संरक्षकों का यह दायित्व होता है कि वे अपने संरक्षित क्षेत्र व प्रजा की रक्षा करें

अमेज़न-डॉट-इन पर रिंकी के लिए एक गेंद ऑर्डर किया था, जो कल पहुँचा मेरे पास | यह गेंद मुझे 239/- की पड़ी…मैंने अपने जीवन में इतने महँगे गेंद से कभी नहीं खेला…हमारे ज़माने में पाँच दस रूपये में बढ़िया वाली गेंद आ जाती थी |

अब आप अवश्य कहेंगे कि एक कुत्ते के लिए इतनी महँगी गेंद लेने की क्या आवश्यकता थी ?

यह मेरा स्वाभाविक गुण है कि जिससे भी मैं जुड़ता हूँ, अपनी क्षमतानुसार उसे बेहतर से बेहतर देने का प्रयास करता हूँ | क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं अपने साथ कुछ लेकर नहीं जाऊंगा जब इस दुनिया से विदा लूँगा | जब कोई मुझे उदारता से दान करता है, तो दान का पैसा स्विसबैंक में जमा करवाने के लिए नहीं होते |

अब आप पूछेंगे कि इसका लाभ क्या…?

क्योंकि लाभ-हानि को ध्यान में रखे बिना कोई किसी को पानी तक नहीं पिलाता | यहाँ तो परमार्थ भी किया जाता है तो स्वार्थ को ध्यान में रखकर ही किया जाता है कि यह करेंगे तो स्वर्ग मिलेगा, मोक्ष मिलेगा, ईश्वर प्रसन्न होंगे, मान-सम्मान मिलेगा….या और कुछ मिलेगा…यानीं मिलेगा इसीलिए लोग परमार्थ करते हैं, सेवा करते हैं | मैं सौभाग्यशाली हूँ कि कुछ ऐसे दानी सज्जन मुझसे जुड़े हैं, जो मुझे आर्थिक सहयोग करते हैं, बदले में मुझसे कोई अपेक्षा नहीं रखते | और ऐसे ही श्रेष्ठ सज्जनों के कारण मुझे बल मिलता, निर्भीकता मिलती है और साथ ही साथ मैं इस योग्य हो पाता हूँ कि किसी और की सहायता कर पाऊँ |

तो रिंकी को अपने पास लाने का कोई लाभ-हानि नहीं सोचा था, बस कोई इसका अहित न करे इसलिए अपने पास ले आया था | इसकी माँ यानि जॉनी छः सात महीनों से आश्रम में थी जिसे आश्रम के सेवक भोजन दे दिया करते थे | मैंने कभी उसमें कोई रूचि नहीं दिखाई थी क्योंकि आश्रम में कुत्ते बिल्लियों को देखना आश्रमप्रमुखों और आश्रम से जुड़े भक्तों को बिलकुल भी पसंद नहीं | तो वे दुत्कारते रहते हैं यदि कभी कोई आश्रम के भीतर दिख गया | तो मैं नहीं चाहता था कि किसी पशु से मेरा लगाव बढे और कोई उसे दुत्कारे तो मुझे बुरा लगे और मैं फिर उससे झगड़ा करूँ |

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लेकिन रिंकी को अपनी जिद पर ले आया, अब चूँकि मैं आश्रम के एक कोने पर रहता हूँ, जहाँ वही आता जाता है, जिसको मुझसे कोई काम है, तो किसी ने कोई आपत्ति नहीं की | रिंकी के साथ उसकी वही माँ जॉनी भी आ गयी क्योंकि रिंकी दूध नहीं छोड़ी थी तब तक | दूध तो अभी भी अपनी माँ का पीती है, चाहे एक आध रोटी मेरे देने पर खा भी ले, तब भी | तो इसके लिए पाउडर दूध भी मंगवाया है अमेज़न से ही |

जॉनी पिछले नौ दिनों से ही मेरे पास है, उससे पहले वह सेवकों के ही भरोसे थी | लेकिन इस नौ दिनों में उसके भीतर बहुत ही बड़ा परिवर्तन आ गया | वह उन लोगों पर भी भोंकने लगी, जिनके आने जाने पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था | कल किसी ने उसे पत्थर मार दिया था जिससे वह लंगड़ा कर चलने लगी थी | आज भी जब आश्रम आये एक व्यक्ति ने पत्थर मारा उसे और वह चिल्लाई, तब मुझे बहुत क्रोध आ गया | जबकि पहले कभी मुझे क्रोध नहीं आता था ऐसी घटना पर | क्योंकि तब मेरा कोई लगाव नहीं था | अब चूँकि एक लगाव हो गया, तो स्वाभाविक है कि मुझे क्रोध आयेगा ही…और इसी वजह से मैं किसी से भी भावनात्मक या आत्मिक लगाव रखना नहीं चाहता | क्योंकि जिससे मैं भावनात्मक रूप से जुड़ता हूँ, उसे कोई कष्ट पहुँचाये मुझे बिलकुल भी सहन नहीं होता |

तो जब चोट लगने के बाद वह और जोर से भौंकने लगी तब मैं नीचे गया | मुझे देखते ही वह दौड़ कर मेरे पास आयी और पहली बार अगले दोनों पंजे उठाकर खड़ी हो गयी मेरे सामने | मैंने हाथ आगे बढ़ाया तो अपने दोनों पंजे हाथ पर रख दी और रिंकी की तरह कूँ कूँ करने लगी…मानो शिकायत कर रही हो कि किसी ने मुझे मारा | उसका यह व्यव्हार मेरे लिए बिलकुल नया था |

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खैर तब तक वह व्यक्ति चला गया, तो मैंने आश्रम के सेवकों को कहा कि वह जब ये तो मेरे पास भेज देना | वह आया मेरे पास, मैंने उसे समझाया | वह बोला कि पहले तो वह कभी मुझपर नहीं भौंकती थी, हमारे घर भोजन भी करने आ जाती थी….अब अचानक उसे क्या हो गया है ? बस इसीलिए उसे मारा…..मैंने उससे कहा कि अब दोबारा ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि अब वह मेरे संरक्षण में है | उसे समझा कर भेज दिया |

तो लाभ क्या हुआ ?

लाभ यह हुआ कि जॉनी अब आश्रम में हर किसी को नहीं घुसने देती, भले उसने पहले कभी-कभार उसे भोजन करवाया हो | मुझसे वह इसलिए खुल गयी, क्योंकि उसके बच्ची की देखरेख में कोई कमी नहीं रखता…एक माँ भला और क्या चाहती है ? हर माँ चाहती है कि उसके बच्चे को कोई कष्ट न पहुँचाये…फिर चाहे वह इन्सान हो या पशु-पक्षी | अब वह उन्हें ही कुछ नहीं कहती, जो आश्रम परिसर में रहते हैं | केवल बाहर के लोगों को ही आने नहीं देती |

यह सबकुछ इसलिए भी लिखा मैंने कि मैं आप सभी को समझा सकूं कि केवल भोजन दे देने मात्र से आप किसी का दिल नहीं जीत सकते | हर मुसीबत में आपका उसके साथ होना, उसकी समस्याएँ सुलझाना अनिवार्य शर्त है | कुछ अभिभावक अपने बच्चों के मनोभावों को समझने का प्रयास नहीं करते, जबकि मैं पशु-पक्षियों के मनोभावों को भी समझने का पूरा प्रयास करता हूँ | कई माता-पिता अपने बच्चो को सारी सुख सुविधाएं देते हैं, केवल अपना समय नहीं देते, उनके साथ खेलते नहीं, उनकी शिकायतें नहीं सुनते यह गलत है | कई बार माता-पिता कहते हैं कि सबकुछ दो दे रखा है…अब मेरा दिमाग मत खाया करो….और ऐसे माता-पिता बुढ़ापे में अकेले पड़ जाते हैं | बच्चे भी उन्हें वृद्धाश्रम में डालकर वही करते हैं, जो उनके माता-पिता ने उनके साथ किया बचपन में |

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यही बात नेताओं को भी ध्यान रखना चाहिए…केवल जुमलेबाजी, और चुनावी सीजन में कुछ पैसे लुटा देने से, भण्डारा करा देने मात्र से आप जनता का दिल नहीं जीत सकते | उनकी समस्याएँ भी सुलझाइये, उन्हें भूमाफियाओं, भ्रष्ट अधिकारीयों के प्रकोप से भी बचाइये, उन्हें सुरक्षित होने का अहसास कराइए….अपनी क्षमतानुसार श्रेष्ठ से श्रेष्ठ देने का प्रयास करिए | यह नहीं होना चाहिए कि खुद तो ऐय्याशी करें और जनता भूखी मरे, माफियाओं का आतंक सहे, या साम्प्रदायिक उत्पातियों के आतंक से भयभीत होकर जिए |

बच्चों के संरक्षक अभिभावक होते हैं और प्रजा के संरक्षक प्रजा द्वारा चुने गये नेता होते हैं | संरक्षकों का यह दायित्व होता है कि वे अपने संरक्षित क्षेत्र और उसकी प्रजा की रक्षा करें, उन्हें सुखी व सम्पन्न बनायें |

~विशुद्ध चैतन्य

इस फिल्म को ध्यान से देखें, मेरी बातें समझ में आ जाएँगी

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