कई बार ऐसी घटना को coincidence या संयोग कह कर हम टाल देते हैं |


Miracle या चमत्कार एक ऐसी घटना है, जो पढ़े-लिखों और डिग्रीधारियों के लिए वहम या अन्धविश्वास से अधिक कुछ नहीं है | अभी मैं जो कुछ लिखने जा रहा हूँ, वह केवल अनपढ़ों की ही समझ में आ सकता है, इसलिए पढ़े-लिखे और किताबी ज्ञान का कबाड़ समेटे विद्वान इस पोस्ट को समझने में अपनी उर्जा व्यर्थ न करें |
अधिकाँश लोगों को का मानना है कि चमत्कार कोई जादूगर या कोई सिद्ध बाबा या ईश्वर ही दिखा सकता है, या उनके ही जीवन में घटित होता है | जबकि चमत्कार तो प्रत्येक के जीवन में सामान्य रूप में घटित होता है, लेकिन हम अपनी ही उलझनों में इस कदर उलझे हुए रहते हैं कि कभी इस और ध्यान देते ही नहीं है | कई बार ऐसी घटना को coincidence या संयोग कह कर हम टाल देते हैं | उदाहरण के लिए आप को कहीं किसी आवश्यक काम से बाहर जाना है, और कोई साधन उपलब्ध न हो पा रहा हो, ठीक उसी समय कोई कार या स्कूटर आकर आपके पास रूकती है, और एक पता पूछती है… आप पता बता देते हैं…और वह कहता है कि चलिए आपको आगे तक छोड़ देता हूँ…. आप यह सोच कर आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि उसने जो पता पूछा था, उसी जगह के आसपास का था, जहाँ आपको जाना था | लेकिन आप चूँकि पढ़े-लिखे हैं इसलिए इसे अनदेखा कर देते हैं और कई लोग तो ईश्वर को धन्यवाद भी नहीं कहते |

मैं यही प्रयोग कई वर्षों से कर रहा हूँ और समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि क्या वास्तव में मिरेकल सामान्य घटना है या कोई विशेष व्यक्ति ही इसका सुख भोग पाता है | मैं तो साधारण सा अनपढ़ सन्यासी हूँ और रिद्धि सिद्धि भी नहीं है मेरे पास | न कोई जादू जानता हूँ और न ही कोई चमत्कार | मुझसे तो अच्छे वे पंडित हैं, जो चेहरा देखकर आपके मन की बात बता देते हैं, मैं तो वह भी नहीं जानता | लेकिन मेरे साथ ऐसा हमेशा होता रहा जिसे चमत्कार कह सकता हूँ | जैसे मैंने अपने एक पोस्ट में अपने साथ घटी एक घटना लिखी थी कि कैसे मैं भूखा एक स्टेशन में घूम रहा था और कोई आकर मुझे खाना खिला गया और भी ऐसी कई घटनाएं मैंने अपने पोस्ट में समय समय पर बतायीं हैं |

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कहते हैं कि ऐसी घटनाएँ घटने पर न बताया करें क्योंकि ये अलौकिक शक्तियां हैं और बताने से घटने लगती हैं | बात तो सही है, लेकिन मैं तो सन्यासी हूँ इन शक्तियों के घटने से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला मुझे | अधिक से अधिक मैं फिर फूटपाथ में आ जाऊंगा और कुछ नहीं होगा | लेकिन मैं अभी हाल ही की घटना बताने जा रहा हूँ, कल मैं यही कहानी सुनाऊंगा तो आप कहेंगे कि मनगढ़ंत कहानी सुना रहा है बुड्ढा (तब तक मैं बूढ़ा हो चुका होऊंगा) | इसलिए वर्तमान की ही घटना बताता हूँ |

जिन लोगों ने उस पोस्ट को पढ़ा है, जिसमें मैंने कहा था कि आश्रम में एक निश्चित आय है और वह भी इतनी कम कि राशन के सिवा और कुछ नहीं लिया जा सकता और न ही किसी की कोई सहायता की जा सकती है उसमें से पैसे बचा कर | कोई ऐसा भक्त भी नहीं है कि आश्रम को नियमित दान देता हो……तो मैंने इस महीने का राशन न खरीदने का निर्णय लिया और हमारे सेवक को कुछ रूपये दे दिए ताकि उसकी समस्या हल हो सके | सभी को मेरा यह निर्णय बहुत ही बुरा लगा क्योंकि भजन पूजन हो न हो, ध्यान साधना हो न हो, लेकिन खाने में कटौती किसी को पसंद नहीं आई | लेकिन मैंने निर्णय ले लिया था सो वे अब कुछ कह भी नहीं सकते थे | तो हुआ यह कि जो थोड़े से पैसे बचे थे, वे भी मैंने स्वामी जी (आश्रम के अधिकृत प्रबंधक) को दे दिए | तय यह हुआ कि इससे चावल ले आयेंगे और आलू ले आएंगे | इससे महीने भर एक वक्त का खाना बन जाएगा और रात में चिउड़ा और मूरी खा कर काम चला लेंगे | स्वामी जी की एक समस्या यह भी थी कि रसोइया भी छुट्टी पर चला जायेगा तो खाना कौन बनाएगा |

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अब देखिये कि रसोइया के जाने के दूसरे दिन ही कुछ श्रृद्धालू परिवार सहित आश्रम में ठहरने आ गये | उनके साथ आयी स्त्रियों ने रसोई संभाल लिया और सब्जियां आदि वे लेकर आने लगे | वर्षो के बाद मुझे किसी स्त्री के हाथ का बना खाने को मिला, नहीं तो ढाबे में भी पुरुष ही खाना बनाते है… तो जो समस्या थी खाने पीने की वह सुलझ गयी | मेरे लिए तो कोई अधिक अंतर नहीं पड़ा क्योंकि मैं तो २४ घंटे में केवल एक बार ही भोजन ले रहा हूँ आजकल | लेकिन बाकी लोग जो खाने पीने की कटौती से घबरा गए थे, उनके लिए तो वे लोग भगवान् हो गये, क्योंकि दोनों समय खाना मिल रहा है अब और कोई कटौती भी नहीं हुई | वही तीन चार सब्जियाँ और वह सब कुछ….

तो यह घटना क्या यह सिद्ध नहीं करती कि यदि आप निःस्वार्थ भाव से किसी का सहयोग करते हैं (जैसा कि मैंने एक सेवक का सहयोग किया) तो प्रकृति स्वयं आपकी सहयोगी हो जाती है ? ऐसे कई घटनाएँ आश्रम में घटीं और लोगों को समझाने का भी प्रयास किया, लेकिन ये मुर्ख लोग नहीं समझते | इनको तो बस खाने से मतलब है | न तो ये ध्यान आदि के प्रयोग में कोई साथ देते हैं और न ही ध्यान आदि को समझने के लिए कभी प्रयास करते हैं | ऊपर से मुझे ही समझा रहे हैं कि ध्यान आदि बकवास चीज है, घंटे घडियाल लेकर संकीर्तन करना ही सत्य है | ठाकुर की प्रतिमा को भोग लगाओ खुद खाओ या न खाओ | किसी और की चिंता मत करो अपनी भलाई पर ध्यान दो… खैर.. ये इनकी धारणा है और सौ साल से ऐसे ही जी रहें हैं तो इतनी आसानी से बदलने वाली तो है नहीं | यदि ये लोग ध्यान आदि करते तो आज यह आश्रम और ठाकुर दयानंद जी के मिशन का समाधिस्थल न बन गया होता |

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अब यहाँ जो घटना मैंने आपको बताई वह सिद्ध कर रही है कि यदि आप स्वयं से परिचित हैं, तो आप की समस्या आसानी से प्रकृति को समझ में आ जाती है | क्योंकि प्रकृति आपके साथ समन्वय रखती है | इसलिए प्रकृति के साथ रहिये चिंता यह मत कीजिए कि आपको क्या लाभ मिला, चिंता यह करिए कि आपके माध्यम से दूसरों को कितना लाभ मिला | चाहे वह अलौकिक शक्ति हो, या अध्यात्मिक… या कुछ और | यदि आप उन शक्तियों को जनकल्याण में लगाते हैं तो हो सकता है इस जन्म में आपको कोई लाभ न दिखे… (जैसे मैं कह सकता हूँ कि मुझे तो कोई लाभ (आर्थिक) नहीं मिल रहा).. लेकिन भविष्य में या अगले जन्म में दूसरों के सहयोगी होने के कारण आपको भी मुसीबत में सहयोगी मिल जायेंगे |

यदि अभी भी आप मानते हैं कि मिरेकल आपके जीवन में नहीं घटता तो, जरा फलैशबैक में जाइए और आपको पता चलेगा कि आपके जीवन में भी कितनी ही ऐसी घटनाएं घटीं, जो आशचर्य से कम नहीं रहीं | –विशुद्ध चैतन्य

उन सभी को धन्यवाद जो इतनी लम्बी पोस्ट पढने का साहस जुटा पाए | 🙂

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