‘सर्वधर्म समभाव मदरसा’

जनं विभ्रति बहुधा, विवाचसम्, नाना धर्माणंम् पृथ्वी यथौकसम्।सहस्र धारा द्रवीणस्यमेदूहाम, ध्रिवेन धेनुंरनप्रस्फरत्नी।।

अर्थात विभिन्न भाषा, धर्म, मत आदि जनों को परिवार के समान धारण करने वली यह हमारी मातृभूमि कामधेनु के समान धन की हजारों धारायें हमें प्रदान करें | (अथर्व वेद, 12वें मण्डल, प्रथम अध्याय)

कई हज़ार साल पुरानी बात है | एक राज्य में एक प्रकाण्ड पंडित रहा करते थे | वे बहुत ही मिलनसार थे और कभी भी किसी से किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते थे | उनसे सलाह लेने शुद्र भी आ सकते थे और ब्राह्मण भी, हिन्दू भी आ सकते थे मुस्लिम भी….. दक्षिणा लेने में भी कोई भेद-भाव नहीं करते थे चाहे अमीर हो चाहे ग़रीब | उनकी ख्याति इतनी फैली हुई थी कि सात समुन्दर पार से भी लोग आते थे सलाह लेने के लिए |

इसी प्रकार समय बीतता गया | कई बार कई शुभचिंतकों ने सलाह दी कि पंडित जी आप जैसे धर्मपरायण पंडित यदि एक आश्रम या गुरुकुल खोल ले तो कितना अच्छा हो जाता ? ऋषि मुनि तो आश्रम और गुरुकुल चला ही रहें हैं, लेकिन यदि एक पंडित भी गुरुकुल खोल ले तो जय जयकार हो जायेगी |

पंडित जी को बात जँच गयी और उन्होंने तुरंत एक गुरुकुल खोलने की घोषणा कर दी | धन की तो कोई कमी थी नहीं पंडित जी के पास लक्ष्मी जी की कृपा से तो काम भी तुरंत आरम्भ हो गया | बहुत ही सोच विचार कर गुरुकुल का नाम रखा गया, ‘वसुधैव कुटुम्बकम गुरुकुल’ | जब पंडित जी ने घोषणा की कि यह विश्व एक पहला ऐसा गुरुकुल होगा जो पंडित द्वारा स्थापित व संचालित लेकिन सभी धर्म, सम्प्रदाय, पंथ के लोगों के लिए होगा और सभी के बच्चों को यहाँ भेदभाव किये बिना दाखिला दिया जाएगा | ब्राह्मण और शुद्र में भी कोई भेद नहीं किया जाएगा… तो चारों ओर उनकी जय जयकार गूंजने लगी | चाहे आजतक हो या कलतक टीवी, चाहे स्टार हो या मून टीवी, चाहे टाइम्स हो या ऑफटाइम्स….सभी मीडिया में उनके गुरुकुल का प्रचार होने लगा | यह और बात है कि पंडित जी से भी मीडिया हर खबर की कीमत वसूल रही थी… खैर.. यह सब तो चलता रहता है….

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आइये गुरुकुल चलते हैं | वहाँ एडमिशन के फार्म लेने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी और इतनी भीड़ देखकर सारे ऋषि मुनि आश्चर्य चकित थे कि ऐसा क्या हो गया उस गुरुकुल में कि लोग मक्खियों की तरह टूट पड़े वहाँ पर अपने बच्चों का दाखिला करवाने के लिए ? ऋषि मुनि भी अपने गुरुकुल में कोई भेदभाव नहीं रखते थे किसी से, लेकिन लोग उनके गुरुकुल में अपने बच्चों को भेजने से अच्छा कान्वेंट स्कूल या मिशनरी स्कूल में भेजना पसंद करते थे | लेकिन यहाँ तो बिलकुल उल्टा ही हिसाब हो गया था |

जब फ़ार्म बंट गये तो भीड़ छंटनी शुरू हो गयी | फ़ार्म में कुछ नियम थे जो वसुधैव कुटुम्बकम गुरुकुल के सिद्धांत भी थे और नियम भी:

१. वसुधैव कुटुम्बकम गुरुकुल सभी धर्म, सम्प्रदाय, जाति, प्रजाति का सम्मान करता है और मानता है कि विश्व के सभी प्राणी एक परिवार के समान है |

२. वसुधैव कुटुम्बकम गुरुकुल में कोई भेद भाव न हो, इसलिए सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा |

३. गुरुकुल में पढ़ने वाले सभी छात्रों को चोटी, जनेऊ, धोती, लंगोटी धारण करना होगा | तिलक लगाना होगा और रामनामी वस्त्र धारण करना होगा |

४. गुरुकुल में पढ़ने वाले सभी छात्रों और उनके माता-पिता को लहसुन, प्याज, टमाटर (जो बच्चे टमाटर नहीं छोड़ सकते उन्हें टमाटर के पैसे अलग से जमा करवाने होंगे क्योंकि टमाटर राजसी प्रवृति की सब्जी है और केवल राजघराने के लोग ही इसका खर्च वहन कर सकते हैं), माँस-मच्छी का त्याग करना होगा |

५. गुरुकुल में पढ़ने वाले सभी छात्रों को आपस में राम राम बोलकर अभिवादन करना होगा…..

नियम पढ़ने के बाद कुछ लोग तो ख़ुशी से झूम उठे और जयकारा लगाने लगे | लेकिन कुछ लोग पंडित जी के पास गये और बोले कि यह कैसा वसुधैव कुटुम्बकम है ? आपने तो कहा था कि सभी धर्मों का सम्मान करेंगे लेकिन यहाँ तो….? हमने तो समझा था कि आप जैसा भेदभाव से मुक्त पण्डित के गुरुकुल में हमारे बच्चे पढ़ेंगे तो भारतीय सभ्यता से और अच्छी तरह से परिचित हो जायेंगे | उनमें भी भारतीयों की तरह शिष्ट व्यवहार करना, माता-पिता का आदर करना, बड़ों का आदर करना, राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध का भाव आदि दुर्लभ भारतीय गुण आ जायेंगे | बाबा महाराजों के गुरुकुल तो अंग्रेजी मीडियम के स्कूल से अधिक कुछ नहीं होते | वहाँ भी वही अंग्रेजी सिखाते हैं और विदेश में नौकरी कैसे पायें सिखाते हैं | कुछ गुरुकुल तो योग भी सिखाते हैं और कुछ भजनकीर्तन |

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इसलिए हम आपके गुरुकुल में आये थे अपने बच्चों का दाखिला करवाने क्योंकि आपने तो सभी के साथ समान व्यवहार रखा हुआ था….

पंडित जी ने समझाया; “देखिये आप लोगों के विचारों में दोष है | मैं आज भी आप सभी से समान भाव से ही मिलता हूँ और यही भाव सदैव रहेगा भी | लेकिन यह जो भी नियम है वह गुरुकुल का है और वह समानता का भाव लाने के लिए ही तो है | इस तरह से सभी समान हो जायेंगे और न कोई ब्राह्मण रहेगा और न ही कोई शुद्र रहेगा, न कोई मुस्लिम रहेगा और न ही कोई इसाई रहेगा | सभी हिन्दू कहलायेंगे और यही तो वसुधैव कुटुम्बकम का वास्तविक अर्थ है | कि हम सभी एक परिवार अर्थात हिन्दू परिवार हैं |”

कई माँ-बाप को समझ में नहीं आई पंडित जी की बात और वे ऋषि-मुनियों के आश्रम में अपने बच्चों को दाखिला करवा दिए और कुछ ने कान्वेंट और मिशनरी स्कूलों में |

पंडित जी के गुरुकुल की बात जब तालिबानी और आइसिस के पास पहुँची तो उन्होंने भी घोषणा कर दी ‘सर्वधर्म समभाव मदरसा’ खोलने की | अब आप समझ ही गए होंगे कि मदरसा पंडित जी के गुरुकुल से १९ तो हो नहीं सकता था | 

नोट: यदि हम दूसरों को मिटा कर या नीचा दिखाकर विश्व को जीतना चाहते हैं तो यह ध्यान रखें कि यह काम तो सिकंदर भी नहीं कर पाया था | यह काम तो अंग्रेज भी नहीं कर पाए और सिमट कर रह गये एक छोटे से देश में | तालिबानियों का अंजाम भी सभी के सामने है और आइसिस का अंजाम भी सामने आ जाएगा | आइसिस का समर्थन यदि सरकारें और कट्टरपंथी न करें तो उनका आस्तित्व तो २४ घंटे में मिट सकता है |

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इसलिए आप हिन्दू हों या मुस्लिम, सिख हों या ईसाई, पहले मानवता अपनाइए फिर राष्ट्रीयता और उसके बाद आता है आपका सम्प्रदाय और आपकी मान्यताएं | जिस दिन भी आप पार्टी, नेता, जाति सम्प्रदाय से ऊपर उठकर राष्ट्रीय और मानवीय भाव को पा लेंगे उस दिन भारत विश्वविजयी हो जाएगा और हर भारतीय होगा गरीबी से मुक्त, समृद्ध व ऐश्वर्यवान | बस उतनी ही दूरी है समृधि से, जितनी दूरी मानवता और राष्ट्रीयता से है आप लोगों की |

आपका धर्म और आपकी मान्यताएं आपका व्यक्तिगत विषय है उसे राष्ट्र व राजनीती के लिए प्रयोग न करें | क्योंकि हमारा राष्ट्र न तो सीरिया है और न ही ईराक…. यह भारतवर्ष है और श्रेष्ठ है विश्व में, क्योंकि संकीर्णता से मुक्त है | –विशुद्ध चैतन्य

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