हो सकता है कल मैं भी कंगाल सन्यासी से करोड़पति सन्यासी हो जाऊं

आज जब मैं शॉप में गया तो पता चला कि जो मॉडल मैंने पसंद किया था वह स्टॉक में नहीं है, लेकिन यह नया वाला मॉडल आर्डर करने पर ही मंगवाया जायेगा | तो मैंने आर्डर कर दिया जो कि कल दोपहर तक मिल जाएगा | यह १२००० वाट का है और बाकी सारे फीचर वही केवल वजन इसका पिछले मॉडल से तीन किलो अधिक यानि २० किलो का है |

चूँकि इस महीने (सितम्बर-२०१४) से चार्ज मेरे हाथों में था तो सारे पैसे भी मेरे पास ही थे आश्रम के जिससे महीने भर का खर्च चलाना होता था | इसलिए आज मुझे महीने भर का राशन भी लेने जाना पड़ा | जब लौटा तो जितने पैसे थे उसमें से केवल हज़ार रूपये ही बचे और अभी सभी कर्मचारियों का वेतन देना है और पूरे महीने सब्जी आदि भी मँगवाते रहना होगा | अभी तक न तो ट्रस्टियों के ओर से एक रूपये पहुँचा है और न ही वे अब भेजने ही वाले हैं | क्योंकि उनके लिए तो अच्छा ही हुआ कि मेरे हाथ में आ गया और मुझे ये लोग चमत्कारी मानते हैं | क्योंकि मैं जब भी जो चाहता हूँ, मुझे मिल जाता है तो उन्हें लग रहा है कि चलो अच्छा हुआ, अब आश्रम को कुछ देना भी नहीं पड़ेगा और ट्रस्टी और अध्यक्ष का पट्टा तो लटका ही हुआ इसलिए मालिक की तरह आश्रम में आयेंगे और पिकनिक मनाकर चले जायेंगे |

लेकिन शायद वे नहीं जानते कि यदि मैं यहाँ का अब इंचार्ज हूँ तो इन नाम के ट्रस्टी और अध्यक्षों से जवाब भी लूँगा यदि कभी गलती से वे आये यहाँ पिकनिक मनाने तो | दुनिया भर में कहते फिर रहे थे कि हम हर महीने इतना देते हैं, और इतना कुछ करते हैं… आदि इत्यादि | आज तो सारा कुछ मेरे ही हाथ में था तो पता चला कि वे दुनिया को ही नहीं, मुझे भी झूठ बोलते रहे कि वे कुछ देते हैं, जबकि आश्रम अपनी ही आय से अपने खर्च चला रहा था इतने समय से | वे तो बाहर जाकर दान भी लेते हैं आश्रम के नाम पर और दुनिया भर में घूमते फिरते हैं आश्रम के प्रमुख बनकर | लेकिन आश्रम को एक रूपये का सहयोग नहीं करते |

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मैं घबराया नहीं हूँ, केवल आज पहली बार पूरे अधिकार से आश्रम से बाहर जाकर आश्रम के लिए बाजार किया और यह भी जाना कि कम से कम खर्च करके भी आश्रम की वर्त्तमान आय से आश्रम चलाना संभव नहीं है | हाँ, लेकिन मैं जानता हूँ कि आज चाहे मेरे पास पैसे कम पड़ गये और दो तीन दिन और किसी का वेतन आदि नहीं दे पाउँगा, लेकिन यह भी जानता हूँ कि मैं इतनी व्यवस्था कर लूँगा, कि सभी को न केवल दो तीन दिन में वेतन दे पाउँगा, बल्कि बढ़ा कर वेतन दूँगा अगले महीने से | क्योंकि मैं जिस सिद्धांत पर कार्य करता हूँ वह प्राकृतिक है और उस धर्म के अंतर्गत है जिसपर सम्पूर्ण सृष्टि चलती है और जिसे मैं सनातन धर्म (आर्यसमाजियों या हिंदुवादियों वाला नहीं) कहता हूँ | और जो इस धर्म के अंतर्गत चलता है, उसे हर आवश्यक सहायता ईश्वर (प्रकृति) की ओर से उपलब्ध हो जाता है |

उदाहरण के लिए जल और वायु हमेशा रिक्त स्थान को भर देती है | धन को जलतत्व माना जाता है और जब प्रकृति के नियमानुसार यदि कोई समाज के हित के लिए स्वयं को माध्यम के रूप में प्रस्तुत कर देता है, तो प्रकृति स्वयं उस माध्यम को समृद्ध कर देती है ताकि वह आगे लाभ पहुँचा पाए | हो सकता है कल मैं भी कंगाल सन्यासी से करोड़पति सन्यासी हो जाऊं तो कारण यही होगा कि मैंने स्वयं को माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया था | लेकिन कल मेरे ही मित्र कहेंगे कि देखो पाखंडी सन्यासी कल तक चप्पलों में घूमता था और आज…..!!!

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कोई बात नहीं यह मैंने नहीं चाहा था कभी कि मैं किसी आश्रम या मठ में किसी प्रमुख के रूप में रहूँ, मुझे तो शान्ति से अकेले रहने के लिए यह आश्रम ठीक लगा था लेकिन परिस्थिति ने मुझे आज कार्य सौंप दिए जिसे पूरा करने के लिए मुझे अपना व्यापारिक बुद्धि का प्रयोग भी करना पड़ेगा |

इसलिए मैं जल्दी ही सशुल्क ध्यान शिविर आरम्भ करूँगा ताकि आश्रम को कम से कम दस हज़ार रूपये महीने की अतिरिक्त आय हो सके और सभी कर्मचारियों को मैं संतुष्ट करते हुए आश्रम को विकास की नई दिशा दे पाऊं |

बाकि सभी कुछ ईश्वर जानता है कि मैं कितना पाखंडी हूँ और कितना ढोंगी | लेकिन मैं प्रसन्न हूँ कि ईश्वर ने मुझे इस योग्य समझा कि इतने बड़े आश्रम की जिम्मेदारी मुझे सौंपी और जानता हूँ कि जिस प्रकार ईश्वर का सहयोग बचपन से मेरे साथ रहा, वैसा ही सहयोग आगे भी करते रहेंगे | क्योंकि ईश्वर ने किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुझे इस दुनिया में भेजा था शायद वह इस आश्रम के उत्थान के साथ ही जुड़ा हो ? -विशुद्ध चैतन्य

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