सभी धर्म कहते हैं कि ईश्वर एक है लेकिन वह इकलौता ईश्वर हिन्दू है, मुस्लिम है, इसाई है, सिख है…….. अभी तक यह गुत्थी ही नहीं सुलझी है |

कभी कभी सोचता हूँ कि श्रीकृष्ण ने जब कहा कि मैं कण कण में विराजमान हूँ, मैं ही ब्रम्ह हूँ तो उनके कहने का अर्थ वह नहीं था जो पंडितों और ज्ञानियों ने समझा | उनका कहने का अर्थ था कि ईश्वर बाहर नहीं है, स्वयं के भीतर ही है आप स्वयं ही ईश्वर हो | क्योंकि पंचतत्वों से ही हम सभी निर्मित हैं और उन्हीं पंचतत्वों को भ + ग + व + आ + न = भगवान् कहा गया | लेकिन पंडितों ने श्रीकृष्ण को भगवान् बना दिया और अन्य सभी को सेवक और गोपियाँ | इस प्रकार तो एक ईश्वर कि अवधारणा भी गलत हो जाती है |

सभी धर्म कहते हैं कि ईश्वर एक है लेकिन वह इकलौता ईश्वर हिन्दू है, मुस्लिम है, इसाई है, सिख है…….. अभी तक यह गुत्थी ही नहीं सुलझी है |

सारांश यह कि श्रीकृष्ण की शिक्षा को भी पंडितों (विद्वानों) ने अपने अनुसार ही बदल दिया और उन्हें भी पराया बना दिया | एक तरफ तो वे कण कण में हैं कहा जा रहा है, वहीँ दूसरी और उन्हें गुड्डे गुड़िया की तरह सजाया नचाया जा रहा है | उनसे माँगने के लिए मंदिरों या मूर्तियों के पास जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करनी पड़ती है | तो उनका वाक्य ‘अहम् ब्रम्हास्मि’ तो झूठ सिद्ध हो गया |

जो श्रीकृष्ण को अपना आदर्श मानते है, वे यह बात भी समझ लें कि श्रीकृष्ण बाहर नहीं हमारे भीतर ही हैं | उनके सारे रूपों में यदि ध्यान दें तो वे सभी गुण रूप भी हमारे भीतर ही है | केवल हम उतने संतुलित व एकाग्रचित नहीं रहते जितने कि श्रीकृष्ण थे इसलिए हम अपने भीतर छुपे हुए गुणों को खोज नहीं पाते | हम निर्भर रहते हैं दूसरों की दया पर कि वह हमारे बारे में क्या सोच रहा होगा या मेरे पास उससे कम धन क्यों हैं, मेरी पत्नी उसकी पत्नी जितनी सुन्दर क्यों नहीं…… आदि इत्यादि |

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इसलिए स्वयं के भीतर जाइए और स्वयं से परिचय कीजिये | बचपन से यही सुनाते माँ बाप ने पाला है कि उसकी तरह पढ़ो, उसकी तरह बनो, उसकी तरह चलो….. | शिक्षकों ने अमेरिका, मल्टीनेशनल कंपनी और सरकारी नौकरी दिखाते हुए पढ़ाया | शादी हुई तो बीवी बच्चों की फरमाइशें पूरी करने और अपनी नौकरी बचाने में स्वयं से परिचय करने का अवसर नहीं मिला | कम से कम २४ घंटों में से २४ मिनट तो निकालिए अपने लिए ? हो सकता है जिसे आप अभी अपनी समस्या समझ रहें हों, वह आपकी अपनी समस्या हो ही नहीं | हो सकता है केवल दूसरों को खुश करने के चक्कर में ही आपने परेशानी ले रखी हो ?

यदि आप सच्चे दिल से श्रीकृष्ण व भगवद्गीता का सम्मान करते हैं, तो उनकी शिक्षा को अपनाइए न कि उन्हें पराया बनाइये | वे द्वैत नहीं, अद्वैत हैं इसलिए स्वयं को भी इस स्तर तक स्वच्छ बनाइये कि द्वैत मिट जाए और अद्वैत से परिचय हो जाए | -विशुद्ध चैतन्य

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