किसी सेवा के लिए तय की गयी कीमत सेवाशुल्क कहलाती है, और सात्विक भाव से किये गए सेवा से प्राप्त धन-वस्तु दक्षिणा कहलाती है |

कल एक सज्जन आये मेरे पास ट्रेन में सीट उपलब्ध है या नहीं यह पता करने के लिए | क्योंकि उनको कहीं से पता चला था कि मेरे पास इन्टरनेट है | तो बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि वे अपनी माँ के साथ तीर्थों के भ्रमण पर निकले थे और अरुणाचल मिशन से बचपन से ही जुड़े हुए हैं | सिलचर वाले आश्रम में वे नियमित जाते हैं और इस आश्रम में साल में एक बार आते हैं |

तो अपनी यात्रा गाथा सुनाते हुए बताते हैं कि कैसे तीर्थों में लूटा जाता है | गया में जब वे श्राद्ध करवाने गये तो पण्डे से बहस हो गयी क्योंकि वे ग्यारह रूपये की दक्षिणा दे रहे थे लेकिन पण्डे ने कहा श्राद्ध करवाने आये हो या मजाक करने ? ग्यारह रूपये की कोई दक्षिणा होती है ?

वे बोले कि यदि कोई गरीब होगा और इतने भी नहीं दे पायेगा तो क्या वह श्राद्ध नहीं करवा सकता ? पंडा बोला कि ऐसे लोगो को यहाँ श्राद्ध करवाने की कोई आवश्यकता नहीं होती….कहीं भी नदी नाले में जाकर फ्री में श्राद्ध कर सकता है वह | धीरे धीरे बहस बढ़ गयी और उसने कहा कि आप मंदिर में नहीं घुस सकते | ये बोले कि तुम्हारे बाप की है क्या, देखता हूँ कौन रोकता है मुझे ? इतनी देर में कई और पण्डे आ गये और पुलिस भी पहुँच गयी | फिर सबने मामले को शांत किया और फिर श्राद्ध आदि की क्रिया संपन्न हुई |

घटना तो बहुत सी बतायीं थी उन्होंने लेकिन केवल इस एक घटना का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ ताकि यह बता सकूँ कि व्यापारिक क्षेत्रों में श्राद्ध करवाने से कोई लाभ नहीं होने वाला | दक्षिणा और फीस में अंतर होता है | किसी सेवा के लिए तय की गयी कीमत सेवाशुल्क कहलाती है, और सात्विक भाव से किये गए सेवा से प्राप्त धन या वस्तु दक्षिणा कहलाती है | दक्षिणा कम है या अधिक यह देने वाले पर निर्भर है, लेने वाला मोलभाव नहीं करता | यदि कोई समर्थ है फिर भी कम दक्षिणा देता है तो हानि देने वाले को ही उठानी पड़ेगी सेवा प्रदान करने वाले को कोई हानि नहीं होगी | यदि निर्धन है वह अपनी यथासंभव अपनी योग्यतानुसार दक्षिणा देता है और पंडित निर्विकार भाव से ईश्वर का प्रसाद समझकर ग्रहण करता है, तो पंडित को ही लाभ होता है क्योंकि धन केवल माध्यम है भाव व्यक्त करने का और सहयोगी होने का |

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पिछले कुछ वर्षों में कई लोगों ने मुझसे मेरे बैंक का अकाउंट न० लिया ताकि कुछ सहयोग राशि वे भेज सकें, लेकिन तीन चार लोगों के सिवा किसी ने कुछ नहीं भेजा | इससे मेरी कोई क्षति नहीं होने वाली क्योंकि मेरा कोई कार्य कभी रुका नहीं | सहयोग मुझे प्राप्त होते ही रहते हैं और वह भी ऐसे लोगों से जो मुझसे केवल फेसबुक से ही जुड़े हुए हैं और कभी मुझसे मिले तक नहीं | न ही उन लोगों का आश्रम से कोई सम्बन्ध है और न ही वे मेरे शिष्य हैं | लेकिन चूँकि वे ईश्वर के अधिक निकट हैं, अर्थात पुर्णतः प्राकृतिक समन्वय के साथ रहते हैं, इसलिए वे प्रेरित होते हैं सहयोग के लिए | क्योंकि वे जानते हैं सहयोग वे इसलिए कर पा रहे हैं, क्योंकि ईश्वर ने उन्हें इस योग्य बनाया | और वे जब सहयोग करते हैं तो उन्हें ऐसा नहीं लगता कि वे कोई एहसान कर रहें हैं, बल्कि ऐसे लोग हमेशा किसी न किसी के सहयोग में आने को उत्सुक रहते हैं | उदाहरण के लिए बीएसएनएल इस समय सहयोगी बना हुआ है, जबकि एक महीने की फीस न पहुँचने पर स्वतः सेवा बंद हो जाती है, जबकि तीसरा महीना चल रहा है और सेवा निर्बाध रूप से अभी तक मल रही है | इसे आप संयोग कहें या बीएसएनएल की भूल, लेकिन मैं इसे प्रकृति का सहयोग ही मानता हूँ | जब आपके सहयोग के लिए कोई नहीं होता, तब भी आपको ईश्वर से सहयोग प्राप्त होता रहता है | क्योंकि मैं शायद विश्व में अकेला वह सन्यासी हूँ जो इटरनेट साधना करता है और ईश्वर मेरी साधना में बाधा नहीं देना चाहते (यह साधना ही है कि निरंतर धर्म व आध्यात्म के नाम पर लोगों को शोषित न होने के लिए प्रेरित करते रहना | चाहे मुझे स्वयं इससे कोई लाभ न होता हो, लेकिन दो चार लोग जो नियमित मेरे पोस्ट पढ़ते हैं, वे किसी दिन लाभान्वित अवश्य होंगे जब वे अंतरात्मा की आवाज सुनने का प्रयास करने लगेंगे | चाहे किसी को विश्वास हो न हो, लेकिन उसको तो विश्वास है, जो मेरी साधना में बाधा नहीं आने देता |

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अब मैं यदि सन्यासी न होता और पंडा होता तो उन लोगों से आशा रखता जिन्होंने सहयोग देने के लिए स्वयं कहा और बाद में विचार बदल दिए | मैं जानता हूँ कि ऐसा क्यों हुआ | क्योंकि वे लोग मेरे एक लेख से सहमत होते हैं और मुझे पुन्यतामा समझ लेते हैं, लेकिन फिर दूसरे पोस्ट में उन्हें लगता है कि यह तो आत्मप्रशंसा में लगा हुआ कोई पाखंडी है | एक पोस्ट में उन्हें लगता है कि मैं धर्म का ज्ञाता हूँ और दूसरे पोस्ट में उन्हें लगता है कि धर्मविरोधी हूँ | लेकिन मैं जो हूँ वही हूँ केवल आप का मन स्थिर नहीं है | मैं जानता हूँ कि मैं कौन हूँ, लेकिन आप नहीं जानते कि आप कौन हैं इसलिए असमंजस में रहते हैं |

उपरोक्त दोनों घटनाओं में मैं यही बताने का प्रयास कर रहा हूँ कि वह पंडा जो धन को महत्व देता है अपने कर्म को नहीं, और वे लोग जो फ्री की सेवा लेने के चक्कर में घूमते हैं, दोनों ही धर्म और आध्यात्म से परे हैं और दोनों को ही कोई लाभ नहीं मिलने वाला | दोनों ही पाखंडी हैं | श्राद्ध के नाम पर अपने गाँव से निकले और दुनिया भर में घुमने में धन खुलकर खर्च किया, लेकिन श्राद्ध करवाने वाले पण्डे को ग्यारह रूपये दे रहे हैं दक्षिणा में | दूसरी ओर वे लोग जो सहयोग राशि भेजने में असमर्थ थे, लेकिन भावना वश सहयोग करने की इच्छा रखते हैं | चाहे सहयोग न कर पर पा रहें हो, लेकिन भीतर एक इच्छा तो है | यही आगे चलकर और बलवती होगी फिर चाहे वे मुझे भेजें या न भेजें, अपने पड़ोस में किसी के सहयोगी अवश्य बन जायेंगे | और जिस दिन वे सहयोगी होने का आनंद पाने लगेंगे उस दिन उन्हें मानव होने पर गर्व होने लगेगा | उस दिन वे सही अर्थों में आध्यात्मिक हो जायेंगे | धर्म आपको हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई बनाता है लेकिन आध्यात्म आपको सृष्टि में सहयोगी होने की प्रेरणा देकर ईश्वर का सहयोगी बनाता है | और ईश्वर ने इसीलिए तो मानव बनाया था कि में हर किसी के लिए उपस्थति नहीं रह सकता तो मानव कम से कम आपस में सहयोगी तो जायेंगे | जैसे हम कपडे धोने के लिए वाशिंग मशीन का प्रयोग करते हैं लेकिन कुछ आटोमेटिक वाशिंग मशीन का प्रयोग करते हैं | भाव यही रहता है कि मशीन कुछ काम स्वतः कर लिया करे | इसी प्रकार ईश्वर ने मानव बनाया और आशा की कि मानव स्वयं सहयोगी हो जाएँ | जरा सोचिये यदि हमारे हृदय की धड़कन भी हमें स्वयं ही नियंत्रित रखना होता, खून हमें स्वयं ही पम्प करना होता तो क्या होता ? आज मानव भी स्वचालित रोबोट बनाने लगे हैं, तो ईश्वर के बनाये ये रोबोट आपस में सहयोगी क्यों नहीं हो पाते ?

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हिन्दू-मुस्लिम, पंडा-पुरोहित बनकर दुनिया जी रही है, मानव होने का अनुभव तो कम ही हैं जो कर पाते हैं | तीर्थो में जाकर दुनिया को बताने से कि मैं कितना बड़ा धार्मिक हूँ आप धार्मिक नहीं हो जाते, धार्मिक होते हैं जब आप किसी के सहयोगी हो जाते हैं वह भी निःस्वार्थ भाव से बिना किसी शर्त के | जहाँ आप मंदिरों, में टैक्स के रूप में धन देते हैं, वहीँ आप उस धन को यदि किसी के सहयोग में लगाएं, तो दान का वास्तविक आनंद व सुख मिलेगा | यह आवश्यक नहीं कि आप दान किसी संत या संयासी को ही दें, क्योंकि मेरे जैसे पाखंडी न जाने कितने भरे पड़े हैं इस संसार में | आप अपने ही आसपास अपनी ही आँखों से जाँच परखकर किसी की समस्या सुलझाएं, किसी को आर्थिक या मानसिक सहयोग करें तो आप पायेंगे कि आपकी आत्मा को आपने गौरवान्वित होने का अवसर प्रदान किया | वास्तव में आपने दूसरों की सेवा करके सामने वाले की नहीं अपनी ही सेवा की होती है | और यही पहला कदम होता है, स्वयं से परिचित होने का | यहीं से आप अपनी आत्मा के भावों से परिचित होना शुरू होते हैं, यहीं से शुरू होता सम्वाद स्वयं की वास्तविक भावनाओं से | क्योंकि अभी तक तो आप दूसरों के द्वारा थोपी गयी भावनाओं और आकांक्षाओं को ही अपनी भावना व आकांक्षा मानते आ रहे थे | –विशुद्ध चैतन्य


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