आज समाज धर्म व संस्कृति के नाम पर दो भागों में बंट गया, नास्तिक और आस्तिक

जिस प्रकार विभिन्न प्रदेशों व जलवायु में रहने वालों की भेष-भूषा विभिन्न प्रकार की होती हैं, ठीक उसी प्रकार धार्मिक रीति-रिवाज भी भिन्न होते हैं | बर्फीले प्रदेशों में रहने वालों को भारी भरकम गर्म कपड़े पहनने पड़ते हैं और गर्म प्रदेशों के लोगों के लिए कपड़े न भी पहने तो कोई समस्या नहीं होगी |

लेकिन फिर भी कपड़ों की आवश्यकता तो होती ही है, चाहे हलके हों या भारी | निर्वस्त्र रहना सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध माना जाता है | आदिवासियों में भी शरीर के कुछ अंगों को पत्तियों व पशुओं के खाल से ढंके रखने का नियम है, चाहे वे कितने ही पिछड़ी सभ्यता के क्यों न हों | ठीक इसी प्रकार धार्मिक अनुष्ठान व संस्कार भी आवश्यक हैं सामजिक सामंजस्यता बनाए रखने के लिए | जो इन संस्कारों को पूरी तरह नकार देते हैं, वे समाज में धीरे धीरे अकेले पड़ने लगते हैं |

लेकिन आज समाज धर्म व संस्कृति के नाम पर दो भागों में बंट गया, नास्तिक और आस्तिक | एक तो वे लोग जिनकी आय अधिक है और आत्मनिर्भर भी, लेकिन धार्मिक संस्कारों का मजाक उड़ाते हैं और दूसरी ओर वे लोग जो दयनीय अवस्था में हैं लेकिन कट्टर धार्मिक हैं |

अब यह भी एक आश्चर्य ही लगता है कि जो किसान सर्वाधिक जनउपयोगी कार्य करता है, वह दरिद्र क्यों है और जो केवल चापलूसी करता है या मालिकों को खुश करने में ही लगा रहता है वह दिन पर दिन समृद्ध होता चला जाता है | जो परजीवी हैं वे और अधिक समृद्ध हैं |

कारण इतना कठिन भी नहीं है समझना | नास्तिक किसी की स्वतंत्रता पर कोई पाबन्दी नहीं लगाता और न ही वह अपने विचारों को थोपता है किसी पर | वह किसी को तब तक नहीं टोंकेगा, जबतक कि उसे स्वयं को किसी से को असुविधा न हो रही हो | जबकि जो स्वयं को धार्मिक मानते हैं, वे दूसरों को अपनी मान्यताओं को मनवाने के चक्कर में लगे रहते हैं | धर्म व संस्कार के नाम पर वे कम्बल पर कम्बल ओढ़ाए चले जाते हैं और एक दिन धार्मिकों को अच्छा बुरा दिखना भी बंद हो जाता है |

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आज किसी धार्मिक का पोस्ट पढ़ा कि “हिन्दू दोगले होते हैं जो अपने ही संत-महंतों के विरुद्ध बोलते हैं जबकि किसी और धर्म के लोग अपने धर्म-गुरुओं के विरुद्ध सुनना भी पसंद नहीं करते |” अब यह व्यक्ति शुद्ध धार्मिक मुर्ख है और इसे दिखना बंद हो चुका है | दुर्भाग्य से वह मेरी मित्र सूची में था उसे मैंने सूची से बाहर कर दिया | क्योंकि ऐसे मूढों के कारण ही धर्म व संस्कार बोझ बन गये भारत के लिए | ऐसे लोग न तो ये स्वयं ऊपर बढ़ पाएंगे कभी और न ही किसी को बढ़ने देंगे |

धर्म या संस्कारों की नींव उन आदर्शो पर रखी गयी है, जिसे हम सनातन कहते हैं | जो सभी के लिए मान्य हो और जो सभी के हित के लिए हो | जो सहयोग की भावना लिए हो और जो अध्यात्मिक उत्थान की ओर प्रेरित करती हो | और यह सब सनातन है, अर्थात जब ग्रन्थ नहीं लिखे गये थे तब भी और जब मानव आस्तित्व में नहीं आया था तब भी निर्बाध रूप से जिस धर्म का पालन होता रहा वही सनातन धर्म है | जैसे नक्षत्रों का अपनी धूरी पर गति करना और एक निश्चित दूरी बनाये रखते हुए मिलकर गति करना | अर्थात अपनी सीमा का उल्लंघन न करना व दूसरों की सीमा की मर्यादा रखना | यही वह धर्म है जो शास्त्रों में भी कहा जाता रहा लेकिन शायद किसी की समझ में नहीं आया | निःस्वार्थ सेवा करना ठीक वैसे ही जैसे एक वृक्ष हमें ऑक्सीजन देता है बिना किसी शर्त के | आप की इच्छा है कि आप उसे कार्बनडाई ऑक्साइड दें या न दें, कम दें या अधिक दें वह कोई कंजूसी नहीं करेगा |

धर्म को धर्म के ठेकेदारों ने वह कम्बल बना रखा है ठीक वैसा ही जैसा कि इस तस्वीर में भेड़ ने ओढ़ रखा है | भेड़ को तो यह प्रकृति ने दिया है और प्रकृति ही इसे हल्का भी कर देती है मौसम के अनुरूप | लेकिन धर्म के ठेकेदार यही कम्बल बिना यह देखे कि किसकी प्रकृति कैसी है, सभी को ओढ़ाना चाहते हैं | मुस्लिम अपनी अरबी संस्कृति जो कि रेगिस्तानी जलवायु के अनुरूप बनी थी और कबीलाई मानसिकता लिए हुए है, उसे थोपना चाहते हैं पूरे विश्व में और पंडित थोपना चाहते हैं मैदानी इलाकों के नियम कानून दुनिया भर में | जबकि प्रकृति किसी पर कोई दबाव नहीं बनाती और स्वाभाविक रूप से किसी को भी वातावरण के अनुकूल होने का समय देती है | एक मैदानी क्षेत्र का व्यक्ति पहाड़ों में जाता है, तो उसे असुविधा होती है कुछ समय के लिए | लेकिन धीरे धीरे उसका शरीर उस वातावरण में रहने के लिए अभ्यस्त हो जाता है | व्यक्ति को स्वयं पता नहीं चलता कि कब वह सहज हो गया और कैसे |

आज विज्ञान ने जितनी सुख सुविधाएँ मानव जाति को उपलब्ध करवायीं, उतनी सुविधाएँ तो धार्मिक बंधनों में बंधे हुए लोगों के लिए तो सोच पाना भी कठिन था | वैज्ञानिकों को कई बार धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध जाना पड़ा और कईयों को धार्मिकों द्वारा दी गयी यातनाएं भी सहनी पड़ी तो कईयों को मृत्युदंड भी मिला | आज वे ही धार्मिक लोग वैज्ञानिकों के आविष्कार किये टीके से लेकर टेबलेट तक लेते हैं, लेकिन फिर भी मूढ़ता से मुक्त नहीं हो पाते | कई अध्यात्मिक गुरु आये स्वामी विवेकानंद और ओशो जैसे, लोगों को भौतिक व अध्यात्मिक जगत में सामंजस्यता समझाने के लिए लेकिन मूर्खों को फिर भी समझ में नहीं आया |

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ये तथाकथित धार्मिकों के साथ मुश्किल यह है कि इनका निजी कोई आध्यात्मिक अनुभव नहीं है, केवल सुनी सुनाई बातों और रटी-रटाई कथा-कहानियों पर ही इनकी मान्यताएँ आधारित हैं | न तो ये कभी इतने ऊपर उठ पाए कि समझ सकें कि जो रटे जा रहें हैं बरसों से उसका अर्थ क्या है | कभी ईश्वर के नाम पर लोगों को मुर्ख बनाते हैं तो कभी धर्म के नाम पर मतभेद पैदा करते हैं | कभी माँसाहारियों को कोसते हैं तो कभी दूसरी मान्यताओं और सम्प्रदायों को | क्योंकि न तो इनको ईश्वर का कोई भय है और न ही धर्म की कोई चिंता, इनको तो केवल धार्मिक कम्बलों में लिपटे रहना स्वर्ग की अप्सराओं और जन्नत की हूरों के सपनो में खोये रहना ही पसंद है | न खुद कोई आविष्कार करेंगे और न ही किसी और कोई को खोजने देंगे कोई नई राह | -विशुद्ध चैतन्य

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