धर्म और आडम्बर

अभी हिंदुस्तान माँ दुर्गा की स्तुति में मग्न है. नवरात्र को हम असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाते है. भौगोलिक विभिन्नताओं के बावजूद धर्म का सदा से मानव जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है. जहाँ भारत सनातन धर्म के साथ ही अन्य धर्मों को फलने-फूलने का मौका देता है वहीं यूरोप में ईसाई धर्म का प्रभाव साफ देखा जा सकता है. जहाँ धर्म सच्चे रास्ते पर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है वहीं धर्म के साथ आडंबर को जोड़कर कई लोग इसका नाजायज फायदा भी उठाते हैं. धर्म सुधार आंदोलन से पहले कुछ ऐसे आडंबर थे जिसके कारण धर्मों में सुधार की जरूरत महसूस हुई.

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में पोप शक्ति का केंद्र हुआ करती थी. रोम को सुंदर नगर बनाने के लिए पोप एवं पादरीगण को धन की जरूरत महसूस हुई. उन्होंने धन वसूलने का एक तरीका निकाला जिसे इन्डलजेंस या मुक्तिपत्र कहा जाता था. इसके पीछे उद्देश्य यह था कि- यदि कोई व्यक्ति अपने किए हुए पाप का प्रायश्चित करना चाहता है या इच्छा रखता है कि नरक में उसे ज्यादा कष्ट ना सहना पड़े तो पोप को धन देकर वह दोनों ही कार्य करवा सकता है. पोप ईश्वर से प्रार्थना कर किसी भी पाप की सजा में कमी करवा सकता है.

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन विकलिफ ने पादरियों द्वारा धन वसूलने के इस तरीके का  घोर विरोध किया. इससे खफ़ा होकर पोप ने उसे जातिच्युत कर दिया. उसकी मृत्यु होने पर पादरियों ने उसकी लाश को कब्र में से निकालकर कूड़े पर फेंक दिया.

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जॉन हस भी पोप एवं पादरियों के इस तरीके का विरोधी था. जब उसने इस बात को लेकर रोमन चर्च का विरोध करना शुरू किया तो उसे पादरियों द्वारा जिंदा जला दिया गया. ऐसे कई और व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने धर्म को अपने मूल रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है.

इस प्रकार धर्म में आडंबरों की समाप्ति की कीमत कई लोगों को जान देकर चुकानी पड़ी है. इसलिए हमें किसी भी धार्मिक उत्सव को मनाते वक्त आडंबरों से दूर रहना चाहिए.

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