ज़िन्दगी की सच्चाई से हारे हुए लोग

आज मैंने एक फिल्म देखी ‘अपहरण’ | दस साल पुरानी यह फिल्म आज भी उतनी ही नई लगी मुझे कि लगा आज की ही कहानी कही गई है | आप में से कई लोगों ने देखी होगी, कुछ के लिए टाइम-पास और कुछ के लिए पैसा वसूल रही होगी | लेकिन मेरे लिए बहुत कुछ था इस फिल्म में |

मेरी बचपन से एक आदत है, कि मैं फिल्म को कभी भी फिल्म की तरह नहीं देखता |
क्योंकि फिल्म और जीवन में बहुत अन्तर नहीं होता | उसमें भी कलाकार होते हैं और वही सब होता है जो वास्तविक जीवन में होता है | उसमें भी कलाकार बिलकुल वैसा ही जीवंत अभिनय करता है जैसा कि वास्तविक जीवन में होता है | अंतर केवल इतना होता है कि फिल्म के कलाकार काम समाप्त होने पर दूसरी फिल्म में दूसरा जीवन जीने निकल पड़ते हैं | वे एक के बाद एक कई फिल्मे करते चले जाते हैं और हर फिल्म में कोई नए चरित्र के साथ आते हैं | वे फिल्म समाप्त होने पर शोक नहीं मनाते |

वास्तविक जीवन जिसे ऋषियों ने माया कहा था, वह भी केवल इसलिए ही कहा था क्योंकि हम भी न जाने कितने जीवन जीते चले गए और न जाने कितने चरित्र निभाते चले गये | लेकिन हर जीवन में मृत्यु से भयभीत रहे | हर जीवन में हमने कुछ सीखा लेकिन अगले जीवन में भूल गये | हर पल हम कुछ नया सीखते हैं हर फिल्म में हम कुछ समझते हैं.. लेकिन टाइम-पास से अधिक महत्व नहीं देते |

आज समाचार पढ़ा कि आमिर खान की फिल्म के विरोध में हिन्दू संगठनों कि आधिकारिक सेना ने पंजाब में फिल्म रुकवाने का प्रयास किया और होर्डिंग आदि जलाए | क्योंकि फिल्म में हिन्दुओं के विरुद्ध कुछ दिखाया गया था | मैंने तो फिल्म अभी तक देखी नहीं लेकिन हिन्दुओं की भावना आहात हुई सुना | समझ में नहीं आया कि किसी हिन्दू की भावना आहत हुई और क्यों हुई | लोग तो कह रहे हैं कि फिल्म बहुत ही अच्छी है और पाखंड पर चोट की गई है | तो क्या ये पाखंडियों की सेना थी जो आहत हो गयी ? इनकी भावना कभी आहत नहीं होती जब कोई विवाहिता दहेज़ के लालचियों द्वारा मार दी जाती है ? इनकी भावना कभी आहत नहीं होता, जब कोई किसान आत्महत्या कर लेता है ? इनकी भावना कभी आहत नहीं होती जब किसी गरीब की जमीन छीन जाती है ? लेकिन फिल्म से आहत हो जाती है ?

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इस फिल्म में जो कुछ दिखाया गया, यदि वास्तव में जनता में जागरूकता होती तो ये दस साल बर्बाद नहीं होते | आज भी वही सब चल रहा है, लेकिन हम सब अपनी अपनी दुनिया में मस्त हैं | कुछ गुंडे बदमाश ईमानदार अफसरों की मेहनत में पानी फेर देते हैं और हम जयकारा लगाने में मस्त रहते हैं | ये लोग अपने स्वार्थ के लिए नवयुवकों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन हर बार हम अपनी ऑंखें बदन किये रहते हैं और यही मानकर चलते हैं कि कल शायद ठीक हो जाएगा | जब दस साल पहले जो कहानी लिखी गयी वही स्थिति यदि आज भी है तो दोष किसका है ?

दोष हमारा ही है क्योंकि हम शरीफ लोग हैं | शराफत के कम्बल में मुँह छुपाकर जीने की आदत से पड़ गयी है | हर किसी के भीतर वही कुछ दबा हुआ है जो मेरे भीतर है, लेकिन एक नेता के इंतज़ार में हम बैठे हुए हैं | नेता आते हैं, हमारी भावनाओं का सौदा करते हैं और फिर हम वहीँ के वहीं खड़े अगले नेता का इंतज़ार करते हैं | न जाने कितने नेता आये और चले गए लेकिन जनता वहीँ की वहीँ रह गयी | एक विदेशी व्यापारी आता  है  और करोड़ों कमा कर चला जाता है लेकिन, यहाँ का किसान भूखा मरता है | यहाँ के व्यापारी कर्जों में डूबे मिलते हैं | लेकिन हमारा नेता करोड़ों का मालिक हो जाता है | फिर वही नेता अपनी सेना बनाता है राजनैतिक पकड़ बनाये रखने के लिए और ये सेनायें मुखौटा लगाकर घुमती है जनता के सेवक होने का | लेकिन वास्तव में ये नेताओं के सेवक होते हैं और भेड़ों (कायर शरीफों)  को हाँकने वाले गड़रिये | इनके डंडों के डर से भेड़ें अपना विवेक खो देतीं हैं और यदि बन्दूक धारी गड़रिये हुए तो भेड़ें अपना होश भी खो देती है |

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कुछ लोग गरीबी का लाभ उठाते हैं और उनके हाथों पर बंदूकें थमा देते हैं | एक बार हाथ में बन्दूक आयी तो फिर उनके वापस लौटने के रास्ते बंद हो जाते हैं | बच्चे आजकल अच्छी नौकरी और अच्छी तनख्वा पाते हैं तो भी ब्याजखोर उनको कर्जों के जाल में फंसा लेते हैं और वे जीवन भर कर्जों से नहीं निकल पाते | एक जीवंत मानव पैसे कमाने की मशीन मात्र बनकर रहा जाता है | एक नौकरी पाने के लिए रिश्वत देता है, रिश्वत के पैसों का इंतज़ाम करने के लिए कर्जा लेता है और नौकरी मिलने के बाद उसी भ्रष्टाचार के रास्ते पैसे कमा कर कर्जा चुकाता है | और यह चक्र चलता रहता है और हर कोई इस चक्र में फंसा हुआ है |

अब कोई निकलना भी चाहे तो बाकी भ्रष्ट उसे निकलने नहीं देंगे क्योंकि वे उसको जेल भिजवा देंगे या मरवा देंगे | हर व्यक्ति इस चक्र से निकलना चाहता है, लेकिन हर कोई डरा हुआ है | इसका लाभ उठाते हैं अपराधी क्योंकि शरीफों की कमजोर नस उनके हाथ में है |

मैंने सन्यास लिया तो गेरुआ पहना | लेकिन भीतर तो मानव ही हूँ | यदि आज मैं कुछ कहता हूँ तो लोग कहते हिं कि आप तो सन्यासी हैं, आपको क्या लेना देना सांसारिक बातों से | यदि फिर भी मैं न रुकूँ तो मुझे पाखंडी कहेंगे…. अधिकाँश लोगों के साथ यही होता है कि वे चुप रह जाते हैं | लेकिन मेरे साथ नहीं होगा | क्योंकि यदि अन्याय हो रहा है, तो ईश्वर को भी आना पड़ता है विरोध करने के लिए, तो फिर मैं तो साधारण सन्यासी हूँ |

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जब मैं सन्यासी होकर विरोध कर सकता हूँ, तो क्या आप लोग नहीं कर सकते भ्रष्टाचारियों, उपद्रवियों और अपराधिक गतिविधियों का ?

यदि आपने वह फिल्म न देखी हो, तो एक बार अवश्य देखें और समझें कि राजनीति कैसे जनता को मुर्ख बनाती है | और यदि आपको लगता है कि फिल्म में सब सच्चाई नहीं होती तो उनको समझाएं जो आमिर की फिल्म का विरोध कर रहें हैं कि फिल्मों में सब सच्चाई नहीं होती |

यह भारत सरकार की असफलता है कि उनकी राष्ट्रीय सेना और पुलिस व्यवस्था पर से धार्मिक संगठनो का विश्वास उठ गया है और उन्हें अपनी अपनी निजी सेनायें बनानी पड़ रही है | यही सेनायें कल अलकायदा और तालिबान का रूप ले लेंगी, लेकिन सरकार को अपनी सत्ता और अय्याशी से फुर्सत मिले तो कुछ सोचे भी राष्ट्र व जनता के विषय में | पहली फिल्म को यदि आप देख और समझ चुके हैं, तो यह देखिये कि किस प्रकार हिन्दूसंगठनों की आधिकारिक सेना धमकियाँ दे रहीं हैं | जिस प्रकार ये लोग जनता के हितैषी होने का दिखावा कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि ये लोग जिस राज्य की बात कर रहे हैं, वहाँ से सीमा सुरक्षा बल और पुलिस व्यवस्था हटा ली गयी है और अब इन्हीं के भरोसे छोड़ दिया गया है वह राज्य | इसी प्रकार मुस्लिमों की भी अपनी सेना होगी और सिक्खों की अपनी सेना | -विशुद्ध चैतन्य

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