ये जीवन है… इस जीवन का…. यही है…यही है रंगरूप….ये जीवन है…..

किशोर दा का गाया यह गीत मेरे जीवन में हमेशा प्रेरणा का स्त्रोत रहा | यह गीत वास्तव में मेरे जीवन के संघर्ष भरे दिनों में किसी मन्त्र या अध्यात्मिक भजन से अधिक महत्वपूर्ण था क्योंकि इसे सुनने के बाद एक नयी चेतना आ जाती थी |

चूँकि बचपन से मुझे कभी किसी ऐसे व्यक्ति का साथ नहीं मिला जो मुझे समझ पाता हो, या मेरा मार्गदर्शन मेरी अभिरुचित को समझकर कर पाता | न ही कभी कोई ऐसा मिला जीवन में जिसने कहा हो कि चिंता मत करो मैं तुम्हारे साथ हूँ | यदि कभी किसीने कहा भी तो आत्मा ने कहा कि ये झूठ बोल रहा है और कुछ ही दिनों में आत्मा की बात सत्य सिद्ध हो जाती थी |

कहते हैं कि दूसरों पर निर्भरता जब समाप्त हो जाती है, और स्वयं को ईश्वर के हाथों समर्पित कर देते हैं कि अब जो होगा देखा जाएगा मरना मारना तो ऊपर वाले के हाथ है, तो प्रकृति में चारों ओर गुरु व मार्गदर्शक स्वतः आ जाते हैं | वैसे ही यह गीत, इस गीत के लेखक, संगीतकार और गायक मेरे लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गये | रफ़ी साहब का गीत, “राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है, दुःख तो अपना साथी है….” मुकेश साहब का, “चल अकेला….”, मन्नाडे साहब का, कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या…”, लता जी का, “छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, ये मुनासिव नहीं आदमी के लिए…..”

मेरे जीवन के उन पलों में जब मैं स्वयं को मिटा देना चाहता था, कोई भीतर गुनगुनाने लगता था | एक बार ऐसी भी परिस्थिति आई कि मैं ट्रेन के पटरी पर खड़ा ट्रेन का इन्तजार कर रहा था और दुनिया को अलविदा कह देने के अंतिम क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था | ट्रेन सामने से आती दिखी तभी मुकेश साहब का यह गीत, “कभी अलविदा न कहना..” कोई भीतर इतनी जोर से गाने लगा कि सामने से ट्रेन गुजर गयी और मैं ट्रेन को जाते हुए देखता रह गया | कई बार ऐसा भी हुआ कि कई दिन तक खाना न मिलने के कारण यही लगता था कि शायद कल का सूरज न देख पाऊं | एक दिन मैंने सुबह देखा की पुलिस आई हुई है और लोगों की भीड़ जमा है एक जगह | पास जाकर देखा तो पता चला कि कोई भूख से मर गया | और मैं सोचता था कि मौत और लड़की दोनों को मुझसे न जाने क्यों नफरत है कि मुझे हमेशा ठुकरा कर निकल जाती है | ऐसे ऐसे नमूनों को पसंद करती है, लेकिन मेरी शक्ल से ही चिढ है इनको……

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अपने जीवन के कुछ अंश देने का यहाँ प्रयोजन यह है कि कई मित्र मुझे फोन या मैसेज करके कहते हैं कि जीवन बोझ लगने लगी है | लगता है कि आत्महत्या कर लूं…. तो उन्हें ही यह समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि मैं भी कभी आप लोगों की ही तरह सोचता था क्योंकि मैंने तब तक स्वयं को नहीं जाना था | आप तो इतने अकेले नहीं हो जितना मैं रहा क्योंकि कोई तो आपके साथ है ही जिसे आप अपना कह सकते हैं ! मेरे साथ तो वह अवसर भी बहुत कम रहा कि मैं किसी अपने पर विश्वास करके निश्चितं रह सकूँ | केवल रफ़ी साहब, मुकेश साहब, किशोर दा, लता जी के गानों ने मुझे मृत्यु से दूर रखा और और कभी कदम उठा भी लिया तो, मौत ही मुझे ठुकरा कर निकल गयी |

तो यदि कभी कोई ऐसी किसी परिस्थिति में आ जाए तो निःसंकोच मुझ से सम्पर्क कर सकते हैं और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि यदि अभी आप समस्या का सामना नहीं कर पाए, तो अगले जन्म में वहीँ से जीवन शुरू करना पड़ेगा | जैसे कई बार आपने ऐसी कहानियां भी पढ़ी होंगी कि नौ-दस वर्ष की अवस्था में ही किसी के माँ बाप गुजर गए और उसे अपने छोटे छोटे भाई बहनों को पालना पड़ा |

जरा सोचिये कि क्या अगले जन्म में ऐसी परिस्थिति से शुरू करना चाहेंगे ? यदि कभी अवसर मिले तो यूबीसॉफ्ट का एज ऑफ एम्पायर अवश्य खेलें | जीवन का मूल मन्त्र सीख जायेंगे यदि आपने मेरी तरह प्रकृति के सान्निध्य में जीवन का पाठ नहीं सीख पाए हैं तो |-विशुद्ध चैतन्य

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