जिस उद्देश्य से नागा साधुओं की सेना बनाई गई थी वह उद्देश्य ही अब खो गया


मेरे आश्रम में अक्सर संत महंत अपने सेवकों के साथ आते रहते हैं और कुछ रात्रिविश्राम के बाद सुबह अपनी आगे की यात्रा पर निकल जाते हैं | ऐसे ही नियमित आने वालों में जुना अखाड़ा के नागा बाबा श्री महंत उदयभान पूरी जी महाराज भी हैं | पिछली बार जब वे आये तो उनके शिष्य ने मुझे लिंग-भंग संस्कार के विषय में बताया कि वह सबसे अधिक कष्टमय होता है | उन्होंने जब मुझे सब कुछ खुलकर बताया तब मेरी जिज्ञासा बढ़ी इन्टरनेट में और अधिक जानकारी प्राप्त करने की | मैं कई दिनों से इस पर कुछ लिखना चाह रहा था, लेकिन यह सोच रहा था कि यदि यह विषय पहले किसीने नहीं उठाया होगा तो क्लेश खड़ा हो जाएगा | हो सकता है कि यह विषय उन्होंने गुप्त रखा हो और अभी तक किसी को न पता चला हो (क्योंकि मुझे भी उसी दिन पता चला था), लेकिन जब इन्टरनेट पर सर्च किया तो बहुत कुछ उपलब्ध था इस विषय पर | इसलिए मैं अब निश्चिन्त हो वह कह सकता हूँ जो मुझे कहना है |

नोट:आगे जो  तस्वीरें और  विडियो  हैं, वे महिलाओं  व बच्चों  के लिए  नहीं हैं  |

गुरु नानक ने जब सिक्ख पंथ की स्थापना की तब उसका उद्देश्य था मुगल लुटेरों से नागरिकों की सुरक्षा करना | उसके लिये उन्होंने कुछ ऐसे जुझारू लोगों को चुना जो दूसरों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे सकें | उस समय मुगल लुटेरे स्त्री और धन लूट कर ले जाते थे यहाँ से और आम नागरिक इतने सक्षम नहीं थे कि उनसे अपनी रक्षा कर पाते | तो नानक जी ने ऐसे नवयुवकों को विशेष युद्ध नीति सिखाई और उन्हें एक विशेष पहचान भी दी ताकि आम नागरिक उनको देख कर ही समझ जाएँ कि एक भी सिक्ख उनके क्षेत्र में है तो वे सुरक्षित हैं |

वह समय ऐसा था कि नानक को ऐसी सेना बनानी पड़ी थी लेकिन कालांतर में वह एक सम्प्रदाय के रूप में उभर गया और मूल उद्देश्य शायद खो गया | इसी प्रकार आदिगुरू शंकराचार्य को भी सेना बनानी पड़ी लेकिन कालांतर में वह भी अपने मूल उद्देश्यों से भटक गया क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए सेना की आवश्यकता थी, अब उसकी आवश्यकता रही ही नहीं | क्योंकि अब राष्ट्र कि अपनी सेना और पुलिस व्यवस्था है | लेकिन इस परम्परा में जो बात मुझे बिलकुल सही नहीं लगी वह है, लिंग भंग | इस प्रक्रिया के लिए उन्हें 24 घंटे नागा रूप में अखाड़े के ध्वज के नीचे बिना कुछ खाए-पीए खड़ा होना पड़ता है। इस दौरान उनके कंधे पर एक दंड और हाथों में मिट्टी का बर्तन होता है। इस दौरान अखाड़े के पहरेदार उन पर नजर रखे होते हैं। इसके बाद अखाड़े के साधु द्वारा उनके लिंग को वैदिक मंत्रों के साथ झटके देकर निष्क्रिय किया जाता है। यह कार्य भी अखाड़े के ध्वज के नीचे किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है।

लिंग-भंग संस्कार

जैसा कि जुना अखाड़े के नागा साधू ने बताया कि यह एक बहुत ही दर्दनाक प्रक्रिया होती है, लेकिन मैं मानता हूँ कि यह प्रक्रिया अमानवीय ही नहीं, ईश्वर का अपमान भी है | ईश्वर ने जिसको पुरुष बनाया है उसे नपुंसक बनाना क्या प्रकृति व ईश्वर का अपमान नहीं है ? प्राकृतिक रूप से यदि कोई नपुंसक है तो और बात है, लेकिन यदि आप लिंग को तोड़कर किसी को नपुंसक बनाते हैं, तो वह किसी भी तरह से ईश्वरीय कार्य तो ही नहीं सकता | उन्हें आप जीवन भर के लिए एक प्रकार से अपाहिज कर देते हैं वह भी तब, जब इस तरह की सेना की अब आवश्यकता नहीं है | क्योंकि लुटेरे तो अब भी आ रहे हैं और आज भी लूट रहे हैं लेकिन आपकी सेना कुछ नहीं कर पा रही उनका | आपकी सेना को तो पता भी नहीं चलता कि कब करोड़ों रूपये स्विसबैंक में पहुँच गये | कितनी भूमि हमारे नेता विदेशियों को गिरवी रख चुके हैं वह भी पता नहीं चलता | कुम्भ मेला जो नागा साधुओं के कारण ही प्रसिद्ध है, उसकी ही भूमि पर अवैध अधिग्रहण होता चला जा रहा है और करीब चालीस प्राचीन मंदिरों को नमो निशाँ मिट गया, लेकिन नागा साधुओं को पता ही नहीं चला | उन मंदिरों की मुर्तिओं को तीन से चार करोड़ की कीमत पर वहीं के सत्यम योगी ने बेच दिया लेकिन नागा साधुओं को पता ही नहीं चला | यदि मेरी बातों पर विश्वास न हो तो वहीँ प्रयाग पर स्वामी परमानन्द आश्रम के प्रमुख स्वामी शारदानंद गिरी जी से पूरा विवरण ले सकते हैं |

तो जब शंकराचार्य जी ने जिस उद्देश्य से नागा साधुओं की सेना बनाई, वे अपने कर्तव्यों से विमुख हो गये, तो फिर यह सब करके किसी को नपुंसक बनाना क्या किसी भी तरह से न्यायोचित, आध्यात्मिक या मानवीय है ? मुझे तो नहीं लगता कि ईश्वर को तनिक भी प्रसन्नता होती होगी ऐसे पंथ या सम्प्रदाय से ! ~विशुद्ध चैतन्य

नीचे विस्तार से समझाने के लिए विकिलीक्स से उद्धृत अंश प्रस्तुत हैं और साथ ही सम्बंधित लिंक्स भी उपलब्ध हैं:

भारतीय सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आदिगुरू शंकराचार्य ने रखी थी। शंकर का जन्म ८वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था जब भारतीय जनमानस की दशा और दिशा बहुत बेहतर नहीं थी। भारत की धन संपदा से खिंचे तमाम आक्रमणकारी यहाँ आ रहे थे। कुछ उस खजाने को अपने साथ वापस ले गए तो कुछ भारत की दिव्य आभा से ऐसे मोहित हुए कि यहीं बस गए, लेकिन कुल मिलाकर सामान्य शांति-व्यवस्था बाधित थी। ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्रों को तर्क, शस्त्र और शास्त्र सभी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्थापना के लिए कई कदम उठाए जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों का निर्माण करना। यह थीं गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ। इसके अलावा आदिगुरू ने मठों-मन्दिरों की सम्पत्ति को लूटने वालों और श्रद्धालुओं को सताने वालों का मुकाबला करने के लिए सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों की सशस्त्र शाखाओं के रूप में अखाड़ों की स्थापना की शुरूआत की।

आदिगुरू शंकराचार्य को लगने लगा था सामाजिक उथल-पुथल के उस युग में केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना काफी नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को सुदृढ़ बनायें और हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें। इसलिए ऐसे मठ बने जहाँ इस तरह के व्यायाम या शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा। आम बोलचाल की भाषा में भी अखाड़े उन जगहों को कहा जाता है जहां पहलवान कसरत के दांवपेंच सीखते हैं। कालांतर में कई और अखाड़े अस्तित्व में आए। शंकराचार्य ने अखाड़ों को सुझाव दिया कि मठ, मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर शक्ति का प्रयोग करें। इस तरह बाह्य आक्रमणों के उस दौर में इन अखाड़ों ने एक सुरक्षा कवच का काम किया। कई बार स्थानीय राजा-महाराज विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं का सहयोग लिया करते थे। इतिहास में ऐसे कई गौरवपूर्ण युद्धों का वर्णन मिलता है जिनमें ४० हजार से ज्यादा नागा योद्धाओं ने हिस्सा लिया। अहमद शाह अब्दाली द्वारा मथुरा-वृन्दावन के बाद गोकुल पर आक्रमण के समय नागा साधुओं ने उसकी सेना का मुकाबला करके गोकुल की रक्षा की।
वर्तमान स्थिति

भारत की आजादी के बाद इन अखाड़ों ने अपना सैन्य चरित्र त्याग दिया। इन अखाड़ों के प्रमुख ने जोर दिया कि उनके अनुयायी भारतीय संस्कृति और दर्शन के सनातनी मूल्यों का अध्ययन और अनुपालन करते हुए संयमित जीवन व्यतीत करें। इस समय १३ प्रमुख अखाड़े हैं जिनमें प्रत्येक के शीर्ष पर महन्त आसीन होते हैं। इन प्रमुख अखाड़ों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं:-

१. श्री निरंजनी अखाड़ा:- यह अखाड़ा ८२६ ईस्वी में गुजरात के मांडवी में स्थापित हुआ था। इनके ईष्ट देव भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकस्वामी हैं। इनमें दिगम्बर, साधु, महन्त व महामंडलेश्वर होते हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, उज्जैन, हरिद्वार, त्र्यंबकेश्वरउदयपुर में हैं।

२. श्री जूनादत्त या जूना अखाड़ा:- यह अखाड़ा ११४५ में उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में स्थापित हुआ। इसे भैरव अखाड़ा भी कहते हैं। इनके ईष्ट देव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं। इसका केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर माना जाता है। हरिद्वार में मायादेवी मंदिर के पास इनका आश्रम है। इस अखाड़े के नागा साधु जब शाही स्नान के लिए संगम की ओर बढ़ते हैं तो मेले में आए श्रद्धालुओं समेत पूरी दुनिया की सांसें उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए रुक जाती हैं।

३. श्री महानिर्वाण अखाड़ा:- यह अखाड़ा ६७१ ईस्वी में स्थापित हुआ था, कुछ लोगों का मत है कि इसका जन्म बिहार-झारखण्ड के बैजनाथ धाम में हुआ था, जबकि कुछ इसका जन्म स्थान हरिद्वार में नील धारा के पास मानते हैं। इनके ईष्ट देव कपिल महामुनि हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर और कनखल में हैं। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि १२६० में महंत भगवानंद गिरी के नेतृत्व में २२ हजार नागा साधुओं ने कनखल स्थित मंदिर को आक्रमणकारी सेना के कब्जे से छुड़ाया था।

४. श्री अटल अखाड़ा:- यह अखाड़ा ५६९ ईस्वी में गोंडवाना क्षेत्र में स्थापित किया गया। इनके ईष्ट देव भगवान गणेश हैं। यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है। इसकी मुख्य पीठ पाटन में है लेकिन आश्रम कनखल, हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में भी हैं।

५. श्री आह्वान अखाड़ा:- यह अखाड़ा ६४६ में स्थापित हुआ और १६०३ में पुनर्संयोजित किया गया। इनके ईष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन हैं। इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है। इसका आश्रम ऋषिकेश में भी है। स्वामी अनूपगिरी और उमराव गिरी इस अखाड़े के प्रमुख संतों में से हैं।

6. श्री आनंद अखाड़ा:- यह अखाड़ा ८५५ ईस्वी में मध्यप्रदेश के बेरार में स्थापित हुआ था। इसका केंद्र वाराणसी

में है। इसकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन में भी हैं।

७. श्री पंचाग्नि अखाड़ा:- इस अखाड़े की स्थापना ११३६ में हुई थी। इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है। इनके सदस्यों में चारों पीठ के शंकराचार्य, ब्रहमचारी, साधु व महामंडलेश्वर शामिल हैं। परंपरानुसार इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में हैं।

८. श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा:- यह अखाड़ा ईस्वी ८६६ में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं। इनका मुख्य दैवत गोरखनाथ है और इनमें बारह पंथ हैं। यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है और इनकी त्र्यंबकेश्वर शाखा त्र्यंबकंमठिका नाम से प्रसिद्ध है।

९. श्री वैष्णव अखाड़ा:- यह बालानंद अखाड़ा ईस्वी १५९५ में दारागंज में श्री मध्यमुरारी में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदि तीन संप्रदाय बने। इनका अखाड़ा त्र्यंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था। १८४८ तक शाही स्नान त्र्यंबकेश्वर में ही हुआ करता थाए परंतु १८४८ में शैववैष्णव साधुओं में पहले स्नान कौन करे इस मुद्दे पर झगड़े हुए। श्रीमंत पेशवाजी ने यह झगड़ा मिटाया। उस समय उन्होंने त्र्यंबकेश्वर के नजदीक चक्रतीर्था पर स्नान किया। १९३२ से ये नासिक में स्नान करने लगे। आज भी यह स्नान नासिक में ही होता है।

१०. श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा:- यह अखाड़ा १९१० में स्थापित हुआ। इस संप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासीन हैं। इनमें सांप्रदायिक भेद हैं। इनमें उदासीन साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, भदैनी, कनखल, साहेबगंज, मुलतान, नेपाल व मद्रास में है।

११. श्री उदासीन नया अखाड़ा:- यह अखाड़ा १७१० में स्थापित हुआ। इसे बड़ा उदासीन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया। इनके प्रवर्तक मंहत सुधीरदासजी थे। इनकी शाखाएं प्रयागए हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर में हैं।

१२. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा:- यह अखाड़ा १७८४ में स्थापित हुआ। १७८४ में हरिद्वार कुंभ मेले के समय एक बड़ी सभा में विचार विनिमय करके श्री दुर्गासिंह महाराज ने इसकी स्थापना की। इनकी ईष्ट पुस्तक श्री गुरुग्रन्थ साहिब है। इनमें सांप्रदायिक साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या बहुत है। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और त्र्यंबकेश्वर में हैं।

१३. निर्मोही अखाड़ा:- निर्मोही अखाड़े की स्थापना १७२० में रामानंदाचार्य ने की थी। इस अखाड़े के मठ और मंदिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में हैं। पुराने समय में इसके अनुयायियों को तीरंदाजी और तलवारबाजी की शिक्षा भी दिलाई जाती थी।
नागा बनने की प्रक्रिया

नागा साधु बनने की प्रक्रिया कठिन तथा लम्बी होती है। नागा साधुओं के पंथ में शामिल होने की प्रक्रिया में लगभग छह साल लगते हैं। इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूँ ही रहते हैं। कोई भी अखाड़ा अच्छी तरह जाँच-पड़ताल कर योग्य व्यक्ति को ही प्रवेश देता है। पहले उसे लम्बे समय तक ब्रह्मचारी के रूप में रहना होता है, फिर उसे महापुरुष तथा फिर अवधूत बनाया जाता है। अन्तिम प्रक्रिया महाकुम्भ के दौरान होती है जिसमें उसका स्वयं का पिण्डदान तथा दण्डी संस्कार आदि शामिल होता है।

लेकिन अब ये लोग राष्ट्र व सम्पत्ति की रक्षा के लिये अपनी योग्यता  को  न लगा कर तमाशा  दिखाने में व्यर्थ कर रहे हैं  |

3,206 total views, 1 views today

The short URL of this article is: https://www.vishuddhablog.com/vblgqAXV

पोस्ट से सम्बंधित आपके विचार ?

Please Login to comment
avatar
  Subscribe  
Notify of