“मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है |” -स्वामी विवेकानंद

कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब अन्दर ही है | हम केवल आविष्कार करते हैं खोज करते हैं, क्योंकि हमने कई जन्म लिए और उन सभी जन्मों में हमने कुछ न कुछ सिखा | अब तो विज्ञान भी इस बात से सहमत हो गया कि पूर्वजन्म-पुनर्जन्म होता है क्योंकि उनके पास अब प्रमाण उपलब्ध हैं | बाहर से जो कुछ भी हमें मिलता है, वह केवल एक प्रेरक के कार्य ही करता है | भारत में गुरु अर्थ अँधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने वाला व्यक्ति होता | गुरु का महत्व भारत में केवल इसलिए है, क्योंकि गुरु ही किसी व्यक्ति को स्वयं से पहचान करवाता है | गुरु कोई ज्ञान अलग से नहीं देता उसे | प्राचीन गुरुओं के विषय में यदि पढ़ा हो तो वे सभी एक ही तरह की विद्या या शिक्षा नहीं देते थे | सभी गुरुओं कि अपनी एक विशेषता हुआ करती थी और उनकी शिक्षा देने के तरीके भी भिन्न थे | गुरु की सेवा का मुख्य उद्देश्य होता था गुरु को प्रसन्न करना व स्वयं को विनम्र बनाना | व्यक्ति जब तक अहंकार में रहता है वह गुरु को समझ नहीं पाता और न ही समझ पाता है स्वयं को |

उस समय गुरु और शिष्य के बीच माँ-बाप या कोई कानून नहीं होता था क्योंकि गुरु प्रत्येक शिष्य से भिन्न-भिन्न व्यवहार करता था, ताकि प्रत्येक शिष्य के भीतर छुपी हुई प्रतिभा को खोजा जा सके | गुरुकुल से निकलने वाला शास्त्रों में पारंगत हो सकता था, अन्य विद्याओं में भी निपुण हो सकता था…. लेकिन उसकी सबसे बड़ी उपलब्धी होती थी कि वह अपनी एक अलग पहचान भी खोज पाता था | वह मात्र शिष्य या विद्यार्थी ही नहीं रहता था वह अर्जुन, भीष्म, कर्ण… जैसी अपनी एक पहचान भी रखते थे | युद्धकौशल के साथ वे व्यवहारिक रूप से अपनी एक छवि भी रखते थे | वे अपनी तुलना दूसरों से नहीं करते थे और अपनी व्यकतिगत छवि का भी विशेष ध्यान रखते थे |

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तो शिक्षा का अर्थ है स्वयं को खोजने का प्रयास करने कि विधि को जानना | अब यह विधि कोई भी हो सकती है और कैसी भी हो सकती है | आप भजन करें, ध्यान करें, प्रयोग करें, डिग्री लें….. सभी शिक्षा ही हैं | लेकिन शिक्षा डिग्री लेने और फिर नौकरी करना नहीं है | शिक्षा का अर्थ है स्वयं की विशेषता से परिचित होना | जब आप स्वयं से परिचित होते हैं तो आप एडिसन बनते हैं, न्यूटन बनते हैं, व्यास बनते हैं, बाल्मीकि या तुलसीदास बनते हैं | क्योकि ज्ञान तो भीतर ही होता है बहार नहीं |

जिस प्रकार एक सेव न्यूटन के भीतर छुपे ज्ञान से परिचय करवाता है, वैसे ही समय समय पर हमें कोई न कोई घटना स्वयं से परिचय करवा देती है | और जब स्वयं से परिचय होता है, तब वही भाव और वेदना प्रकट होती है, जो इस पाकिस्तानी युवक ने प्रकट की |

जब कोई चोट या कोई घटना व्यक्ति को भीतर झाँकने पर विवश कर देती है, तब वह पाता है कि भीतर से तो हम सभी एक ही धर्म के हैं | तब वह समझ पाता है कि बाहरी शिक्षा में कहीं कोई चूक है, कोई भूल अवश्य है जिसके कारण हम इतनी नफरत और हिंसा पाले बैठे हैं | तब समझ में आता है कि हमें लोगों ने शिक्षा और धर्म के नाम पर गुलाम बना रखा है | तब समझ में आता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में दूसरों के लिए इतनी घृणा क्यों है | और जिस दिन उसे समझ में आ जाता है, वह अकेले ही टकराने निकल पड़ता है मानवता के शत्रुओं से | उसे तब उनसे लड़ने के लिए किसी हथियार की भी आवश्यकता नहीं होती | वह फिर किसी से नफरत नहीं कर्ट पाता, सिवाय उन लोगों के,  जो धर्म के नाम पर राजनीती करते हैं, आपस में बाँटते और लड़ाते हैं, निर्दोषों और मासूमों की लाशों पर अपनी रोटियाँ सेंकते हैं | क्योंकि सनातन धर्म किसी शास्त्र, राष्ट्र या मान्यता पर आधारित नहीं होता, वह तो शाश्वत है और सभी कोई इतनी स्वतंत्रता देती है कि वह अपनी सीमा में बिना दूसरे को क्षति पहुँचायें स्वाभिमान पूर्वक जी सके और सभी के लिए सहयोगी होते हुए विकास कर सके |

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यहाँ जो पोस्टर दिख रहा है, उसमें लिखा है –
“इंडिया , अमेरिका, इजरायल खाक में मिल जायेंगे,
मासूम बच्चों का खून रंग लायेगा ..इंशा अल्लाह”
-जमातुत दावा, पेशावर

लेकिन यदि यही शिक्षा जब थोपी हुई होती है न कि खोजी हुई, तो फिर ‘अलकायदा’ और ‘आईसीस’ जैसे संगठन और कट्टर धर्मांध आस्तित्व में आते हैं | या फिर तथाकथित ‘आम जन’ जिनमें और भेड़-बकरियों में कोई अंतर नहीं होता | धर्मांध अपने कुकर्मों को देख पाने में असमर्थ होते हैं क्योंकि उनको शिक्षा ही मिली होती है दूसरों को देखने की | उन्होंने बचपन से कभी अपनी ओर देखा ही नहीं होता, इसलिए उनको स्वयं के अस्तित्व का भी पता नहीं होता | वे तो जोम्बी या रोबोट की तरह बस आज्ञा का पालन करते हैं बस | उनके पास अपना विवेक अपना स्वाभिमान जैसा कुछ नहीं होता | उन्हें हूरों और शराब के लालच में जीवन भर मुर्ख बनाया जा सकता है | ऐसे लोग किसी भी किसी की भी हत्या कर सकते हैं बिना कारण जानें, क्योंकि इनका धर्म केवल गुलामी ही होता है | इनको यही समझाया व सिखाया जाता है कि तुम्हें ताकतवर लोगों की गुलामी करनी है और फिर वे चाहे कितने ही अधर्मी क्यों न हों, बस उन्हें ईश्वर और मालिक मानकर उनकी सेवा करना है और उनका आदेश मानना है |

इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त लोग हर घटना के लिए दूसरों को दोष देते हैं, जैसे कि ये हाफिज सईद के ग़ुलाम, पेशावर में अपने ही पाले तालिबानी संगठन के हाथों मारे गए अपने ही देश के बच्चों के लिए, शोक प्रकट करते समय भी यही माने बैठे हैं कि हमारे पाले साँपों ने हमे केवल इसलिए डसा क्योंकि भारत, अमेरिका, इजरायल ने उनके साँपों के दूध में कुछ मिला दिया था | ऐसी शिक्षा  प्राप्त लोग अपनी गरीबी, बेरोजगारी…बीमारी… सभी कुछ के लिए दूसरों को दोष देते हैं और ऐसे ही लोग कट्टर धार्मिक होते हैं क्योंकि न धर्म का इनको कोई ज्ञान होता है, न स्वयं का बस चूँकि मालिक ने कह दिया कि दूसरों के कारण तकलीफ है तो है | अब अपने पैरों में खुद ही कुल्हाड़ी मारकर पडोसी को दोष देंगे कि तूने देखा था इसलिए कुल्हाड़ी से चोट लगी मुझे |

अब तय आप लोग कीजिये कि कैसा जीवन जीना चाहते हैं ? मानव का,  या गुलाम का ? यदि मानव जीवन जीना चाहते हैं तो भेड़ों का जीवन त्यागना पड़ेगा और भेड़ियों से आमना सामना करने के लिए उठ खड़ा होना होगा | अपने बच्चों को पढ़ाई जा रही पुस्तकों पर नजर दौड़ाइए कि कहीं उनमें दूसरों के लिए ज़हर तो नहीं घोला जा रहा ? यदि ऐसा है तो शिक्षा व्यवस्था को ही बदल डालिए | क्योंकि आप इन धर्म के ठेकेदारों की गुलामी करने के लिए दुनिया में नहीं आये हैं | आप भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने कि धर्मों के ठेकेदार और उनके पाले गुलाम | -विशुद्ध चैतन्य

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