अभी मानव को कैसा होना चाहिए वह सीखिये और सिखाइए अपनों को

मेरा मानना है कि जीवन और विडियो गेम में कोई अंतर नहीं है | आप चाहें तो एज ऑफ एम्पायर एक बार अवश्य खेलें | क्योंकि यह जीवन को इतने सरल तरीके से समझा देता है कि जीवन मनोरंजक लगने लगती है | सारा भय निकल जाता है और आने वाली चुनौतिओं का सामना करने से भय नहीं लगता बल्कि नयी उर्जा व जोश का संचार हो जाता है | इस गेम को भी मैं अपने जीवन के प्रेरणादायी खेलों में ही रखता हूँ | इस गेम में आप एक अनजान द्वीप में पहुँच जाते हैं और फिर वहां खाने पीने के सामान से लेकर नया साम्राज्य खड़ा करने तक का संघर्ष करना होता है |

जो स्थिति इस गेम में शुरू में होती है, वही स्थिति इस समय मेरे साथ है | मैं ऐसी जगह पर हूँ, जहाँ पर हर तरफ मेरे विरोधी हैं न आर्थिक सहयोग है न ही भौतिक या मानवीय सहयोग है | लेकिन अब स्वयं से परिचित हूँ, इसलिए अब असहाय नहीं हूँ | अब तक आयी हर बाधा स्वतः मिटती चली गयी और आगे आने वाली बाधा भी क्योंकि यही जीवन है | और जीवन है खेल जिसे एज ऑफ एम्पायर जैसे गेम से सरलता से समझ सकते हैं | अभी तो यह गेम मेरे पास नहीं है और न ही खरीदने के पैसे हैं, लेकिन किसी समय इस गेम को इस तरह से खेला था कि मैं स्वयं को भूल चुका था और इस गेम का ही एक पात्र बनकर रह गया था | आज भी कभी शत्रुओं और विरोधियों को हावी होते हुए देखता हूँ तो यह गेम मुझे याद आ जाती है और मन में फिर से उत्साह आ जाता है कि आ जाओ सामने, सभी से निपट लूँगा… क्योंकि इस गेम में भी जब दुश्मन सेना चारों ओर से घेर लेती थी तो मैं यही कहता था |

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यहाँ जो कुछ कहा जा रहा है वह पुर्णतः मेरे निजिविचार हैं अतः उसे किसी शास्त्र में ढूँढने का प्रयास न करें | यदि कहीं मिल गया तो वह संयोग या दुर्घटना मात्र होगा मैं या मेरी आत्मा जिम्मेदार किसी भी रूप में नहीं मानी जायेगी | यह विचार उन लोगों को ध्यान में रखकर लिखा गया है, जो मुझसे यह अपेक्षा रखते हैं कि मैं शास्त्र पढ़कर उनका मार्गदर्शन करूँ या कथा कहानियाँ सुनाऊँ | जो मुझे पंडित या पुरोहित समझते हैं और लग्न और मुहूर्त पूछते हैं | जो ज्योतिषी या तांत्रिक समझते हैं और वशीकरण और लॉटरी जीतने के मन्त्र पूछते हैं |

मैं उपरोक्त में से कुछ नहीं हूँ क्योंकि मैं शुद्ध सन्यासी हूँ और पूर्ण व्यवहारिक | जीवन के संघर्षों और ठोकरों से ज्ञानप्राप्त किया है | प्रकृति मेरी गुरु रही और फूटपाथ मेरी साधना स्थली रही | जहाँ कई कई दिनों का व्रत करना पड़ा और प्रसाद के रूप में लोगों से मिले गालियाँ और ठोकरें | आज जो कुछ हूँ वह किसी शास्त्र को पढ़कर नहीं, समाज को पढ़कर हुआ हूँ | यदि मुझे समाज से ठोकरें न मिलती तो मैं स्वयं से कभी भी परिचित नहीं हो पाता था | इसलिए समाज का में हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ और उनका कर्ज चुकाना चाहता हूँ समाज के लिए कुछ सार्थक करके | इसलिए ही मैं हर पीड़ित के दुःख को पूरे हृदय से सुनता हूँ और आसानी से समझ पाता हूँ उसकी पीड़ा को | मैं रामायण के पाठ करने के लिए सन्यासी नहीं हुआ हूँ और न ही सन्यासी हूँ उस नियम के अंतर्गत जो पंडितों और पुरोहितों ने तय किये हैं | लोग कहते हैं कि आप सन्यासी हो तो फेसबुक क्यों प्रयोग करते हो ? भजन-कीर्तन क्यों नहीं करते ? कर्मकांड क्यों नहीं करते ? यह क्यों नहीं करते और वह क्यों नहीं करते ? संयासी ऐसे होते हैं और सन्यासी वैसे होते हैं, शास्त्रों में ऐसा लिखा है और वैसा लिखा है….

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मतलब सन्यासी को क्या करना है और क्या नहीं अब वे बताएँगे जिनको खुद का नहीं पता कि पैदा क्यों हुए थे ? वे लोग मुझे सन्यास सिखायेंगे जो अभी शास्त्रों में क्या लिखा है और क्यों लिखा है नहीं समझ पाए ? वे लोग मुझे सन्यास के नियम सिखायेंगे जो मंदिर-मस्जिद तक सीमित हैं और भजन कीर्तन से ऊपर कभी उठ ही नहीं पाए ? वे लोग सिखायेंगे आध्यात्म जिनको न स्वयं का पता है और न ही आत्मा का, जिनको न धर्म का पता है न मानवता का ?

सभी के लिए मैं एक बार फिर कह देना चाहता हूँ कि मैं स्वतंत्र हूँ किसी मान्यता या पाखण्ड के बंधन में नहीं हूँ | जो हूँ जैसा हूँ वैसा ही हूँ | इसलिए मुझसे कभी न कहें कि सन्यासी को ऐसा होना चाहिए या वैसा होना चाहिए | पहले आप वह हो जाइये जैसा ईश्वर चाहता था कि होना चाहिए फिर आइएगा मुझे सिखाने कि सन्यासी को कैसा होना चाहिए | अभी मानव को कैसा होना चाहिए वह सीखिये और सिखाइए अपनों को | अभी तो आप पैदा होते ही हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई….. बनते और बनाते हैं, जिस दिन मानव बनने और बनाने लगें उस दिन आइएगा मुझे सिखाने कि सन्यासी को कैसा होना चाहिए | -विशुद्ध चैतन्य

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