माफ़ करना अच्छा है, भूल जाना सर्वोत्तम

श्रेष्ठ विचार है यह और उन्नति का परिचायक भी | यदि हम किसी को माफ़ कर देते हैं तो न केवल हम स्वयं आगे बढ़ते है, बल्कि सामने वाले को भी आगे बढ़ने का अवसर देते हैं | हम अवसर देते हैं उसे उन गलतियों को न दोहराने का जो किसी विवशता या अज्ञानतावश हुई हो | हम अवसर देते हैं ऐसा करके समाज व राष्ट्र के लिए सहयोगी होने का |

लेकिन दुर्भाग्य से यह विचार भी अब केवल प्रवचनों और कंठस्थ प्रेमियों के गरारे करने के काम ही आता है | या फिर काम आता है अपराधियों और धूर्त नेताओं के | कोई अपराधी प्रवृति का नेता या अधिकारी अपराध करे, तो भी वह बेशर्मी के साथ सामने आकर कहता है कि हम कोर्ट का सम्मान करते हैं….. बाद में कोर्ट भी उनका सम्मान करती है और वह ससम्मान अपने पदों पर आसीन रहता है | बहुत हुआ तो कुछ पैसे वह भी जनता से ही झूठे वादे करके ठगे गए पैसों से जुर्माना भर कर मुक्त हो जाता है | न कोई अपराध भाव न ही कोई ग्लानी | अब वह अधिक सतर्कता से अपराध करता है क्योंकि वह उसकी प्रकृति ही है जो बदलना एक जन्म में संभव नहीं हो पाता अधिकांशतः |

वहीँ कोई गरीब या विवशतावश कोई आम व्यक्ति अपराध करता है, तब तुरंत सजा दे दी जाती है | कई बार तो पुलिस व न्यायालय की प्रतीक्षा भी नहीं की जाती | तो जिनको क्षमा की आवश्यकता है, उसे तो हम क्षमा नहीं करते, लेकिन जिसे सजा की आवश्यता है उसे क्षमा करने की सीख देते हैं | परिणाम यह होता है कि अपराधी निर्भय हो जाते हैं और निर्दोष व परिस्थितिवश या विवशतावश अपराध करने वाले सजा पाते हैं या जेलों में पड़े अपनी सजा सुनाये जाने की प्रतीक्षा करते हैं | कई बार बहुत ही छोटे अपराध के लिए भी दस से बीस वर्ष कारावास में बिता देते हैं लोग | नीचे सम्बंधित उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ |

१. ‘कोतवाली देहात के एक गांव में पंचायत के फरमान के बाद एक दलित युवक को फांसी पर चढ़ा दिया गया है। आरोप है कि युवक को गांव के एक शख्स की पत्नी के साथ पाया गया था। महिला के पति ने उसे पकड़ लिया और गांव में पंचायत बैठा दी। मारे गए युवक के पिता का आरोप है कि पंचायत ने प्रेमी को पहले पीटने का फरमान सुनाया और फिर उसे फांसी की सजा मुकर्रर कर दी। शीशम के पेड पर फांसी दी गई। फांसी देने वाले पंचायती और महिला का पति फरार बताए जा रहे हैं।’


वहीं दूसरी ओर युवक यदि दलित या कमजोर वर्ग का न हो, तो कैसे उसे माफ़ करने और उसके उज्जवल भविष्य के लिए सभी एक जुट हो जाते हैं वह भी देख लीजिये;

२. रोहतक रोडवेज बस स्टैंड से सोनीपत जाने वाली बस यात्रियों सी भरी हुई थी। इसमें कॉलेज से घर लौट रही पूजा और आरती दो बहनें भी थीं। बस में दो युवकों ने इन पर छींटकशी शुरू कर दी। पूजा और आरती ने इन लफंगों के सामने हथियार नहीं डाले बल्कि डटकर मुकाबला किया। बस में बैठे लोग खामोश थे लेकिन इन बहनों की इससे भी हिम्मत नहीं टूटी। इन्होंने अपने बेल्ट से लफंगों को जमकर सबक सिखाया। बहनों की हिम्मत देख बस में बैठे कुछ लोग भी नींद से आपत्ति जताने के मोड में आए। बस में सवार एक गर्भवती महिला ने लड़कियों की मदद के लिए इस वाकये को स्मार्ट फोन में रेकॉर्ड कर लिया। इस वजह से आरोपियों की पहचान मुमकिन हो सकी।

पुलिस को साथ लेकर राजेश कंसाला गांव पहुंचे तो वहां के युवकों ने विडियो देखकर आसन गांव जाने की सलाह दी। आसन गांव में विडियो देखकर इनमें से दो युवकों को पहचान लिया गया तो मोहित, कुलदीप और एक अज्ञात युवक के खिलाफ केस दर्ज कराया गया। इतने गंभीर मामले में पुलिस का रवैया एफआईआर दर्ज हो जाने के बावजूद टालमटोल का रहा। शनिवार को थाना सदर प्रभारी गजेंद्र सिंह ने दोनों पक्षों में पंचायती सुलह की कोशिशों की बात कही थी और जांच अधिकारी देवीरानी ने भी गिरफ्तारी में तकनीकी दिक्कतें जताई थीं।
छात्राओं ने बताया कि वे कोर्ट में बयान के लिए जा रही थीं तो उन्हें युवकों के परिजनों ने कोर्ट कैंपस में ही सही बयान न देने की चेतावनी दी। युवकों के परिजन आसन गांव के लोगों की पंचायत लेकर छात्राओं के गांव भी जा पहुंचे और युवकों का करियर खराब न करने जैसी बातें कहते हुए दबाव बनाने लगे। कुलदीप नामक आरोपी के पिता ने कहा कि उनका बेटे का आर्मी में चयन हो चुका है और 18 दिसंबर को उसकी जॉइनिंग है। सूत्रों के मुताबिक, अज्ञात बताए जा रहे युवक का भी आर्मी में चयन हो चुका है।

यहाँ एक और घटना, जिसमें एक महिला को जमानत मिल जाने के बाद भी जेल में केवल इस लिए १९ वर्ष बिताने पड़े, क्योंकि उसके पति ने जमानत के पाँच हज़ार रुपये जमा करवाने में असमर्थता जताई थी |

जेल में पैदा हुए बेटे ने दिलाई माँ को आज़ादी

अपना हाल सुनाती हुईं विजय कुमारी कहती हैं, “मैं एक अनपढ़ औरत हूं. मुझे नहीं पता कि मैं कब जेल भेजी गई थी लेकिन यह कोई 20 बरस पुरानी बात है. मेरे पति ने अदालत में कहा कि मुचलका जमा करने के लिहाज से वह बहुत गरीब आदमी है. और जैसे-जैसे दिन गुजरते गए मेरा परिवार आगे बढ़ता गया लेकिन मैं पूरी तरह से भुला दी गई. मेरा बड़ा बेटा कुत्ता काटने की वजह से मर गया. मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली. मेरी बेटी का ब्याह हो गया. किसी ने मुझे याद नहीं रखा.”

विजय कुमारी को फिलहाल कानपुर के पुनर्वास केंद्र में सहारा मिला है. पुनर्वास केंद्र के वाइस चेयरमैन बीबीएल श्रीवास्तव कहते हैं, “अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से विजय कुमारी को वाजिब मुआवजा देने के लिए कहा है. कोर्ट ने सरकार से उन लोगों के बारे में एक रिपोर्ट देने के लिए भी कहा है जो जमानत मिल जाने के बावजूद भी जेल में दिन काट रहे हैं.”

उपरोक्त सभी घटनाओ में एक बात जो सामने आती है, वह यह कि यदि आप आर्थिक रूप से कमजोर हैं या किसी प्रभावशाली व्यक्ति से सम्बंधित नहीं हैं, तो माफ़ी मिलना असंभव हो जाता है, वहीँ दंगों के अपराधी और कई करोड़ के घोटालों में लिप्त अपराधी भी सजा सुनाये जाने तक आराम से बाहर घूमते रहते हैं और कई तो अपनी पूरी उम्र बिता देते हैं लेकिन सजा का निर्णय नहीं होता पाता | और जब सजा सुनाया जाता है तब वह व्यक्ति दुनिया में नहीं होता |

तो हमारे सिद्धांत और न्यायव्यवस्था ही दोहरे मापदंडों पर आधारित है, भेदभाव पर आधारित है | ऐसे में इस प्रकार के सुविचारों का औचित्य ही क्या रह जाता है ? –विशुद्ध चैतन्य

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