मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे यह सन्देश दिया है, “हो गया वही शुरू जो एक स्वामी जी चाहते हैं… ढेरों अनुयायी और जय जयकार..?”

शुभचिंतक ने वही कहा जो प्राचीन काल से भारत में कहने की परम्परा रही है | हर भारतीय डरा रहता है कि सामने वाले में अहंकार न आ जाए | हर कोई इसी प्रयास में लगा रहता है कि कोई स्वयं का प्रचार न करे | हर कोई इसी प्रयास में रहता है कि आप दीन-हीन बने रहें और किसी न किसी के सामने सर झुकाए खड़े रहें | हर कोई इसी प्रयास में रहता है कि जो भी थोड़ा अलग हटकर कुछ करना चाहे उसे तुरंत मोक्ष ब्रम्हज्ञान का लालच देकर भ्रमित कर दिया जाए….

जबकि विदेश में यदि कोई कुछ करना चाहता है तो सहयोग किया जाता है | वहाँ उत्साहवर्धन किया जाता है | लेकिन हम दबाना चाहते हैं | अपने आपको दूसरों से निम्न दिखाना ही यहाँ सम्मान माना जाता है चाहे सामने वाले का मार्ग पृथक ही क्यों न हो | लेकिन आपको सामने वाले के सामने अकारण दीन-हीन हो जाना चाहिए |

आप कुछ भी करें तो अपने नाम का प्रयोग न करें, ईश्वर, गुरु या किसी और व्यक्ति का नाम प्रयोग करें ताकि लोग आपको जान न पायें | आपको उदहारण दिए जाते हैं कि देखो कैसे फलां महात्मा आये थे और चुपचाप जंगल में मरखप गए और किसी को उनका पता भी नहीं चला | आपको उदाहरण दिए जाते हैं कि फलां व्यक्ति कीर्तन करते करते मर गया क्योंकि दस दिन से उसे खाना नहीं मिला था, लेकिन उसने चिंता नहीं की कि खाने की व्यवस्था भी करनी होती है भजन के साथ |

लेकिन मित्र सैनी जी | मुझे क्षमा करें कि मैं मोक्ष या ब्रम्हज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं आया हूँ | मैं वही कर रहा हूँ जो मुझे इस जन्म में करना चाहिए था लेकिन मैं इतने वर्षों तक आप जैसे शुभचिंतकों के कारण नहीं कर पाया | जो कुछ किया दूसरों के नाम पर किया और आधा जीवन व्यर्थ कर दिया | क्योंकि वे दूसरे लोग मेरे उद्देश्य को हवनकुंड में भस्म कर अपनी अपनी दूकान जमा चुके हैं |

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और मुझे आश्चर्य इस बात का हुआ कि आपको मेरे किसी पोस्ट में कोई रूचि नहीं रही, केवल आपकी रूचि रही कि कितने लोग मेरे पोस्ट पर जैकारा लगा रहे हैं या मेरी प्रशंसा कर रहे हैं | जबकि जो भी प्रशंसा या जयकारा हो रहे हैं वे मेरे लिए नहीं मेरे विचार या मेरे पोस्ट पर हो रहें हैं | अन्यथा तो वे मुझे जानते भी नहीं है कि मैं कौन हूँ | उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं है कि मैं करोडपति हूँ या सड़कछाप | लेकिन आप परेशान हो रहे हैं |

सारांश: जब आप स्वयं के लिए कुछ करते हैं जैसे; मोक्ष, ब्रम्हज्ञान, ईश्वर की खोज तब आपको उन सभी वस्तुओं, पहचानों से मुक्त होना पड़ता है जो दूसरों ने आपको दिए हैं | लेकिन यदि आपको दूसरों के लिए कुछ करना है तो आपको उन सभी वस्तुओं और पहचानों की आवश्यकता पड़ती है जो दूसरों से आपको प्राप्त हुए और होने वाले हैं |

वस्तुतः हम दूसरों के लिए ही संसार में आते हैं इसलिए नाम, पहचान, दूसरों से ही मिलता है, लेकिन केवल इसलिए ताकि वे आपको पहचान सकें भीड़ में | दुर्भाग्यवश हम दूसरों के दिए नाम व पहचान में स्वयं के आस्तित्व व उद्देश्य को भूल जाते हैं | -विशुद्ध चैतन्य

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