पूरे वर्ष में केवल दो दिन ही हमें अधिकार है राष्ट्रभक्त होने का

कल डीएवी पब्लिक स्कूल की शाखा खुलवाने के लिए बात करने एक पंडित जी आये | वे बोले कि आपके पास तो इतनी जमीन पड़ी हुई है, इसमें तो कई स्कूल खुल सकते हैं | डीएवीपी स्कूल वाले काफी समय से मुझे कह रहे थे कि आप लोगों से बात करूँ और यदि आप आज्ञा दें तो स्कूल खुलवा देंगे यहाँ पर | आप लोगों की दरिद्रता भी समाप्त हो जायेगी और महीने के महीने अच्छी कमाई भी हो जाएगी | उस स्कूल का बहुत नाम है…….

मैंने उनसे कहा, “पंडित जी आप गलत आ गये मेरे पास | बेहतर है आप जाकर ट्रस्टियों और आश्रम के अध्यक्ष से ही बात करें क्योंकि उन्हीं को शौक है अंग्रेजी संस्कृति और भाषा का | उन्हें शर्म आती है भारतीय होने में…….मेरे से पूछोगे तो साफ़ मना कर दूंगा | और जब तक बस में रहेगा अंग्रेजी संस्कृति वाले स्कूल तो यहाँ नहीं खुलने दूंगा |

यदि कभी खुला भी, या मैं इस योग्य हुआ कभी कि स्कूल खुलवा सकूं तो एक ऐसा स्कूल खोलना चाहता हूँ जो विश्व में अद्वितीय हो | जो भारतीय संस्कृति को ठीक उसी प्रकार प्रभावी रूप से सिखा व समझा पाए जैसे कि नालंदा और तक्षिला सिखाते व समझाते थे प्राचीन काल में | मेरे स्कूल के बच्चे वैसे ही राष्ट्रभक्त हों, जैसे जापान, जर्मन या रशिया के होते हैं | लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं अभी इतना समर्थ नहीं हूँ लेकिन एक दिन हो जाऊंगा |”

वे बोले, “वाह वाह…! कितने उच्च विचार हैं आपके…आप ने मेरे भीतर भी राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार कर दिया…. वैसे अध्यक्ष महोदय कब लौटेंगे ?”

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“अगले हफ्ते |” मैंने उत्तर दिया |

“फिर ठीक है मैं अगले हफ्ते आता हूँ उन्हीं से बात कर लूँगा स्कूल के विषय में….” कहकर व चले गये |

मेरी समझ में नहीं आया कि पंडित जी ने राष्ट्रभक्ति की परिभाषा क्या निकाली, और किस राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार हुआ उनमें ? कहीं वही तो नहीं जो आजकल के नेता और उनके दुमछल्लों के भीतर प्रवाहित हो रहा है…. जब तक विदेशी भारत में अपनी दुकान नहीं खोलेंगे हम भारतीयों का विकास नहीं होगा, जब तक अमेरिका हमारे सर पर हाथ नहीं रखेगा हम अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पायेंगे, जब तक अंग्रेजी नहीं बोलेंगे तब तक खेतों में फसल नहीं होगी और गाय दूध नहीं देगी…. आदि इत्यादि ?

चलिए जाने दीजिये हमें क्या करना अपना दिमाग खराब करके | पूरा राष्ट्र और उसके नेता ही जब अंग्रेजों के क़दमों में पड़ा हुआ है तो किस किस को उठाते फिरूंगा मैं भी | वैसे भी खाली हाथ आया था खाली हाथ जीया और खाली हाथ ही जाऊँगा | अकेला आया, अकेला जीया और अकेला ही जाऊँगा | तो काहे को इन अंग्रेजों की अवैध संतानों के मुँह लग कर अपना यह जन्म खराब करना ?

न जाने क्यों मैं कब विकसित हो पाऊंगा ? आज भी यही मानकर बैठा हूँ कि भारत भारतीयों का है जबकि सारी दुनिया जानती है कि भारत नेताओं, अपराधियों, पूंजीपतियों और विदेशियों का है | हम भारतीय तो केवल वोट-टैक्स देने और  ताली व जयकारा लगाने के लिए ही हैं | पूरे वर्ष में केवल दो दिन ही हमें अधिकार है राष्ट्रभक्त होने का, बाकी तो पूरा साल अमेरिका भक्ति में बीतता है | -विशुद्ध चैतन्य 

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