कहते हैं कि इज्ज़त कमाने में जीवन गुजर जाती है…

यह सुविचार किसी ज़माने में मुझे बहुत ही सार्थक लगता था, लेकिन समय के साथ जाना कि यह वाक्य भी अब प्रवचनों और पुस्तकों तक ही सीमित रह गये या फिर कंठस्थ करने वाले विद्यार्थियों के लिए गरारे करने के काम ही आते हैं |

आज इज्ज़त कमाई नहीं, ख़रीदी जाती है, कमाने का काम तो वे लोग करते हैं जिनके पास न तो दौलत है और न ही स्वाभिमान गिरवी रखने का साहस | ऐसे लोग पूरा जीवन लगा देते हैं इज्ज़त कमाने में लेकिन भेड़-बकरियों का जीवन जीते हैं | ये बेचारे इज्ज़तदार लोग उनके सामने बौने हो जाते हैं, जिन्होंने कीमत देकर इज्ज़त खरीदा है | चूँकि इनके पास ले देकर स्वाभिमान ही बचा होता है, उसे छीन लेने का भय दिखाकर ये इज्ज़तदार लोग मनचाहा काम करवा लेते हैं |

कभी किसी इज्ज़तदार स्वाभिमानी लड़की को किसी का बिस्तर गर्म करना पड़ता है इज्ज़त बचाने के खातिर तो किसी इमानदार अधिकारी को मुँह बंद रखना होता है इज्ज़त बचाने की खातिर | क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी हैसियत ही नहीं है इज्ज़त खरीदने की | मीडिया भी ऐसे इज्ज़तदार लोगों के आसपास ही घुमती रहती दाल-रोटी के चक्कर में | क्योंकि इज्ज़त की खरीद फरोख्त में इनको मोटी दलाली मिलती है और ख़बरें जनता की हित की दिखाने से अधिक जनता को भटकाने वाली ख़बरों के लिए कीमत अच्छी मिलती है | ये तो ये लोग नेताओं के दरवाजों पर पड़े रहेंगे या फिर अभिनेताओं के | जनता के पास पैसे नहीं हैं कीमत चुकाने की तो जनता की परवाह किसे है | मीडिया में आये हैं धंधा करने के लिए न कि जन सेवा या राष्ट्र सेवा | ये सारी तो किताबी बातें हैं, जिसके दरवाजे से दाम मिलता हो वही राष्ट्र-सेवक और जन सेवक है बाकी सब तो नौटंकी हैं |

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कुछ लोगों को लगता है कि इज्ज़तदार लोगों के पीछे दुमछल्ला बने रहने में ही भलाई है, वे लोग तो थोक के भाव में इज्ज़त खरीदते हैं, तो छटांक भर इज्ज़त इनके झोली में भी छलक जाती है | बस उस छटांक भर इज्ज़त का नशा ही इतना हो जाता है इनको, जितना किसी को पूरी बोतल पीने के बाद भी नहीं होता | फिर ये दुमछल्ले निकलते हैं नशे में चूर, दूसरों की इज्ज़त लूटने | किसी से गाली-गलौज कर रहे होते हैं, तो किसी के साथ मार-पीट | किसी की बहु-बेटी उठा रहे होते हैं तो किसी को धमका रहे होते हैं |

एक बार इज्ज़त खरीद ली किसी ने तो कोई फिर उसको बुरा नहीं कह सकता और सारी दुनिया उसके क़दमों में झुकी हुई होती है | न ही कोई अदालत उसे जेल में रख सकती है और न ही उसे चुनाव लड़ने से रोक सकती है | फिर चाहे उसने कितने ही बड़े अपराध क्यों न कर रखें हों | चाहे सारी दुनिया को पता हो उसके अपराधों के विषय में, लेकिन वह भगवान् से भी अधिक महान हो जाता है | वह शान से आपके सामने से निकल जाएगा लेकिन आप उसको कुछ नहीं कह सकते क्योंकि मानहानि हो जायेगी उसकी | लेकिन वहीँ एक गरीब अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए झूठ ही बोल दे, या एक रोटी ही चुरा ले तो जघन्य अपराधियों की श्रेणी में खड़ा हो जाता है |

वाह रे धार्मिकों और इज्ज़तदार लोगों | जब किसी लड़की की इज्ज़त सरे बाजार नीलाम होती है, तब तुम लोग अपने धर्म की कम्बलों में दुबक जाते हो, जब एक भूमाफिया किसी कमजोर की भूमि पर कब्ज़ा करता है, तब तुम लोग दुबक जाते हो, जब एक माँ अपने बच्चों की खातिर आपना जिस्म बेचती है, तब तुम लोग दुबक जाते हो, जब एक पिता अपने बच्चे के इलाज करवाने के लिए चोरी करता है, तब तुम लोग दुबक जाते हो, जब एक किसान आत्महत्या करता है तब तुम लोग दुबक जाते हो……

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लेकिन शान से बाहर निकलते हो छटांक भर इज्ज़त के नशे में धर्म-रक्षक बनकर ! शोर मचाते हो नशे में खड़े होकर धर्म खतरे में है ! नफरत के बीज छिड़कते हो राष्ट्र में, एकता स्थापित करने के लिए…. और खुद को कट्टर धार्मिक, इज्ज़तदार मानते हो | लेकिन मनुभवः और वसुधैव कुटुम्बकम जैसे मूल भारतीय सिद्धांत को सेकुलरिज्म कहकर गाली देते हो ? –विशुद्ध चैतन्य

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