अचकन

मुल्ला नसीरुद्दीन के दोस्त जमाल बहुत दिनों बाद उनसे मिलने पहुंचे। दोस्त से मिलकर मुल्ला बहुत खुश हुए। उन्होंने जमाल से कहा, चलो, बाहर घूम आते हैं। जमाल ने कहा, नहीं, मेरे कपड़े अच्छे नहीं हैं। ऐसे में बाहर जाकर लोगों से मिलना नहीं चाहता।

मुल्ला- बस, इतनी-सी बात है! मेरे पास एक बहुत अच्छी अचकन है। वह तुम पर बहुत फबेगी। तुम वही पहन लो।

जमाल- अरे नहीं, ऐसे ही ठीक है।

मुल्ला- नहीं, तुम मेरे दोस्त हो। तुम्हें पहननी होगी।

मुल्ला ने जिद करके जमाल को अचकन पहना दी। फिर दोनों साथ घूमने निकले। मुल्ला जमाल को अपने पड़ोसी से मिलाने ले गए। मुल्ला ने पड़ोसी से कहा, इनसे मिलो, ये मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं। वैसे, इन्होंने जो अचकन पहनी है, वह मेरी है।

जमाल पर मानो घड़ों पानी पड़ गया। उसे मुल्ला पर बहुत गुस्सा आया। बाहर आने के बाद जमाल ने कहाः तुमसे किसने कहा था कि तुम अचकन को अपना बताओ। तुम्हारा पड़ोसी क्या सोचेगा कि इसके पास कपड़े हैं ही नहीं।

मुल्ला, गलती हो गई। अब मैं ऐसे नहीं बोलूंगा।

फिर दोनों आगे घूमने निकले। थोड़ी दूर जाकर नसीरुद्दीन के एक और जानकार से उनकी मुलाकात हुई। नसीरुद्दीन ने बहुत खुश होकर जमाल को उससे मिलवाया।

मुल्ला, इनसे मिलो। ये जमाल साहब हैं। मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं। उन्होंने जो अचकन पहनी है, वह इनकी अपनी है।

जमाल को यह बात बहुत बुरी लगी। वह बेहद गुस्से से बोला, अजीब आदमी हो तुम। तुमसे किसने कहा था कि तुम दोस्त को यह बताओ कि अचकन किसकी है? अचकन के बारे में बात करने की जरूरत ही क्या है?

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मुल्ला ने फिर माफी मांगी और कहा कि अब वह कुछ भी बोलते हुए ध्यान रखेंगे। जब दोनों घर की ओर लौटने लगे तो मुल्ला के एक पुराने दोस्त से उनकी मुलाकात हो गई।

मुल्ला ने बहुत खुश होकर कहा, इनसे मिलो। ये जमाल साहब हैं। मेरे बहुत पुराने दोस्त और इनकी अचकन के बारे में तो कुछ न ही कहा जाए तो बेहतर है!!!

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