यदि आप भी अपने भाग्य को अपने अनुसार चलाना चाहते हैं, तो नकल मत कीजिये

भाग्य वास्तव में है क्या, यह हमेशा मेरे लिए एक रहस्य रहा था | क्योंकि जैसा मेरी कुंडली के अनुसार बताया गया, वैसा तो कुछ हुआ नहीं | या तो लोगों को कुंडली पढ़ना नहीं आया या फिर मेरे जैसे सरफिरों की कुण्डली समझना किसी सामान्य ज्योतिषी के बस की बात नहीं थी…. जो भी हो, कुण्डली देखने वालों ने जो बताया वैसा कुछ नहीं हुआ | न तो धन समृद्धि मिली और न ही अच्छी पत्नी… पत्नी तो छोडिये, कोई ऐसा भी नहीं मिला जो मुझे समझ पाया या जिसको मैं अपनी बात समझा पाया | तो फिर भाग्य वास्तव में क्या है ?

अब यदि मैं कहता हूँ कि जो कुंडली के अनुसार होना चाहिए था वह नहीं हुआ, लेकिन जो कुछ मैंने चाहा वह वह सब हुआ, तो फिर क्या भाग्य मेरे ही हाथ में था ? यदि मेरे ही हाथ में था तो मैं अपने लिए जीवन साथी क्यों नहीं ढूंढ पाया ? फिर प्रश्न वहीँ कि क्या जीवन साथी की तलाश ही मेरे जीवन का उद्देश्य था, क्या यही मैं चाहता था ? शायद नहीं | यदि यही मेरा उद्देश्य होता तो जैसे सबकुछ पाया वैसे ही उसे भी पा लेता |

तो फिर भाग्य क्या है ? जब मेरे चाहने और न चाहने से कोई चीज मिलती है तो भाग्य का योगदान कहाँ रहा ?

कई ऐसे लोगों को देखता हूँ, जिनकी शिकायत होती है कि भाग्य ने उन्हें कुछ नहीं दिया या उनका भाग्य खराब है | अभी कल ही किसी ने मुझे फोन किया और पूछा स्वामीजी जिस नौकरी को पाने की मैं तैयारी कर रहा हूँ वह मुझे मिल जाएगी न ? मेरे सर पर बहुत कर्ज हो गया है, क्या वह उतर जाएगा ?

मुझे हँसी आ गयी क्योंकि कर्जा तो अपने सर के ऊपर से टाटा, अम्बानी, माल्या और सुब्रोतो नहीं उतार पाए, भारत और अमेरिका स्वयं कर्जों में दबे हुए हैं, जब वे नहीं उतार पाए तो आम आदमी कैसे उतार लेगा भला ? अब कर्जा लो आप और आ जाओ मेरे पास कि स्वामी जी कर्जा उतारने का उपाय बताइये… तो यह तो ठीक नहीं है भाई | इसमें भाग्य को काहे कोसते हो ? भाग्य का मतलब यह तो नहीं कि किसी ने कहा कि भविष्य बहुत उज्जवल है, तो आप कर्जा उठाना शुरू कर दो ?

आप पढ़ाई कर रहें हैं अच्छी नौकरी के लिए तो संशय क्यों है कि मिलेगी या नहीं ? पहले स्वयं से पूछिये कि क्या आपके जीवन का उद्देश्य नौकरी करना ही है क्या ? आप पैदा हुए नौकर बनने के लिए ? आप पढाई भी कर रहें हैं ज्ञान पाने के लिए नहीं, बल्कि नौकरी पाने के लिए | तो जब आपका जीवन का उद्देश्य ही है नौकरी तो संशय नहीं होना चाहिए कि मिलेगी या नहीं, क्योंकि नौकरी तो मिलेगी ही जो आपकी योग्यता होगी उसके अनुसार | इसमें भाग्य का कोई लेना देना नहीं है…इसलिए भाग्य को इन विषयों में बीच में लाना ठीक नहीं है |

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मैंने जो अनुभव से जाना वह यह कि भाग्य वास्तव में आपके ही कर्मों का फल होता है और कुछ नहीं | जैसे आपने आम का पेड़ लगाया और उसमें आम के फल आ जाएँ तो यह आपका भाग्य है और यदि उसमें बैंगन आ जाए तो आपका दुर्भाग्य | लेकिन हो सकता है आप अक्लमंद हों और बेंगन बेचने लगें तो वही आपका सौभाग्य बन जाएगा |

फिर प्रश्न उठता है कि कई लोग बहुत मेहनत करने के बाद भी सफल नहीं हो पाते तो दोष तो भाग्य का ही है ?

मैं कहूँगा कि नहीं दोष भाग्य का नहीं है, दोष है आपके भीतर बैठी उस अवधारणा का कि आप योग्य नहीं हैं | यदि आप दूसरों की देखा देखी पढ़ाई के लिए कोई विषय चुनते हैं क्योंकि किसीने उसी विषय में पढ़ाई करके अच्छी नौकरी प्राप्त की थी, तो आप दूसरे के जूते में पैर रखकर मंजिल को पाना चाहते हैं | जबकि आपकी मंजिल कुछ और है | जैसे किसी को मुंबई जाना हो और चेन्नई जाने वाले किसी यात्री का टिकट हथिया लिया और बैठ गये चेन्नई की ट्रेन में, तो आप वाया चेन्नई ही मुंबई जायेंगे | इसमें दोगुना समय और पैसा बर्बाद हो जाएगा | अब आप भाग्य को दोष देंगे तो सही नहीं है | और हम सभी यही करते रहते हैं अपनी आधी जिंदगी तक | क्योंकि हम अपने स्वयं के दिशानिर्देश को महत्व नहीं देते, बल्कि दूसरों पर अधिक निर्भर रहते हैं | कारण यही है कि माँ बाप बचपन से आपको स्वयं से परिचित होने नहीं देते और हमेशा दूसरों का उदाहरण देते रहते हैं और तब तक देते रहते हैं, जब तक आप दूसरों की नकल करना नहीं शुरू कर देते | एक दिन ऐसा आ जाता है कि आपको स्वयं के आस्तित्व पर ही विश्वास नहीं रहता और आप किसी नेता या अभिनेता या बाबा आदि को अपने चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं | कई लोग हैं जो अपनी स्वयं की तस्वीर से अधिक किसी नेता-अभिनेता या संत-महंत की तस्वीर को महत्व देते हैं, अपनी प्रोफाइल में भी वही तस्वीर लगाते हैं | क्योंकि वे अपना अस्तित्व खो चुके होते हैं | ये वे लोग होते हैं जो दूसरों के जूतों में पैर डालकर चलने के आदि हो चुके होते हैं और इन्हें पता ही नहीं होता कि उनके अपने पैर का वास्तविक साइज़ क्या है | मैं ऐसे लोगों को दुमछल्ला कहता हूँ |

इस प्रकार के लोग कितनी ही मेहनत कर लें, वह नहीं पा सकते जिसके लिए उनका जन्म हुआ क्योंकि ये तो यही भूल चुके होते हैं कि ये वास्तव में हैं कौन | इनमें से कुछ स्वयं को आमिरखान समझते हैं तो कुछ शाहरुख़, कुछ मोदी समझते हैं तो कुछ मन्नू, कुछ तेंदुलकर समझते हैं, तो कुछ गावस्कर… लेकिन स्वयं को नहीं समझते कि ये स्वयं वास्तव में हैं कौन |

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तो भाग्य कर्म पर आधारित है और कर्म वह जो दिल से किया गया हो न कि केवल दिमाग से | जैसे आपकी रूचि चित्रकारी की है या संगीत में है, तो आप उसे सीखते हैं, कई कई घंटे उसपर अभ्यास करते हैं, तो एक दिन आप उसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेंगे आसानी से | यहाँ भाग्य आपके ही पक्ष में रहेगा | लेकिन आप संगीत सीख तो रहें हैं, लेकिन लोग आपको कह रहें हैं कि इंजिनीरिंग करने से बहुत फायदा है तो आप इंजीनियरिंग भी करने लगते हैं, ऐसे में आप अपने सबकॉन्शियस को दुविधा में डाल देते हैं है और आप न घर के रहते हैं और न घाट के | आप नौकरी करते हैं हैं लेकिन नौकरी में मन नहीं लगता | आप संगीत बजाते हैं, लेकिन वह भाव नहीं निकलता, चित्रकारी करते हैं तो चित्रों में जान नहीं पड़ती…. सब कुछ बिखरा सा हुआ लगने लगता है | हाँ यह हो जाता है कि आपकी दाल रोटी चल पड़ती है, लेकिन फिर आप कोल्हू के बैल सा जीवन जीते हैं | (जरा अपने आप से प्रश्न कीजिये कि क्या मैं गलत कह रहा हूँ, क्या यही स्थिति आपकी इस समय नहीं है ?)

मैं अपने जीवन में ऐसा कोई भी काम नहीं किया, जो मुझे मन मारकर करना पड़ा और यदि करना भी चाहा तो हो नहीं पाया | मैंने वही किया जो मैंने करना चाहा, चाहे वह संगीत हो, चाहे तांत्रिक क्रिया हो, चाहे नौकरी हो….. सभी अपनी ही शर्तों पर | मैं चौबीस साल तक इतना सहिष्णु था कि दूसरों की सलाह मान भी लेता था लेकिन उसके बाद मैंने वह सलाह कभी नहीं मानी जो मेरी आत्मा ने नकार दिया | क्योंकि मैंने तय किया था कि मैं २४ साल की उम्र तक हर हाल में शादी कर लूँगा …लेकिन परिवार ने ऐसा होने नहीं दिया | उनका मानना था कि मेरे जैसे योग्य व्यक्ति के लिए रिश्ता किसी ऊँचे (धनी) घराने से होना चाहिए और उन्होंने वह रिश्ता तुडवा दिया जो मैंने खोजा था | मेरी गलती केवल यह रही कि मैंने यह समझा कि अपने हैं, मेरे शुभचिंतक हैं मेरा भला चाहते हैं | लेकिन मैं गलत था | मेरा भला मेरे सिवा और कोई नहीं समझ सकता इसलिए अब दूसरों की सलाह लेना बंद कर दिया | मैंने फुटपाथों पर जीवन बिताया, भिखारियों के साथ खाना खाया… लेकिन मुझे यह मंजूर था | स्वयं को जानने के लिए ठोकरें खाना मंजूर था | लेकिन भीख नहीं मांग पाया चाहे भूखा रहना पड़ा कई कई दिन | परिणाम यह हुआ कि आज भी मैं अपनी ही शर्तों पर जीता हूँ और लोग मेरा अनुकरण करने का प्रयास करते हैं | मैं सारे दिन अपने कमरे में पड़ा रहता हूँ तो यहाँ वर्षो से सन्यासी बने लोग भी मेरी ही तरह कमरे में पड़े रहने को सन्यासधर्म समझने लगे 🙂

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वे ये नहीं जानते कि मैं कमरे में बैठे बैठे भी वह काम कर रहा हूँ जो एक सन्यासी को करना चाहिए | मैं लोगों को जागरूक करने का प्रयास तो कर ही रहा हूँ अपने बेसर-पैर के लेखों से ? यही काम एक संयासी पहले करते थे घर घर जाकर | मैं भी घर घर पहुँचाता हूँ और कई तो विदेश में भी मुझे पढ़ते हैं और समय समय पर सहयोग राशि भेजते रहते हैं, ताकि मैं इसी प्रकार लिखता रहूँ | तो क्या यह हर किसी के लिए संभव है कि वह इतनी शांत वातावरण प्राप्त कर पाए और वही करे जो उसे करना है ? बिलकुल संभव है, यदि वह स्वयं से परिचित है तब | लेकिन यदि मेरे नक़ल करने की कोशिश में पड़े तो हो सकता है सब कुछ गड़बड़ हो जाए | जैसे कि हमारे आश्रम के सन्यासी जो भोजन भजन और शयन के सिद्धांत पर सौ वर्षों से चलते आये और आज भजन करना आवश्यक नहीं समझते क्योंकि मैं भजन में नहीं बैठता | लेकिन मुझे हर वह सुख सुविधा प्राप्त हो जाती है जो इनको कभी नहीं मिली | इनको लगता है कि मेरी ही तरह ये भी पूजा पाठ, भजन कीर्तन नहीं करेंगे तो गाँव के लोग इनका भी वैसे ही सम्मान करेंगे जैसा मेरा करते हैं, तो ये भ्रम में हैं | इन्होने मेरे जूते में अपने पैर रखकर चलना शुरू किया है, इसका अर्थ यही है कि ये भी इतने वर्षों से भजन कीर्तन करने के बाद भी न तो ईश्वर को खोज पाए और न ही स्वयं को | तभी तो ये अपने पथ को छोड़कर मेरे पथ पर उतरने का प्रयास कर रहें है ? बिना यह जाने कि मैं भीतर क्या हूँ और बाहर दिखा क्या रहा हूँ |

इसलिए यदि आप भी अपने भाग्य को अपने अनुसार चलाना चाहते हैं, तो नकल मत कीजिये, स्वयं को समझिये और स्वयं के दिशानिर्देश पर ही चलिए | फिर चाहे दुनिया गालियाँ दे, फिर चाहे दुनिया आपसे आपका शरीर ही क्यों न छीन ले, चिंता मत कीजिये | यह शरीर भी एक दिन आपको वैसे भी छोड़ ही देना है | खोने या छिन जाने का भय मत कीजिये क्योंकि जो कुछ खोएगा या छीना जाएगा, वह सब आपका नहीं है | इसी जगत से लिया है आपने | लेकिन जो आपका है वह आपसे कोई छीन नहीं पायेगा | –विशुद्ध चैतन्य

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