सम्प्रदाय का अर्थ और धर्म की परिभाषा

कल संस्कृत के एक विद्वान् ने कहा मुझसे कि संस्कृत तो आती नहीं तुम्हें और सम्प्रदाय को परिभाषित करने निकले हो ? पता भी है तुम्हें कि सम्प्रदाय संस्कृत का शब्द है ? चाहो तो मैं तुम्हें संस्कृत पढ़ा सकता हूँ |

मेरा उत्तर था कि पंडित-पुरोहितों या आपकी तरह का विद्वान बनने में कोई रूचि नहीं है मेरी…मुझे तो अनपढ़ ही रहने दो | बचा खुचा जो जीवन है उसे अनपढ़ता में ही जीना चाहता हूँ |

उन्हें नाराजगी थी मेरे उस वक्तव्य से, जिसमें मैंने कहा था कि हिन्दू, इस्लाम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि धर्म नहीं, सम्प्रदाय हैं |

एक और सज्जन ने पूछा है मुझसे: “गर मज़हब रिलिजन धर्म भिन्न है तो
फिर धर्म है क्या? इसे शब्द की परिभाषा क्या है? इसे सबसे पहले परिभाषित किसने किया? और मज़हब रिलिजन से धर्म भिन्न कैसे है इन तीनों में अंतर क्या है? मार्गदर्शन करे।”

तो आइये समझते हैं सम्प्रदाय का अर्थ क्या है और धर्म क्या है

सम्प्रदाय का अर्थ होता है किसी विशेष मत या विचारों को मानने वालों का समूह | उदाहरण के लिए वेद और पुराणों से उत्पन्न 5 तरह के संप्रदाय माने जा सकते हैं:- 1. वैष्णव, 2. शैव, 3. शाक्त, 4 स्मार्त और 5. वैदिक संप्रदाय। वैष्णव जो विष्णु को ही परमेश्वर मानते हैं, शैव जो शिव को परमेश्वर ही मानते हैं, शाक्त जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं और स्मार्त जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं। अंत में वे लोग जो ब्रह्म को निराकार रूप जानकर उसे ही सर्वोपरि मानते हैं। (विस्तार से पढ़ें.. हिन्दुओं के 5 संप्रदाय, जानिए कौन से? )

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तो यह तो वैदिक सम्प्रदाय | मूर्ख विद्वान् वैदिक सम्प्रदाय को तो सम्प्रदाय मानते हैं, लेकिन आधुनिक सम्प्रदायों को सम्प्रदाय नहीं, धर्म मानते हैं | जैसे कि हिन्दू संप्रदाय, इस्लामिक सम्प्रदाय, सिख सम्प्रदाय, ईसाई, जैन, बौद्ध, कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, कम्युनिस्ट, मोदीवाद, गोडसेवाद, आंबेडकरवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद, चाटुकारितावाद…..आदि इत्यादि में से कुछ को धर्म मानते हैं, कुछ को राजनैतिक पार्टियाँ तो कुछ को योग्यता…लेकिन सम्प्रदाय मानने को तैयार नहीं | जबकि ये सभी सम्प्रदाय की परिभाषा के अंतर्गत ही आते हैं |

फिर प्रत्येक सम्प्रदायों के उपसम्प्रदाय भी होते हैं, जैसे; वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय हैं- जैसे बैरागी, दास, रामानंद, वल्लभ, निम्बार्क, माध्व, राधावल्लभ, सखी, गौड़ीय आदि। वैष्णव का मूलरूप आदित्य या सूर्य देव की आराधना में मिलता है।

इसी प्रकार हिन्दू, इस्लाम, सिख, ईसाई, बौद्ध, कांग्रेस, भाजपा…..आदि सम्प्रदायों के भी उपसम्प्रदाय हैं |

आशा करता हूँ कि अब तो सम्प्रदाय ठीक से समझ में आ गया होगा | अब आता हूँ कि धर्म और संप्रदाय में क्या अंतर है | मजहब, रिलीजन और धर्म में क्या अंतर है |

मजहब और रिलीजन दोनों का अर्थ होता है किसी विशेष मत, विचार व परम्पराओं को मानने वालों का समूह | जबकि धर्म का अर्थ होता है किसी व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ, द्रव्य, वायु, तत्व का स्वभाविक मौलिक गुण | जैसे अग्नि का धर्म है ताप देना, प्रकाश देना | जल का गुण है शीतलता प्रदान करना, प्यास बुझाना, जीवन देना |

इसी प्रकार जो मानव का धर्म है स्वयं व औरों का कल्याण करना, सहयोगी होना, आविष्कार करना, जनोपयोगी निर्णय लेना कार्य करना आदि | यदि इसके विपरीत कार्य करता है कोई मानव तो वह अधर्मी कहलायेगा |

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लेकिन यदि सम्प्रदाय में कोई विपरीत कार्य करे, यानि जनता व देश को चूना लगाए, झूठ बोलकर बरगलाए, जुमलेबाजी करता फिरे, गप्पें हाँकता फिरे, सम्प्रदायों के बीच द्वेष व वैमनस्यता का बीज बोये…तब वह अधर्मी तो कहा जाएगा, लेकिन हिन्दू है तो हिन्दू ही रहेगा, मुस्लिम है तो मुस्लिम ही रहेगा, कांग्रेसी है तो कांग्रेसी ही रहेगा, भाजपाई है तो भाजपाई ही रहेगा और लोग ऐसे अधर्मियों की जयजयकार भी करेंगे, उसे सर पर बैठाकर नाचते फिरेंगे |

आशा करता हूँ की अब धर्म, रिलिजन, मजहब और सम्प्रदाय का अर्थ विस्तार से समझ में आ गया होगा | यह भी आशा करता हूँ कि मेरी अनपढ़ता का संस्कृत, वेदों, क़ुरान के समस्त विद्वान् सम्मान करेंगे और भविष्य में कभी भी मुझे, अपनी तरह का विद्वान बनाने की कुचेष्टा नहीं करेंगे |

~विशुद्ध चैतन्य

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