बैराग

मैं एक बहुत ही घने जंगल में ध्यान करने गया था और वहीँ एक बहुत प्राचीन संत से मेरी भेंट हो गई । मैंने उनसे उम्र पूछी तो बोले मुझे तो याद नहीं, खुद ही पढ़ लो । यह कहकर उन्होंने अपना पासपोर्ट दिखाया । पता चला कि उनकी उम्र पाँच हज़ार साल से भी अधिक है । मैंने तुरंत उनके पैर छुए और प्रश्न किया, “महाराज संन्यास या बैराग्य क्या है ?”
वे बोले, “सम्यक भाव से न्यायोचित विधि से वास करना ही संन्यास है । और किसी से राग-द्वेष न रखना बैराग है ।”
मैंने तुरंत दंडवत प्रणाम किये और जैसे ही ऊपर उठा और एक और प्रश्न करना चाहा, किसी ने दरवाजे पर दस्तक दे दी और मेरी नींद टूट गई । दरवाजा खोला तो देखा सेवक चाय लेकर खड़ा है । ~विशुद्ध चैतन्य 
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