कर्मयोग: कर्म का चरित्र पर प्रभाव

कर्म शब्द ‘कृ’ धातु से निकला है; ‘कृ’ धातु का अर्थ है करना | जो कुछ किया जाता है, वही कर्म है | इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ ‘कर्मफल’ भी होता है | दार्शनिक दृष्टि से यदि देखा जाए, तो इसका अर्थ कभी-कभी वे फल होते हैं, जिनका कारन हमारे पूर्व कर्म रहते हैं | परन्तु कर्मयोग में ‘कर्म शब्द से हमारा मतलब केवल ‘कार्य ही है | मानवजाति का चरम लक्ष्य ज्ञानलाभ है | प्राच्य दर्शनशास्त्र हमारे सम्मुख एकमात्र यही लक्ष्य रखता है | मनुष्य का अंतिम ध्येय सुख नहीं वरन ज्ञान है; क्योंकि सुख और आनंद का तो एक न एक दिन अंत हो ही जाता है | अतः यह मान लेना कि सुख ही चरम लक्ष्य है, मनुष्य की भारी भूल है | संसार में सब दुखों का मूल यही है कि मनुष्य अज्ञानवश यह समझ बैठता है कि सुख ही उसका चरम लक्ष्य है | पर कुछ समय के बाद मनुष्य को यह बोध होता है कि जिसकी ओर वह जा रहा है, वह सुख नहीं वरन ज्ञान है, तथा सुख और दुःख दोनों ही महान शिक्षक हैं, और जितनी शिक्षा उसे सुख से मिलती है, उतनी ही दुःख से भी | सुख और दुःख ज्यों-ज्यों आत्मा पर से होकर जाते हैं, त्यों-त्यों वे उसके ऊपर अनेक प्रकार के चित्र अंकित करते जाते हैं | और इन चित्रों अथवा संस्कारों के समष्टि के फल को ही हम मानव का चरित्र कहते हैं |

यदि तुम किसी मानव का चरित्र देखो, तो प्रतीत होगा कि वास्तव में वह उसकी मानसिक प्रवृतियों एवं मानसिक झुकाव कि समष्टि ही है | तुम यह भी देखोगे कि उसके चरित्रगठन में सुख और दुःख दोनों ही समान रूप से उपादानस्वरुप हैं | यदि हम संसार के महापुरुषों के चरित्र का अध्ययन करें, तो मैं कह सकता हूँ कि अधिकाँश दशाओं में हम यही देखेंगे कि सुख की अपेक्षा दुःख ने तथा संपत्ति की अपेक्षा दारिद्र्य ने ही उन्हें अधिक शिक्षा दी है, एवं प्रशंसा की अपेक्षा निन्दारुपी आघात ने ही उसकी अन्तःस्थ ज्ञानाग्नि को अधिक प्रस्फुरित किया है |

अब यह ज्ञान मनुष्य में अन्तर्निहित है | कोई ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब अन्दर ही है | हम जो कहते हैं की मनुष्य ‘जानता’ है, उसे ठीक ठीक मनोवैज्ञानिक भाषा में व्यक्त करने पर हमें कहना चाहिए की वह ‘आविष्कार करता’ है | आविष्कार का अर्थ है, मनुष्य का अपनी अनन्त ज्ञानस्वरुप आत्मा के ऊपर से आवरण को हटा लेना | हम कहते हैं की न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का अविष्कार किया | तो क्या वह आविष्कार कहीं एक कोने में बैठा हुआ न्यूटन की प्रतीक्षा कर रहा था ? नहीं, वह उसके मन में था | जब समय आया तो उसने उसे ढूँढ निकाला | संसार ने जो कुछ ज्ञान प्राप्त किया है, वह मन से ही निकला है | विश्व का असीम पुस्तकालय तुम्हारे मन में ही विधमान है | बाह्य जगत तो तुम्हें अपने मन को अध्ययन में लगाने के लिए उद्धीपक तथा सहायक मात्र है; परन्तु प्रत्येक समय तुम्हारे अध्ययन का विषय तुम्हारा मन ही है | सेव का गिरना न्यूटन के लिए उद्धिपक कारण स्वरुप हुआ और उसने अपने मन का अध्ययन किया | उसने अपने मन में पूर्व से स्थित भाव-श्रृंखला की कड़ियों को एक बार फिर से व्यवस्थित किया तथा उनमें एक नयी कड़ी का आविष्कार किया | उसे को हम गुरुत्वाकर्षण का नियम कहते हैं | यह न तो सेव में था और न पृथ्वी के केंद्र में स्थित अन्य किसी वस्तु में ही | अतएव समस्त ज्ञान, चाहे वह व्यवहारिक हो अथवा पारमार्थिक, मनुष्य के मन में ही निहित है | बहुधा या प्रकाशित न होकर ढका रहता है | और जब आवरण धीरे धीरे हटता जाता है, तो हम कहते हैं कि ‘हमें ज्ञान हो रहा है’ | ज्यों-ज्यों इस आविष्करण की क्रिया बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों हमारे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है | जिस मनुष्य पर से यह आवरण उठता जा रहा है, वह अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ज्ञानी है और जिस मनुष्य पर यह आवरण तह पर तह पड़ा है, वह अज्ञानी है | जिस मनुष्य पर से यह आवरण विल्कुल चला जाता है, वह सर्वग्य पुरुष कहलाता है |

अतीत में कितने ही सर्वग्य पुरुष हो चुके हैं और मेरा विश्वास है कि अब भी बहुत से होंगे, तथा आगामी युगों में भी ऐसे असंख्य पुरुष जन्म लेंगे | जिस प्रकार एक चकमक पत्थर के टुकड़े में अग्नि निहित रहती है, उसी प्रकार मनुष्य के मन में ज्ञान रहता है | उद्धिपक कारण घर्षण स्वरुप ही उस ज्ञानाग्नि को प्रकाशित कर देता है | ठीक ऐसा ही हमारे समस्त भावों और कार्यों के सम्बन्ध में भी है | यदि हम शांत होकर स्वयं का अध्ययन करें, तो प्रतीत होगा कि हमारा हँसना-रोना, सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, हमारी शुभकामनाएँ एवं शाप, स्तुति और निंदा ये सब हमारे मन के ऊपर बहिर्जगत के अनेक घात-प्रतिघात के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं, और हमारा वर्तमान चरित्र इसी का फल है | ये सब घात-प्रतिघात मिलकर कर्म कहलाते हैं | आत्मा की आभ्यांतरिक अग्नि तथा उसकी अपनी शक्ति एवं ज्ञान को बाहर प्रकट करने के लिए जो मानसिक अथवा भौतिक घात उस पर पहुँचाये जाते हैं, वे ही कर्म हैं | यहाँ कर्म शब्द का उपयोग व्यापक रूप में किया गया है | इस प्रकार, हम सब प्रतिक्षण ही कर्म करते रहते हैं | मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूँ – यह कर्म है, तुम सुन रहे हो – यह भी कर्म है; हमारा साँस लेना, चलना आदि भी कर्म है; जो कुछ हम करते हैं, वह शारीरिक हो अथवा मानसिक, सब कर्म ही हैं; और हमारे ऊपर वह अपना चिन्ह अंकित कर जाता है |

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कई कार्य ऐसे भी होते हैं, जो मानो अनेक छोटे-छोटे कर्मों की समष्टि है | उदाहरणार्थ, यदि हम समुद्र के किनारे खड़े हों और लहरों को किनारे से टकराते हुए सुनें, तो ऐसा मालूम होता है कि एक बड़ी भारी आवाज हो रही है | परन्तु हम जानते हैं कि एक बड़ी लहर असंख्य छोटी-छोटी लहरों से बनी है | और यद्यपि प्रत्येक छोटी लहर अपना शब्द करती है, परन्तु फिर भी वह हमें सुनाई नहीं पड़ता | पर ज्यों ही ये सब शब्द आपस में मिलकर एक हो जाते हैं, ज्यों ही हमें बड़ी आवाज सुनाई देती है | इसी प्रकार हृदय की प्रत्येक धड़कन से कार्य हो रहा है | कई कार्य ऐसे होते हैं, जिनका हम अनुभव करते हैं; वे हमारे इन्द्रियग्राह्य हो जाते हैं, पर साथ ही वे अनेक छोटे-छोटे कार्यों की समष्टिस्वरुप हैं |

यदि तुम सचमुच किसी मनुष्य के चरित्र को जाँचना चाहते हो, तो उसके बड़े कार्यों पर से उसकी जाँच मत करो | एक मुर्ख भी किसी विशेष अवसर पर बहादुर बन जाता है | मनुष्य के अत्यंत साधारण कार्यों की जाँच करो, और असल में वे ही ऐसी बातें हैं, जिनसे तुम्हें एक महान पुरुष के वास्तविक चरित्र का पता लग सकता है | आकस्मिक अवसर तो छोटे से छोटे मनुष्य को भी किसी न किसी प्रकार का बड़प्पन दे देते हैं | परन्तु वास्तव में बड़ा तो वही है, जिसका चरित्र सदैव अरु सब अवस्थाओं में महान रहता है |

मनुष्य का जिन सब शक्तियों के साथ सम्बन्ध आता है, उनमें से कर्मों की वह शक्ति सब से प्रबल है, जो मनुष्य के चरित्रगठन पर प्रभाव डालती है | मनुष्य तो मानो एक प्रकार का केंद्र है, और वह संसार की समस्त शक्तियों को आपस में मिलाकर उन्हें एक बड़ी तरंग के रूप में बाहर भेज रहा है | यह केंद्र ही ‘प्रकृत मानव’ (आत्मा) है; यह सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ है और समस्त विश्व को अपनी और खींच रहा है | भला-बुरा, सुख-दुःख सब उसकी ओर दौड़े जा रहें हैं, और जाकर उसके चारों ओर मानो लिपटे जा रहें हैं | और वह उन सब में से चरित्र-रूपी माहाशक्ति का गठन करके उसे बाहर भेज रहा है | जिस प्रकार किसी चीज को अपनी खींच लेने की उसमें शक्ति है, उसी प्रकार उसे बाहर भेजने की भी है |

संसार में हम जो सब कार्य-कलाप देखते हैं, मानव-समाज में जो सब गति हो रही है, हमारे चारों ओर जो कुछ हो रहा है, वह सारा का सारा केवल मन का ही खेल है, मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रकाश मात्र है | अनेक प्रकार के यंत्र, नगर, जहाज, युद्धपोत आदि सभी मनुष्य की इच्छाशक्ति के विकास मात्र हैं | मनुष्य की यह इच्छा शक्ति चरित्र से उत्पन्न होती है और वह चरित्र कर्मों से गठित होता है | अतएव, कर्म जैसा होगा, इच्छाशक्ति का विकास भी वैसा ही होगा | संसार में प्रबल इच्छा शक्ति संपन्न जितने महापुरुष हुए हैं, वे सभी धुरंधर कर्मी थे | उनकी इच्छाशक्ति ऐसी जबरदस्त थी कि वे संसार को भी उलट-पुलट सकते थे | और यह शक्ति उन्हें युग-युगांतर तक निरंतर कर्म करते रहें से प्राप्त हुई थी | बुद्ध एवं ईसा मसीह में जैसे प्रबल इच्छाशक्ति थी, वह एक जन्म में प्राप्त नहीं की जा सकती | और उसे हम अनुवांशिक शक्तिसंचार भी नहीं कह सकते, क्योंकि हमें ज्ञात है की उनके पिता कौन थे | हम नहीं कह सकते की उनके पिता के मुँह से मनुष्य-जाति की भलाई के लिए शायद कभी एक शब्द भी निकला हो | जोसेफ (ईसा मसीह के पिता) के समान तो असंख्य बढ़ई हो गये और आज भी हैं; बुद्ध के पिता के सदृश लाखों छोटे-छोटे राजा हो चुके हैं | अतः यदि वह बात केवल आनुवांशिक शक्तिसंचार के ही कारण हुई हो, तो इसका स्पष्टिकरण कहाँ हैं ? इसी प्रकार, जोसेफ नामक बढ़ई तथा संसार में लाखों लोगों द्वारा ईश्वर के समान पूजे जानेवाले उसके पुत्र ईसा मसीह के बीच जो अंतर है, उसका स्पष्टीकरण कहाँ ? आनुवान्शिक शक्तिसंचार के सिद्धांत द्वारा तो इसका स्पष्टीकरण नहीं हो सकता | बुद्धि और ईसा इस विश्व में जिस महाशक्ति का संचार कर गए, वह आयी कहाँ से ? उस महान शक्ति का उद्भव कहाँ से हुआ ? अवश्य, युग-युगान्तरों से वह उस स्थान में ही रही होगी, और क्रमशः प्रबलतर होते-होते अंत में बुद्ध तथा ईसा मसीह के रूप में समाज में प्रकट हो गयी, और आज तक चली आ रही है |

यह सब कर्म द्वारा ही नियमित होता है | यह सनातन नियम है कि जब तक कोई मनुष्य किसी वस्तु का उपार्जन न करे, तब तक वह उसे प्राप्त नहीं हो सकती | संभव है, कभी कभी हम इस बात को न मानें, परन्तु आगे चलकर हमें इसका दृढ विश्वास हो जाता है | एक मनुष्य चाहे समस्त जीवन भर धनी होने के लिए एड़ी चोटी का पसीना एक करता रहे, हजारों मनुष्यों को धोखा दे, परन्तु अंत में वह देखता है कि वह शक्तिशाली होने का अधिकारी नहीं था | तब जीवन उसके लिए दुखमय और दूभर हो उठता है | हम अपने भौतिक सुखों के लिए भिन्न-भिन्न चीजों को भले ही इकठ्ठा करते जाएँ, परन्तु वास्तव में जिसका उपार्जन हम अपने कर्मों द्वारा करते हैं, वही हमारा होता है | एक मुर्ख संसार भर की सारी पुस्तकें मोल लेकर भले ही अपने पुस्तकालय में रख ले, परन्तु वह केवल उन्हीं को पढ़ सकेगा, जिनको पढ़ने का वह अधिकारी होगा | और यह अधिकार कर्म द्वारा ही प्राप्त होता है | हम किसके अधिकारी हैं, हम अपने भीतर क्या-क्या ग्रहण कर सकते हैं, इस सब का निर्णय कर्म द्वारा ही होता है | अपनी वर्तमान अवस्था के हम जिम्मेदार हैं, और जो कुछ हम होना चाहें, उसकी शक्ति भी हमीं में है | यदि हमारी वर्तमान अवस्था हमारे ही पूर्व कर्मों का फल है, तो यह निश्चित है कि जो कुछ हम भविष्य में होना चाहते हैं, वह हमारे वर्तमान कार्यों द्वारा ही निर्धारित किया जा सकता है | अतएव हमें यह जान लेना चाहिए आवश्यक है कि शक्तियों का निरर्थक क्षय भी कोई चीज होती है | संभव हैं तुम कहो, “कर्म करने की शैली जानने से क्या लाभ ? संसार में प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी प्रकार से तो काम करता ही रहता है |” परन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शक्तियों का निरर्थक क्षय भी कोई चीज होती है | गीता का कथन है, “कर्मयोग का अर्थ है – कुशलता से अर्थात वैज्ञानिक प्रणाली से कर्म करना |” कर्मानुष्ठान की विधि ठीक-ठाक जानने से मनुष्य को श्रेष्ठ फल प्राप्त हो सकता है | यह स्मरण रखना चाहिए कि समस्त कर्मों का उद्देश्य है, मन के भीतर पहले से ही स्थित शक्ति को प्रकट कर देना, आत्मा को जागृत कर देना | प्रत्येक मनुष्य के भीतर पूर्ण शक्ति और पूर्ण ज्ञान विद्यमान है | भिन्न-भिन्न कर्म इन महान शक्तियों को जागृत करने तथा बाहर प्रकट कर देने में साधन मात्र है |

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मनुष्य नाना प्रकार के हेतु लेकर कार्य किसी करता है, क्योंकि बिना हेतु के कार्य हो ही नहीं सकता | कुछ लोग यश चाहते हैं और वे यश के लिए कार्य करते हैं | दूसरे पैसा चाहते हैं, और वे पैसे के लिए कार्य करते हैं | फिर कोई अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं, और वे अधिकार के लिए कार्य करते हैं | कुछ स्वर्ग पाना चाहते हैं, और वे उसी के लिए कार्य करते हैं | कुछ लोग अपने बाद अपना नाम छोड़ जाने के इच्छुक होते हैं |

चीन देश में प्रथा है कि मनुष्य की मृत्यु के बाद ही उसे उपाधि दी जाती है | किसी ने यदि बहुत अच्छा कार्य किया, तो उसके मृत पिता अथवा पितामह को कोई सम्माननीय उपाधि दे दी जाती है | कुछ लोग उसी के लिए यत्न करते हैं | विचार करके देखने पर यह प्रथा हमारे यहाँ की अपेक्षा अच्छी ही कही जा सकती है | इस्लाम धर्म के कुछ सम्प्रदायों के अनुयायी इस बात के लिए आजन्म काम करते रहते हैं कि मृत्यु के बाद उनकी एक बड़ी कब्र बने | मैं कुछ ऐसे सम्प्रदायों को जानता हूँ, जिनमें बच्चे के पैदा होते ही उसके लिए एक कब्र बना दी जाती है और यही उन लोगों के अनुसार मनुष्य का सबसे जरुरी काम होता है | जिसकी कब्र जितनी बड़ी और सुन्दर होती है, वह उतना ही अधिक सुखी समझा जाता है | कुछ लोग प्रायश्चित के रूप में कर्म किया करते हैं, अर्थात अपने जीवन भर अनेक प्रकार के दुष्ट कर्म कर चुकने के बाद एक सुन्दर मंदिर बनवा देते हैं, अथवा पुरोहितों को कुछ धन दे देते हैं, जिससे कि वे उनके लिए मानो स्वर्ग का तिक्त खरीद देंगे | वे सोचते हैं कि बस इससे रास्ता साफ़ हो गया, अब हम निर्विध्न चले जायेंगे | इस प्रकार, मनुष्य को कार्य में लगाने वाले बहुत से उद्देश्य रहते हैं, ये उनमें से कुछ हुए |

अब कार्य के लिए कार्य – इस सम्बन्ध में हम कुछ आलोचना करें | प्रत्येक देश में कुछ ऐसे नर-रत्न होते हैं, जो केवल कर्म के लिए ही कर्म करते हैं | वे नाम यश अथवा स्वर्ग की भी परवाह नहीं करते | वे केवल इसलिए कर्म करते हैं कि दूसरों की भलाई होती है | कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उच्चतर उद्देश्य लेकर गरीबों के प्रति भलाई तथा मनुष्य-जाति की सहायता करने के लिए अग्रसर होते हैं, क्योंकि भलाई में उनका विश्वास है और उसके प्रति अग्रसर होते हैं, क्योंकि भलाई में उनका विश्वास है और उसके प्रति प्रेम है | देखा जाता है कि नाम तथा यश के लिए किया गे कार्य बहुधा शीघ्र फलित नहीं होता | ये चीजें तो हमें उस समय प्राप्त होती हैं, जब हम वृद्ध हॉट जाते हैं और जिंदगी की आखरी घड़ियाँ गिनते रहते हैं | यदि कोई मनुष्य निःस्वार्थता से कार्य करे, तो क्या उसे कोई फलप्राप्ति नहीं होती ? असल में तभी तो उसे सर्वोच्च फल की प्राप्ति होती है और सच पूछा जाए, तो निःस्वार्थता अधिक फलदायी होती है | पर लोगों में इसका अभ्यास करने का धीरज नहीं रहता | व्यवहारिक दृष्टि से भी यह अधिक लाभदायक है | प्रेम, सत्य तथा निःस्वार्थता नीति-सम्बन्धी अलंकारिक वर्णन मात्र नहीं है, वे तो हमारे सर्वोच्च आदर्श हैं | क्योंकि वे शक्ति की महान अभिव्यक्ति है | पहली बात तो यह है कि यदि कोई मनुष्य पाँच दिन, उतना क्यों, पाँच मिनट भी बिना भविष्य का चिंतन किये, बिना स्वर्ग-नर्क, या अन्य किसी के सम्बन्ध में सोचे, निःस्वार्थता से काम कर सके तो वह एक महापुरुष बन सकता है | यद्यपि इसे कार्यरूप में परिणत करना कठिन है, फिर भी अपने हृदय के अनस्त्स्तल से हम इसका महत्व समझते हैं, और जानते हैं कि इससे क्या भलाई होती है | यह शक्ति महत्तम अभिव्यक्ति है – इसके लिए प्रबल संयम की आवश्यकता है | अन्य सब बहिर्मुखी कर्मों की अपेक्षा इस आत्मसंयम में शक्ति का अधिक प्रकाश होता है | एक चार घोड़ोंवाली गाड़ी उतार उतार पर बड़ी आसानी से धड़धड़ाती हुई आ सकती है, अथवा सईस घोड़ों को रोक सकता है | इस दोनों में अधिक शक्ति का विकास किसमें हो सकता है ? घोड़ों को छोड़ देने में अथवा उन्हें रोक देने में ? एक तोप का गोला हवा में काफी दूर तक चला जाता है और फिर गिर पड़ता है | परन्तु दूसरा देवार से टकराकर रुक जाने से उतनी दूर नहीं जा सकता, पर उस टकराने से बड़ी आग सी निकलती है | इसी प्रकार, मन की सारी बहिर्मुखी गति किसी स्वार्थपूर्ण उद्देश्य की ओर दौड़ती रहने से छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाती है, वह फिर तुम्हारे पास लौटकर तुम्हारे शक्तिविकास में सहायक नहीं होती | परन्तु यदि उसका संयम किया जाय, तो उससे शक्ति की वृद्धि होती है | इस आत्मसंयम से एक महान इच्छाशक्ति का प्रादुर्भाव होता है; वह एक ऐसे चरित्र का निर्माण करता है, जो जगत को अपने इशारे पर चला सकता है | अज्ञानियों को इस रहस्य का पता नहीं रहता, परन्तु फिर भी वे मनुष्य-जाति पर शासन करने के इच्छुक रहते हैं | एक अज्ञानी पुरुष हबी यदि धीरज रखे, तो समस्त संसार पर शासन कर सकता है | यदि वह कुछ वर्ष तक धीरज रखे, तथा अपने इस अज्ञानसुलभ जगत-शासन के भाव को संयत कर ले, तो इस भाव के समूल नष्ट होते ही वह संसार पर शासन कर सकेगा | परन्तु जिस प्रकार कुछ पशु अपने से दो चार कदम आगे कुछ नहीं देख सकते इस प्रकार हममें से अधिकाशं लोग भविष्य के बारे में नितांत अदूरदर्शी होते हैं | हमारा संसार मानो एक क्षुद्र वर्तुल-सा होता है, हा बस उसे में आबद्ध रहते हैं | हममें दूरदर्शिता के लिए धैर्य नहीं रहता और इसलिए हम दुष्ट और नीच हो जाते हैं | यह हमारी कमजोरी है – शक्तिहीनता है |

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अत्यंत सामान्य कर्मों को भी घृणा की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए | जो मनुष्य कोई श्रेष्ठ आदर्श नहीं जानता, उसे स्वार्थ से ही, नाम-यश के ही – काम करने दो | परन्तु यह आवश्यक है कि प्रत्येक मनुष्य को उच्चतर ध्येयों की ओर बढ़ने तथा उन्हें समझने का प्रबल यत्न करते रहना चाहिए | “हमें कर्म करने का ही अधिकार है, कर्म फल में हमारा कोई अधिकार नहीं है है |” कर्मफलों को एक ओर रहने दो, उनकी चिंता हमें क्यों हो ? यदि तुम किसी मनुष्य की सहायता करना चाहते हो, तो इस बात की चिंता न करो कि उस आदमी का व्यवहार तुम्हारे प्रति कैसा रहता है | यदि तुम एक श्रेष्ठ एवं भला कार्य करना चाहते हो, तो यह सोचने का कष्ट मत करो कि उसका फल क्या होगा |

अब कर्म के इस आदर्श के सम्बन्ध में एक कठिन प्रश्न उठता है | कर्म योगी के लिए सतत कर्मशीलता आवश्यक है; हमें सदैव कर्म करते रहना चाहिए | बिना कार्य के हम एक क्षण भी नहीं रह सकते | तो फिर प्रश्न यह है कि आराम के बारे में क्या होगा ? यहाँ इस जीवन-संग्राम के एक ओर कर्म, जिसके तीव्र भँवर में फँसे हम लोग चक्कर काट रहें हैं और दूसरी ओर है शान्ति – सभी मानो निवृत्तिमुखी हैं, चारों ओर सब शान्त, स्थिर – किसी प्रकार का कोलाहल नहीं, केवल प्रकृति अपने जीवों, पुष्पों और गिरी-गुफाओं के साथ विराज रही है | आर इन दोनों में से कोई भी पूर्ण आदर्श का चित्र नहीं है | यदि एक ऐसा मनुष्य, जिसे एकांतवास का अभ्यास है, संसार के चक्कर में घसीट लाया जाय, तो इसका उसी प्रकार ध्वंस हो जाएगा, जिस प्रकार समुद्र की गहराई में रहनेवाली एक विशेष प्रकार की मछली पानी की सतह पर लाये जाते ही टुकड़े-टुकड़े हो कर मर जाती है; क्योंकि सतह पर पानी का वह दबाव नहीं है, जिसके कारण वह जीवित रहती थी | इसी प्रकार, एक ऐसा मनुष्य, जो सांसारिक तथा सामाजिक जीवन के कोलाहल का अभ्यस्त रहा है, यदि किसी शान्त स्थान को ले जाया जाय, तो क्या वह शांतिपूर्वक रह सकता है ? कदापि नहीं | उसे क्लेश होता है, और संभव है उसका मस्तिष्क ही फिर जाये | आदर्श पुरुष तो वे हैं, जो परम शान्त एवं निस्तब्धता के बीच भी तीव्र कर्म का, तथा प्रबल कर्मशीलता के बीच भी मरुस्थल की शांति एवं निस्तब्धता का अनुभव करते हैं | उन्होंने संयम का रहस्य जान लिया है – अपने ऊपर विजय प्राप्त कर चुके हैं | किसी बड़े शहर की भरी हुई सड़कों के बीच से जाने पर भी उनका मन उसी प्रकार शान्त रहता है, मानो वे किसी निःशब्द गुफा में हो, और फिर भी उनका मनसारे समय कर्म में तीव्र रूप से लगा रहता है | यही कर्मयोग का आदर्श है, और यदि तुमने यह प्राप्त कर लिया है, तो तुम्हें वास्तव में कर्म का रहस्य ज्ञात हो गया |

परन्तु हमें शुरू से आरंभ करना पड़ेगा | जो कार्य हमारे सामने आते जाएँ, उन्हें हम हाथ में लेते जाएँ और शनैः शनैः हम अपने को दिन-प्रतिदिन निःस्वार्थ बनाने का प्रयत्न करें | हमें कर्म करते रहना चाहिए तथा यह पता लगाना चाहिए कि उसका कार्य के पीछे हमारा हेतु क्या है | ऐसा होने पर हम देख पायेंगे कि आरम्भावस्था में प्रायः हमारे सभी कार्यो का हेतु स्वार्थपूर्ण रहता है | किन्तु धीरे-धीरे यह स्वार्थपरायणता अध्यवसाय से नष्ट हो जाएगी, और अंत में वह समय आ जाएगा, जब अहम वास्तव में स्वार्थ से रहित होकर कार्य करने के योग्य हो सकेंगे | हम सभी यह आशा कर सकते हैं कि जीवन-पथ में अग्रसर होते-होते किसी न किसी दिन वह समय अवश्य ही आएगा, जब हम पूर्ण रूप से निःस्वार्थ बन जायेंगे; और ज्योंही हम उस अवस्था को प्राप्त कर लेंगे, हमारी समस्त शक्तियाँ केन्द्रीभूत हो जाएँगी तथा हमारा आभ्यंतरिक ज्ञान प्रकट हो जाएगा |

रामकृष्ण मठ द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘कर्मयोग’ से साभार |

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