मानव जीवन का उद्देश्य

कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | मैं, मेरी तन्हाई और दारु की मटकी भटकते हुए एक संत-सम्मलेन में पहुँच गये | वहाँ दुनिया भर से संत-महंत और धर्मों के ठेकेदार आये हुए थे | लाखों धार्मिक भी वहाँ पर एकत्रित थे | विषय था, ‘मानव जीवन का उद्देश्य’ |

मैंने दो घूँट लगाए और वहीँ एक पेड़ के नीचे लुढ़क गया | सोचा कि जीवन में कभी कोई पुन्य तो किया नहीं, आज इतने महान आत्माएं एकत्रित हुईं हैं तो इनके कुछ अमृत-वचन सुन लूँगा तो शायद कुछ पुण्य प्राप्त हो जाए |

सभी विद्वान् अपने अपने विचार रख रहे थे और धार्मिक लोग भाव-विभोर हो रहे थे | कोई गीता के श्लोक सुना रहा था तो कोई रामायण के, कोई क़ुरान की आयतें सुना रहा था तो कोई बाइबल के अंश | शाम तक वहीँ बैठा रहा मैं और मुझे यह जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि सभी धर्म तो एक ही बात कहते हैं, बस कहने का ढंग अलग अलग है | सभी ईश्वर से प्रेम करना ही सिखाते हैं, सभी समर्पण करने के लिए ही कहते हैं और सभी मोह-माया के विरुद्ध ही हैं | सभी नशे को गलत बताते हैं, सभी हिंसा के विरोध में हैं….. कुल मिलाकर भीतर कोई भेद नहीं है | केवल मानव से प्रेम करना पाप है, केवल सुख की अभिलाषा करना पाप है….जो कुछ पाना है वह मरने के बाद ही पाना | जो कुछ भी मिलेगा वह स्वर्ग, जन्नत और हेवन में ही मिलेगा | हूरें, अप्सराएँ, परी सभी कुछ…. लेकिन जीते जी नहीं, क्योंकि जीते जी इनकी कामना करना पाप है |

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सभा के अंत में मंच में बैठे संतों में से एक की नजर मुझपर पड़ी और मुझे बुलाया; “आपको शर्म नहीं आती इतने बड़े धार्मिक अनुष्ठान में आकर भी नहीं सुधरे ? यहीं बैठ कर शराब पी रहे हो ?” उन्होंने मुझे बड़े प्यार से कहा |

“जी मैं तो सांसारिक व्यक्ति हूँ, आप लोगों की तरह महान आत्मा तो हूँ नहीं, इसलिए शर्म आदि से मेरा कभी परिचय हुआ नहीं | सोचा था कि आप लोगों की अमृतवाणी से कोई लाभ हो जाएगा….” मैंने भोलेपन से उत्तर दिया और दो घूँट लगा लिया | “वैसे आप सभी की बातें सुनने के बाद यही समझ में आया कि मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर की अराधना करना और उनका नाम जपते रहना मात्र ही है | हमें केवल ईश्वर को पाने का प्रयत्न करना चाहिए… है न ?” मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा |

“बिलकुल बिलकुल ऐसा ही है | वाह तुमने कुछ तो सीखा कम से कम !” वे खुश होते हुए बोले |

“यदि ईश्वर को केवल अपने भक्ति ही करवानी होती, जयकारे ही लगवाने होते, तो वे हमें दुनिया में भेजते ही क्यों ? क्या उनके पास जगह की कमी थी जो उन्होंने हमें पृथ्वी पर भेजा ? क्या उनके पास घंटे, घड़ियाल आदि नहीं थे ? क्या मानव को मानव का सहयोगी होना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए ?” मैंने कई प्रश्न कर दिए उनसे |

वे आँखे बड़ी बड़ी करके देखने लगे और बोले, “इस बेवड़े को उठाकर बाहर फेंक दो क्योंकि इस पापी को धर्म की बातें समझ में कभी नहीं आ सकती |” और मुझे उठाकर धार्मिकों की दुनिया से बाहर फेंक दिया गया | तब से आज तक फिर कभी धार्मिक नहीं हो पाया | –विशुद्ध चैतन्य

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