श्री कृष्ण को बनाएं मैनेजमेंट गुरु


श्री कृष्ण सिर्फ रासलीलाएं नहीं रचाते थे, वह प्रबंधन के माहिर थे। आइए उनसे सीखें, मैनेजमेंट के गुर…

व्यापक विजन

तीन स्टूडेंट्स थे।
तीनों से एक सवाल पूछा गया : आप पढ़ क्यों कर रहे हैं?
पहला बोला : मुझे परिवार का पेट पालना है।
दूसरे ने कहा : मैं यह दिखाना चाहता हूं कि मैं दुनिया का सबसे जीनियस स्टूडेंट हूं।
तीसरे ने कहा : मैं पढ़कर एक बेहतर समाज और देश का निर्माण करना चाहता हूं। तीनों एक ही काम कर रहे हैं, लेकिन तीनों के नजरिये में कितना फर्क है!
कृष्ण कहते हैं कि आप जो भी कर रहे हैं, उसे लेकर आपकी सोच और आपका विजन व्यापक होना चाहिए।

वर्तमान पर फोकस

कृष्ण कहते हैं कि जो भी आपका काम है, उसे पूरे निर्लिप्त भाव से करें। आपका जो वर्तमान काम है, उसे अपनी भविष्य की चिंताओं और अपेक्षाओं के बदले गिरवी रखकर करेंगे तो कभी भी अपना काम सही तरीके से नहीं कर पाएंगे। अपनी ड्यूटी निभाने का सबसे अच्छा तरीका निष्काम कर्म ही है।

पॉजिटिव ऐटिट्यूड

श्रीकृष्ण दो तरह की वर्क कल्चर की बात करते हैं। एक है दैवीय और दूसरी आसुरी। दैवीय वर्क कल्चर में जहां निडरता, आत्म नियंत्रण, दूसरों की गलतियां न ढूंढना, शांत मन, सज्जनता शामिल होती हैं, वहीं आसुरी वर्क कल्चर में भ्रम, व्यक्तिगत इच्छाएं, और नेगेटिविटी होती हैं। कृष्ण दैवीय कल्चर पर जोर देते हैं।

मोटिवेशन

कृष्ण खुद तो मोटिवेटेड रहते हैं और अपने संपर्क में आने वाले दूसरे लोगों को भी मोटिवेटेड रखते हैं। समझाते हैं, ज्ञान देते हैं और जरूरत पड़ने पर डांटते भी हैं। एक अच्छे वक्त की तरह उन्होंने युद्ध के दौरान दुखी हो रहे अर्जुन को अपना कर्म करने के लिए प्रेरित किया और उसमें कामयाबी पाई।

मन पर नियंत्रण

लालच, जलन, क्रोध, फ्रस्ट्रेशन और शक करने की आदत लीडर बनने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाएं हैं। कुशल मैनेजमेंट के लिए इन चीजों से हर हाल में दूर रहना बेहद जरूरी है। तभी उसकी मेंटल हेल्थ दुरुस्त होगी। गीता में कृष्ण ने इस तरह के तमाम दुर्गुणों से हमेशा बचने का उपदेश दिया है। –मुकेश सिंघानिया 

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