जब तक आप स्वयं से परिचित नहीं होते, तब तक आप भटकते रहते हैं स्वयं की खोज में….

Since age seven, fifth-grader Shyanne Roberts has had one passion – firing guns.

Now aged 10 she has become a sensation in competitive shooting tournaments across the United States, using a weapon painted in her favorite colors, purple and black. And despite the perceived dangers, the Franklinville, New Jersey, girl believes: ‘Kids and guns don’t always mean bad things happen.’

बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं, जिनके माँ-बाप समझदार होते हैं | या फिर वे सौभाग्यशाली लोग होते हैं, जो अपने लक्ष्य के प्रति सचेत रहते हैं और अपने माँ-बाप को चुनने का अवसर ईश्वर उन्हें देता है | कुछ लोगों को माँ-बाप सहयोगी न भी मिले तो परिवार या वातावरण ऐसा मिल जाता है, जिससे उन्हें अपने पूर्वजन्म के अधूरे सपने को पूरा करने में सहयोग मिलता है | ऐसे लोग बचपन से ही अपने लक्ष्य के प्रति सजग रहते हैं और किसी प्रकार की दुविधा में नहीं रहते | फिर चाहे वह सचिन तेंदुलकर हो, या सुनिधि चौहान या मोज़ार्ट, या जीसस या गौतम बुद्ध या विवेकानंद या ओशो….. |

जब हम मृत्यु के समय होशपूर्ण रहते हैं तब अगले जन्म के उद्देश्य के प्रति भी सजग रहते हैं | कई बार आपने देखा होगा कि बच्चे किसी विशेष विषय या उपकरणों में अधिक रूचि रखता है | अधिकाँश माँ-बाप उस पर ध्यान नहीं देते क्योंकि उन्हें तो स्वयं का भी कोई भान नहीं होता कि वे दुनिया में क्यों आयें हैं | बच्चों के रूचि के प्रति जो माँ-बाप जागरूक रहते हैं और सजगता से उनकी गतिविधियों पर ध्यान देते हैं, वे आसानी से समझ सकते हैं कि उनके बच्चे दुनिया में क्यों आयें हैं और उनके जीवन का उद्देश्य क्या है |

बचपन में एक फिल्म देखी थी ‘कच्चे धागे’, उसमें डाकुओं के सरदार के घर बच्चा जन्म लेता है | बच्चा जब घुटनों के बल चलाना शुरू कर देता है, तब उसके पास भिन्न भिन्न खिलौने रख देते हैं | बच्चा धीरे धीरे उन खिलौनों के तरफ बढ़ता है और बन्दुकनुमा खिलौना उठा लेता है | इसी प्रकार मेरी माँ भी करती थीं और हम चार भाई बहनों में जिसकी जो रूचि थी उसे ही प्रोत्साहित करती थीं | कभी दूसरे से हमारी तुलना नहीं करतीं थीं | मुझे तो दो तीन वर्ष ही मिले अपने माँ से परिचय का क्योंकि जब मैं मात्र नौ वर्ष का था, तब उनका देहांत हो गया था |शायद यही कारण है कि थोड़ी देर से ही सही, भटकते हुए है सही, मुझे अपने आपको पहचानने में पूरा जीवन नहीं बीता |

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माँ-बाप अक्सर दूसरे बच्चों से अपने बच्चों की तुलना करते हैं और उनकी ही तरह बनाना चाहते हैं, बहुत ही कम माँ-बाप ऐसे होते हैं जो बच्चे को वही बनता हुआ देखना चाहते हैं जो वह बनने के लिए आया है | यूफोरिया के मुख्य गायक पलाश सेन से एक दिन मेरी बात हो रही थी तब उन्होंने बताया कि उनके माता पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बनें इसलिए डॉक्टर की पढ़ाई की लेकिन मुझे गाने का शौक था बचपन से और मैं सिंगर बनना चाहता था | मैंने माता-पिता की इच्छा पूरी की और अब अपनी इच्छा पूरी कर रहा हूँ और जब भी कहीं गाने का अवसर मिलता है मैं नहीं चूकता | यह बात तब की है जब वे कोई जाना माना नाम नहीं थे | सुनिधि चौहान से मेरी भेंट तब हुई थी, जब वह मात्र दस-ग्यारह वर्ष की थीं |

हम कहते हैं कि समाज ही आज बिगड़ गया है, लड़के आवारागर्दी करते फिरते हैं, या दंगा या बलात्कार के आरोपों में जेल में पड़े हुए हैं | कुछ लोग पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और बेरोजगारों की कतार में खड़ें हैं | क्योंकि माँ-बाप और रिश्तेदारों ने उनको उनके उस लक्ष्य से भटका दिया, जिनके लिए वे आये थे | पाँच से सात वर्ष की आयु तक ही किसी को अपने पूर्व जन्म की हल्की याद रह पाती है, लेकिन उसके बाद वह भी भूल जाता है | कई बार नौकरी मिल भी जाती है तो भी मन बेचैन रहता है कि कहीं कुछ कमी रह गयी है और उस कमी को पूरी करने के लिए वह दिन रात एक कर देता है | न ठीक से सो पाता है और न ही अपने बच्चों और परिवार के साथ समय बिता पाता है | शराब और पार्टियों में ही अधिकाँश समय बिताने का प्रयास करता है | परिणाम यह होता है कि उनके बच्चे भी भटक जाते हैं और इसी प्रकार समाज विकृत होता चला जाता है |

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जो स्वयं से परिचित हो जाते हैं समय पर, वे तो सहयोगी हो जाते हैं परिवार व समाज के | लेकिन जो नहीं हो पाते, वे दुमछल्ले बन जाते हैं या ईश्वर की खोज में जंगल और आश्रमों में निकल जाते हैं | जो अपनी उलझन किसी को समझा नहीं पाते या कोई ऐसा नहीं मिलता जो उसे समझ सके तो वह नशे का आदि बन जाता है या समाज से इतनी घृणा करने लगता है कि असामाजिक तत्वों के रूप में जाना जाना ही पसंद करता है |

यदि आप भी ऐसा मानते हैं कि आप भी भटक गए हैं परिस्थिति वश तो अपने बचपन में वापस लौटिये और स्वयं को खोजिये | हो सकता है कि जो मुखौटा लगाकर आप अभी जी रहें हैं, और जिसे अब अपना ही रूप मान रहें हैं वह निकाल फेंकने में आपको सफलता मिल जाये | आप भी अपने आदर्श व्यक्तित्व से हाथ मिला पाने में सफल हो सकें, लेकिन एक दुमछल्ले की तरह नहीं, बल्कि अपने स्वयं के आस्तित्व व व्यक्तित्व के साथ | जैसे सुभाष चन्द्र बोस ने हाथ मिलाया था हिटलर से |

“जब तक आप स्वयं से परिचित नहीं हो जाते, तब तक आप भटकते हैं स्वयं की खोज में और कहते हैं कि ईश्वर की ख़ोज में भटक रहें हैं |”विशुद्ध चैतन्य

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