आज चारों ओर धर्म खतरे में है का शोर मचा हुआ है लेकिन वास्तव में धर्म से किसी का कोई लेना देना ही नहीं है |

आप यदि अपने सामाजिक परिवेश में देखें तो पायेंगे कि गाली-समान्य रूप से स्वीकार्य है | आप बसों मे,ट्रेन में, बाजारों में कुछ ऐसे शब्द या वाक्य अवश्य सुन पायेंगे जो परिभाषित करने पर या अर्थ निकालने पर बहुत ही घृणित लगेंगे | लेकिन हम लोग अब पढ़े लिखे हो गये हैं और धार्मिक तो आदिकाल से ही हैं, इसलिए हम विरोध नहीं कर सकते | चलिए मान लिया की सड़क में किस किस को रोकेंगे… यह संभव भी नहीं है | लेकिन हम अपने स्कूलों और घरों में तो यह संस्कार दे ही सकते थे ?

लेकिन नहीं कर पाए हम वह, जो हमें करना चाहिए था | यहाँ हम अपने धर्म का पालन नहीं कर पाए क्योंकि हमारे धर्म इतने कमजोर हो गये हैं | हम अपने बच्चों को अच्छे संस्कार और भाषा नहीं दे पाए  जो कि हमारे धर्म का प्रथम अध्याय है | अर्थात सबसे पहले अच्छे संस्कार और भाषा ही सिखाई जाती थी हमारे गुरुकुलों में | लेकिन हम आज शिक्षा में संस्कार, शालीन भाषा सिखाने में असफल हो गये | लेकिन हम चीख रहें हैं, चिल्ला रहें हैं कि धर्म खतरे में हैं |

हमारे अपने लोग शोषण का शिकार हो रहें हैं नेताओं और अधिकारीयों के द्वारा | वे अपने धर्म के पालन में असमर्थ हो चुके हैं, लेकिन हमें कोई चिंता नहीं है | आज ही एक व्यक्ति गाँव से आया कि पहले ८०-१००/-रूपये महीने का बिल आता था, लेकिन अब अचानक ११०००/- रूपये का बिल आ गया | उन्होंने कहा कि पाँच हज़ार रूपये जमा करवा दो ठीक कर देंगे लेकिन अगले बिल में पाँच हज़ार रूपये का ज़िक्र ही नहीं किया | अब चक्कर लगा रहा हूँ बाबुओं के पास तो कह रहें हैं पूरे पैसे जमा करवाओ बाद में देखेंगे | अब मेरी शक्ल देखते ही डांट कर भगा देते हैं…….

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अब बताइये ! क्या किसी का धर्म खतरे में पड़ा ?

नहीं पड़ा ! क्योंकि ये धर्म नहीं है | हम नए नए कानून बना रहें हैं, लेकिन बचपन में जो संस्कार दिए जाने चाहिए, वे नहीं दे रहें हैं क्योंकि संस्कार देना हमारा धर्म नहीं है, वह तो स्कूल का काम है | तथाकथित धार्मिक लोग असहमत होने पर इतने नीचे गिर जाते हैं कि उनसे बातचीत के लिए उतना नीचे उतर पाना हर किसी के लिए संभव नहीं हो पाता | हम जानते हैं कि उसी की भाषा में कैसे उत्तर दिया जाए और उत्तर भी ऐसा दे सकते हैं कि सात पीढियां उसकी नीचे गिरकर बात नहीं करेगी | लेकिन उतने नीचे उतरने के बाद फिर वापस वहाँ पहुँचाना हम जैसे लोगों के लिए कठिन हो जाता है | उनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि वे तो कभी न उठे थे और न कभी उठना चाहते हैं | वे तो उसी में सुखी हैं जहाँ हैं | लेकिन उन्हें भी भ्रम है कि गाली-गलौज करके वे कोई बहुत महान कार्य कर रहें हैं | उनके नेता उन्हें प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि गाली-देने वालों के मुँह लगना कोई नहीं चाहता और उन्हें लगता है कि गाली देकर वे धर्म की रक्षा कर रहें हैं |  क्या उनको नहीं लगता कि उनके बच्चे यदि अशोभनीय भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, तो हमारे धर्म में ही कमी रह गयी ? क्या उन्हें नहीं लगता कि हमारे बच्चों को शालीनता व शालीन भाषा दिखाने के लिए नहीं, आत्मा से ही अपनानी चाहिए ? क्या उन्होंने कभी अपने इस धर्म का पालन किया ?

तो फिर किस धर्म की रक्षा करने निकले हैं ? क्या हरे, काले और भगवा रंग को आपलोग धर्म मान रहें हैं ? यदि ऐसा है तो फिर धर्म से आपका कोई परिचय ही नहीं हुआ है | यदि आपने कपड़ों और रंगों को धर्म मान लिया है तो फिर तो बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गयी है | इसका अर्थ तो यही हुआ कि इस देश में जितनी भी हरियाली है, वह मुस्लिम है और जितने रेगिस्तान हैं वे हिन्दू | सूर्य हिन्दुओं का हो गया और अँधेरा मुस्लिमों का… अब लड़ते रहो | हिन्दुओं को अँधेरे से दूर रहना होगा और मुस्लिमों को सूर्य की रौशनी से | सारे हिन्दुओं  को रेगिस्तान चले जाना होगा क्योंकि हरियाली मुस्लिमों की हुई, हिन्दुओं के लिए हरी सब्जी खाना पाप होगा और मुस्लिमों के लिए पका हुआ आम और संतरा खाना हराम होगा ….. है न बे सर पैर की बात ?

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तो क्यों अपने ही घर में अपने ही लोगों के विरुद्ध उपद्रव कर रहे हो ? मुस्लिमों को भी चाहिए कि वे खुलकर आतंकवाद का विरोध करें और हिन्दुओं को भी चाहिए कि वे अपने ही देश के मुस्लिमों के विरुद्ध आपत्तिजनक वक्तव्य न दें | आतंकवाद न हिन्दू है और न ही मुस्लिम, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, वह तो मात्र हवस है शैतानो का | दोनों ही मारे जाते हैं आतंकवाद का जब विस्फोट होता है | इसलिए दोनों को मिलकर ही उसका सामना भी करना होगा |

तो वास्तव में जो धर्म हमारा ध्वस्त हुआ जा रहा है उसकी तो चिंता कोई नहीं कर रहा, लेकिन धर्म की रक्षा के लिए निकले हुए रंगीन झंडे लेकर माँ-बहन की गालियाँ देते ये धर्म-रक्षक….किसी भी धर्म के ठेकेदार को शर्म नहीं आ रही कि हमारी औलादें किस हद तक गिर चुकी हैं धर्म के नाम क्योंकि उनको तो धर्म नाम की चिड़िया का पता भी नहीं है | किसी धर्म के ठेकेदार को चिंता नहीं है कि हमारी यही अमर्यादित संताने कल सत्ता में आयेंगी और फिर यही संस्कृति आगे बढ़ेगी… गाली-गलौज की | आज तक बढ़ती आयी क्योंकि धर्म से अपरिचित थे…कोई बात नहीं | लेकिन अब तो पढ़े-लिखे हो गये और अब तो पढ़ सकते हो कि हमारे किसी भी अवतार या महान आत्माओं ने गालियों को अपनी भाषा का अंग नहीं बनाया था ? ध्यान रहे, गालियाँ न तो हमारे धर्म में स्वीकार्य हैं, न समाज में स्वीकार्य हैं और न ही संस्कार में | ये विदेशी संस्कार हैं और जो गालियों को धर्म का अंग मानते हैं वे विदेशी धर्मों से प्रभावित हैं और स्वदेशी धर्म से विमुख | -विशुद्ध चैतन्य

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