न जाने कितनों ने तो माँ को बचपन से नहीं देखा है….

आश्रम के बाहर एक नवयुवक अपनी माँ को बहुत ही बुरी तरह डांट रहा था | मैंने पता किया तो बताया गया कि वह अपनी माँ का इलाज करवाने के लिए आया हुआ था और आश्रम में दर्शन के लिए आया हुआ था | उसकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं था लेकिन वह भी आश्रम के कामों में हाथ बँटाना चाहती थीं जिससे उसके बेटे को गुस्सा आ गया | यह भी पता चला कि वह अपनी माँ को पीटता भी था….. स्वामी जी ने उसकी माँ को वहाँ से बुला लिया भोजन पर, लेकिन उसने खाने से मना कर दिया |

मुझे देखते ही वह बोल पड़ा कि माँ को जब काम करना पसंद नहीं है, तो क्यों करती हैं काम ? फिर कहती है, हाथ में दर्द हो रहा है और यह हो रहा वह हो रहा है….. मैं यहाँ अकेला ठाकुर की सेवा कर लूँगा…..

मैं बोला कि सेवा करना या न करना व्यक्तिगत विषय है, लेकिन क्या आप जो कर रहें हैं वह सही है ? अपनी माँ से कोई ऐसे बात करता है ? आप तो बहुत ही भाग्यशाली हैं, कि आपकी माँ आपके साथ है…. न जाने कितनों ने तो माँ को बचपन से नहीं देखा है….

अचानक उसकी आँखों में आंसू आ गये और चुपचाप मेरे साथ चला आया भोजन पर |

उस नवयुवक को लग रहा था कि यदि ठाकुर की प्रतिमा की सेवा नहीं की गयी तो अधर्म हो रहा है और माँ अधर्म कर रही हैं, इसलिए वह चाहता था कि माँ भी सेवा करे | लेकिन स्वास्थ्य सही न होने कारण वह कर नहीं पा रही थी और उसे लग रहा है कि बाहने बना रही है | लेकिन उसे यह समझना चाहिए कि आपनी माँ के साथ जो व्यवहार किया उसने, उससे उसके सारे पुण्य जो भी उसने कमाए थे, निरस्त हो गये | वह वहीँ का वहीं है और उतना ही खाली है जितना कि वह घर से निकलते समय रहा होगा | ईश्वर ऐसे लोगों को सद्बुद्धि दे |

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प्रतिमा की सेवा करना और जीवित माँ रूपी ईश्वर का निरादर करने वाले लोगों को मैं मुर्ख ही मानता हूँ | एक हट्टा-कट्टा जवान बेटा उतना काम कभी नहीं कर सकता, जितना कि एक बूढी माँ अपने बीमार बेटे के लिए कर सकती है | फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, वह स्वस्थ हो या अस्वस्थ… अपने बच्चों की देख-रेख में कमी नहीं कर सकती क्योंकि वह साक्षात ईश्वर है | माँ को कभी भी यह ताना न मारें कि वह काम न करने के बहाने ढूँढ रही है और न ही कभी माँ कोई काम स्वेच्छा से किसी के लिए कर रही है या सेवाभाव से कर रही है तो उसे रोकने का साहस करें | क्योंकि एक बेटा दस जन्म लेकर भी माँ से अधिक समझदार और मेहनती नहीं हो सकता है | -विशुद्ध चैतन्य

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