।

यहाँ ब्राहमण शब्द पहले स्थान पर है तो लोगों ने ब्राहमण जाति से जोड़ लिया, जबकि ब्राह्मण का यहाँ अर्थ कोई पारंपरिक जाति नहीं है | यदि कोई व्यक्ति न तो शिक्षित है, न आविष्कारक है, न खोजी है, न भेदभाव से मुक्त है, वह ब्राहमण कैसे हो सकता है ?

आज कई ब्राहमण हैं जो भूमाफिया का काम करते हैं, दलाली करते हैं, व्यापार करते हैं, अपने मकान किराए पर देते हैं…..तो क्या वे ब्राहमण कहलायेंगे ? मात्र इसलिए क्योंकि उनके पूर्वज ब्राहमण थे, जबकि इनका कर्म और गुणधर्म सबकुछ वैश्य है ?

तो विप्र का अर्थ जातिगत ब्राह्मण नहीं, वह व्यक्ति विप्र कहलाता है, जो विद्वान है, जो सर्वहित का भाव रखता है, जो भेदभाव से मुक्त रहता है, जो स्वार्थ और लोभ से मुक्त रहता है, जो सदैव परोपकार में लिप्त रहता है | फिर चाहे वह अविष्कार करे, या अन्वेषण करे, या फिर शिक्षण का कार्य करे….जो कुछ भी करे, निःस्वार्थ भाव से करे….तभी वह विप्र कहलाने योग्य है |

अब आप शूद्र, विप्र और ब्राह्मण का अर्थ व भाव समझ चुके हैं | अब आइये उस दोहे का मूल भावार्थ समझते हैं

सापत, ताड़त परुष कहंता | विप्र पूज्य अस गावहीं संता ||
पूजिअ बिप्र सील गुण हीना | सूद्र न जन गुण गन ज्ञान प्रबीना |

(अ०क० १ )

भावार्थ: शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ ब्राहमण भी पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं | शील और गुणों से हीन ब्राह्मण भी पूजनीय है | और गुणधर्मों से युक्त और ज्ञान में निपुण शूद्र भी पूजनीय नहीं है | (अ०क० १ )

यहाँ तुलसीदास जी यह समझाने का प्रयास करते हैं कि ब्राह्मण (जातिगत नहीं वास्तविक, जैसे गुरु, शिक्षक, मार्गदर्शक आदि) यदि कठोर वचन कहता है, मारता है या क्रोधवश श्राप भी देता है तो वह निंदनीय नहीं, पूजनीय है | क्योंकि वह यह सब आपके ही भले के लिए कर रहा है |

क्या आपके गुरु या शिक्षक आपकी गलतियों पर डाँटते नहीं ? मुझे तो अपने शिक्षक से मार भी पड़ी है और सजा भी मिली है मुर्गा बनने की, बेंच पर खड़े रहने की…..और मेरे लिए वे आज अधिक सम्मानीय हैं क्योंकि उन्हीं की वजह से मैं शिक्षित बना न कि पढ़ा-लिखा डिग्रीधारी अशिक्षित |

शील और गुणों से हीन ब्राहमण (वास्तविक न कि जातिगत) ब्राह्मण भी पूजनीय अर्थात सम्मानीय है क्योंकि वह यदि शराबी, कबाबी भी हो, तो भी वह पूजनीय है क्योंकि वह गुरु है | इसे समझने के लिए आपको यह फिल्म देखनी चाहिए

शूद्र का अर्थ व भाव तो पहले ही समझा चुका हूँ, तो यहाँ जब कहा गया कि शूद्र यदि गुणी हो, ज्ञानी हो, पढ़ा-लिखा हो तब भी वह सम्मानीय या पूजनीय नहीं है |तो यह इसलिए कहा गया कि यदि वह ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कुल से हुआ या ऐसे परिवार में हुआ जो अपनी विद्वता, युद्धकला व पराक्रम या व्यापार के लिए प्रसिद्द रहे हों, तो स्वाभाविक है कि उनमें अपने माता-पिता का प्रभाव पड़ा हो और अच्छी शिक्षा प्राप्त की हो, अच्छे गुणधर्म भी उसमें आये हों | लेकिन यदि वह शूद्र हुआ, तो विरासत में प्राप्त सभी अच्छे प्रभाव तिरोहित हो जायेंगे यदि उसे बुरी संगत मिल गयी | और ऐसी स्थिति में वह शूद्र ही कहलाया जाएगा | और शूद्र यदि उच्च पद में भी आसीन हो जाए, तो वह निंदनीय ही बना रहता है जैसे मगध नरेश धनानंद और आज भी कई बड़े पदों पर बैठे नेता व अधिकारी | उनके कर्म ऐसे हो जाते हैं कि वे कभी पूजनीय नहीं बन पाते आम जनों की नजर में |

तो पूजनीय होने से तातपर्य यह कि जो सम्मानीय के स्तर से ऊपर उठ चुका हो | जो व्यक्ति अपने कर्म, वचनों व व्यक्तित्व द्वारा समाज पर ऐसा प्रभाव छोड़ता है कि लोगों का सर लज्जा या भय से नहीं, आदर से उसके सामने झुक जाता है |और ऐसा कार्य करने के लिए व्यक्ति का मनोबल मजबूत होना चाहिए, वह बिकाऊ नहीं होना चाहिए, उसका विवेक व बुद्धि जागृत होना चाहिए, उसका स्वाभिमानी होना अनिवार्य है, उसका अधर्म के विरुद्ध निडरता से खड़े रहना अनिवार्य है | वह न्यायप्रिय होना चाहिए, किसी अत्याचारी, अन्यायी के पक्ष में नहीं होना चाहिए….तब जाकर कोई पूजनीय हो पाता है | पैसे फेंककर चन्द चाटुकार पालकर अपनी जय जयकार करवा लेने से कोई पूजनीय नहीं हो जाता |

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~विशुद्ध चैतन्य

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