धर्म-बैंक

एक समय था, जब धर्म दो ही हुआ करते थे कर्त्यव्य सूचक या प्रकृति सूचक | कर्तव्य सूचक धर्म में राष्ट्र-धर्म, पुत्र-धर्म, पिता-धर्म, पति-धर्म, पत्नी-धर्म……. आदि आते थे | जबकि प्रकृति सूचक धर्म में जल, वृक्ष, अग्नि, पशु-पक्षियों के व्यव्हार व गुण आदि का उदाहरण लिया करते थे | हाँ उस समय भिन्न भिन्न मत और पंथ अवश्य थे और उनमें भी आपस में टकराव हुआ करता था, लेकिन तब हम लोग विकसित नहीं थे और तब धर्म खतरे में नहीं पड़ा करता था | सकारात्मक या नैतिकता को धर्म माना जाता था और नकारात्मकता और अनैतिकता को अधर्म माना जाता था | ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ का अर्थ होता था कि यदि अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहोगे तो ही तुम सुरक्षित रहोगे और यदि कर्तव्यों से विमुख हुए तो विनाश निश्चित है | अर्थात तुम धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा |

फिर हम विकसित हुए, समझदार भी हुए और अलग अलग पंथ और मत के होते हुए भी, हमने विदेशियों के साथ मिलकर लड़ाइयाँ भी लड़ी | अंग्रेजों ने हमें अंग्रेजी सिखाई और कई रुढ़िवादी प्रथाएं समाप्त भी करवायीं | हमारे नेता विदेशों से महँगी-महँगी डिग्री लेकर आये और तब उन्हें समझ में आया कि धर्म का अर्थ वह नहीं जो हम सदियों से समझते आये हैं | धर्म का अर्थ होता है रिलीजन या मजहब | अब प्रमुख धर्म हो गये हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौध, जैन…. आदि बाकी सभी गौण हो गये | फिर हमने तय कर लिया कि अब हम साथ-साथ नहीं रह सकते क्योंकि अब न तो मुग़ल रह गये और न ही अंग्रेज तो भला हम साथ साथ क्यों रहें ? तो भारत के तीन टुकड़े किये गये और पाकिस्तान और बांग्लादेश बनाया गया | उन दोनों देशों में मुस्लिम चले गए और वहाँ के हिन्दू भारत में आ गये |

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लेकिन समस्या तब भी नहीं सुलझी और अल्संख्यक और बहुसंख्यक वाली नई समस्या खड़ी हो गयी जो कि शायद पहले नहीं थी | यह भी समस्या इतनी बड़ी नहीं थी जितनी की धर्म की सुरक्षा की समस्या थी क्योंकि अब धर्म की नवीन परिभाषा हो गयी थी | अब धर्म सनातन नहीं रह गया था और बहुत ही कोमल व संवेदन शील हो गया था | अब कोई भी कभी भी किसी के भी धर्म को क्षति पहुँचा सकता था | अब धर्मों को अपनी अपनी सेनायें और संगठन बनानी पड़ीं धर्म की सुरक्षा के लिए | क्योंकि सीमा सुरक्षा बल तो सीमा की सुरक्षा के कारण धर्म की रक्षा करने में असमर्थ थीं और पुलिस नेताओं और अपराधियों की सुरक्षा में व्यस्त रहतीं हैं | जनता को तो टैक्स चुकाने और दाल-रोटी का जुगाड़ करने कि व्यस्तता के कारण, धर्म की सुरक्षा के विषय में सोचने का समय ही नहीं मिल पाता था |

तो विद्वानों ने धर्म को मंदिरों और मस्जिदों में सुरक्षित रखना शुरू किया | लेकिन तब भी कुछ धर्म इतने संवेदनशील और कोमल होते हैं कि कोई भी ऐरा-गैरा धर्म को खतरे में डाल देता है, और फिर धर्म-रक्षक सैनिकों को जाकर उस व्यक्ति या परिवार के घर को जलाकर या उसे जलाकर या उसके घर की महिलाओं के साथ बलात्कार करके और फिर लूट-पाट करके धर्म की रक्षा करनी पड़ती है |

लेकिन समस्या फिर भी सुलझने के स्थान पर और उलझती चली जा रही है और आज विश्व भर में धर्म की रक्षा के लिए धर्म-रक्षक सैनिक स्त्रियों का अपहरण और बलात्कार कर रहें हैं | पुरुषों की सामूहिक हत्याएँ की जा रहीं हैं और घरों को आग लगाये जा रहें हैं | मानव बम आदि के प्रयोग करने पड़ रहें हैं और व्यावसायिक स्थलों और रेलवे स्टेशनों में बमों का प्रयोग करना पड़ रहा है धर्म की रक्षा के लिए |

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इसलिए आज पूरे विश्व में किसी भी बैंक से अधिक आवश्यक है धर्म-बैंक की | ताकि जिसकों भी अपना धर्म असुरक्षित लगे या उसके पास आवश्यकता से अधिक धर्म इकठ्ठा हो गया हो और घर में रखना सुरक्षित न हो, वह धर्म-बैंक में उसे जमा करवा सकता है | इस प्रकार धर्म की सुरक्षा के नाम पर जो मानवजाति पर संकट आया हुआ है, वह टल सकता है | तब किसी को धर्म की सुरक्षा के लिए किसी स्त्री का बलात्कार या अपहरण करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और न ही कोई निर्दोष मारा जाएगा धर्म की सुरक्षा के नाम पर | न धर्म की सुरक्षा के लिए दंगे ही होंगे और न ही धर्म की सुरक्षा के लिए आतंकवादी और गुंडे पालने पड़ेंगे | हथियारों, विस्फोटकों और आतंकवादियों में हो रहे व्यय राष्ट्र के निर्माण व नागरिकों के सुख-सुविधा के लिए व्यय होंगे | -विशुद्ध चैतन्य

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