भ्रष्ट, दुष्ट दानवों को अमरता का वरदान प्राप्त है

हर आश्रम में एक परम्परा होती है, गुरु की प्रतिमा को स्नान करवाने का, यहाँ भी है | तो हर संन्यासी का कर्तव्य होता है कि वह हफ्ते में एक बार गुरु की प्रतिमा को विधिवत स्नान करवाए | लेकिन मैंने आज तक स्नान नहीं करवाया |

इस कारण आश्रम के सभी भक्तों और संन्यासियों से लेकर ट्रस्टियों और ग्रामीणों की नजर में अधार्मिक व्यक्ति हूँ | तो मुझे अक्सर किसी न किसी बहाने से उस दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाता है, जिसे आश्रम की परम्परा निभाना कहा जाता है | लेकिन शब्दों से खेलने की तो हमें बचपन से ही बीमारी लग चुकी थी, तो कौन किस उद्देश्य से कौन सी कहानी सूना रहा है, तुरंत समझ में आ जाता है | मुझसे कहा जाता है कि ठाकुर का स्नान करवाने से परमसुख की अनुभूति होती है, अध्यात्म की महान उपलब्धी होती है….और मेरा प्रश्न होता है कि कोई एक व्यक्ति ऐसा दिखा दीजिये जिसने ठाकुर को स्नान करवाया और उसे परम की उपलब्धि हो गयी ?

फिर मैं अगला प्रश्न करता हूँ कि आप लोग तो इतने बरसों से नहला-धुला रहे हैं, क्या उपलब्धि हुई ? अभी भी दिन रात पैसा पैसा करते रहते हैं, अभी भी सत्ता, पावर, नौकर-चाकर की कामना पाले बैठे हैं, अभी भी ठाकुर को नहलाने को लेकर नियम कानून बनाये बैठे हैं.. किसी के कमर में दर्द होता है, या किसी के पैर में दर्द होता है तो किसी दूसरे की ड्यटी लगा देते हैं | लेकिन उसी कमर दर्द और पैर दर्द में भी स्वयं नहाने से नहीं चूकते…. यह कैसी भक्ति व श्रृद्धा है ? फूल लाने के लिए किसी को ड्यूटी दे दी, भोग के बर्तन धोने की ड्यूटी किसी दूसरे को….यह कैसी श्रृद्धा है ? यदि वास्तव में इन सब कर्मकांडों से कोई सुख या परमशांति की अनुभूति होती, तो क्या आप किसी और को करने देते ?

आप लोगों की ठाकुर के प्रति कोई भक्ति या श्रृद्धा नहीं है.. हाँ श्रृद्धा है आश्रम की सत्ता और पैसे के प्रति | जेब में पैसे आते ही सारे दुःख-दर्द गायब हो जाते हैं,  दुनिया भर की सैर हो जाती है और मुझे ठाकुर को स्नान करवाने से परम की शांति का पाठ पढ़ा रहे हैं ? अभी तीन महीने मेरे पास भी सत्ता थी, सारा पैसा भी मेरे पास था, तब आप लोगों की नींद उडी हुई थी… दिन में चार बार फोन करके हिसाब पूछा करते थे…. और आपके मुखबिर मेरे खिलाफ खबर उड़ाते कि मैं पैसे बर्बाद कर रहा हूँ…… तो कहाँ की श्रृद्धा कहाँ की भक्ति ?

मेरे पास पैसे होते हैं तो भी मेरी जीवन शैली में कोई परिवर्तन नहीं आता, और खाली जेब रहता हूँ तब भी कोई परिवर्तन नहीं आता | क्योंकि पैसा और सत्ता मेरे जीवन का आधार नहीं है, लेकिन आप लोगों के जीवन का आधार पैसा ही है… बस ढोंग करते हैं ठाकुर के प्रति भक्ति का | आज तक एक भी ठाकुर दयानंद देव का अनुयाई ऐसा नही मिला जिसे यह पता हो कि ठाकुर का मिशन क्या था और न ही कोई अनुयाई ऐसा मिला जो उस मिशन को आगे बढ़ा रहा हो |

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तो पूजा पाठ, कर्मकांड जो आप लोग कर रहे हैं, उसका ठाकुर से कोई लेना देना नहीं है, यह सब वैदिक ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई प्रथा है | ठाकुर ने जो शिक्षा दी उसके अनुरूप तो कोई चल ही नहीं रहा, कोई उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ही नहीं रहा… जो कुछ कर रहे हैं वह सब वही है, जो लोग अन्य देवी देवताओं के नाम पर करते फिरते हैं बिना यह जाने कि उन देवी-देवताओं की आकृति व कहानियों से विद्वानों ने क्या प्रेरणा या शिक्षा देनी की कोशिश की |

जैसे कि आज काली पूजा है और इस पूजा के द्वारा समाज को यह शिक्षा देने का प्रयास किया गया कि, हर जमाने, हर समाज में रक्तबीज होते हैं | चलिए पहले रक्तबीज की कहानी सुनलीजिये.. फिर आगे चर्चा करता हूँ….

रक्तबीज एक ऐसा दानव था जिसे यह वरदान था की जब जब उसके लहू की बूंद इस धरती पर गिरेगी तब तब हर बूंद से एक नया रक्तबीज जन्म ले लेगा जो बल , शरीर और रूप से मुख्य रक्तबीज के समान ही होगा |

अत: जब भी इस दानव को अस्त्रों ,शस्त्रों से मारने की कोशिश की जाती , उसके लहू की बूंदों से अनेको रक्तबीज पुनः जीवित हो जाते | रक्तबीज दैत्यराज शुम्भ और निशुम्भ का मुख्य सेनानायक था और उनकी सेना का माँ भगवती के विरुद्ध प्रतिनिधित्व कर रहा था |

शिव के तेज से प्रकट माहेश्वरी देवी , विष्णु के तेज से प्रकट वैष्णवी , बह्रमा के तेज से बह्रमाणी भगवती के साथ मिलकर दैत्यों से युद्ध कर रही थी | जब भी कोई देवी रक्तबीज पर प्रहार करती उसकी रक्त की बूंदों से अनेको रक्तबीज पुनः जीवित हो उठते | तब देवी चण्डिका ने काली माँ को अपने क्रोध से अवतरित किया | माँ काली विकराल क्रोध वाली और उनका रूप ऐसा था की काल भी उन्हें देख कर डर जाये |

देवी ने से कहा की तुम इस असुर की हर बूंद का पान कर जाओ जिससे की कोई अन्य रक्तबीज उत्पन्न ना हो सके | ऐसा सुनकर माँ काली ने रक्तबीज की गर्दन काटकर उसे खप्पर मे रख लिया ताकि रक्त की बूँद नीचे ना गिरे और उसका सारा खून पी गयी , बिना एक बूँद नीचे गिरे | जो भी दानव रक्त से उनकी जिह्वा पर उत्पन्न होते गए उनको खाती गई | इस तरह अंत हुआ रक्तबीज और उसके खून का |

यह कहानी तो आप सभी ने पढ़ी ही होगी और सभी ग्रंथों में विभिन्न रूपों व भावों से कही गयी है | लेकिन बहुत ही कम लोग हैं जो यह समझ पाए कि यह कहानी क्यों गढ़ी गयी, क्यों माँ काली की कल्पना की गई…..

नास्तिकों और निराकार उपासकों के अनुसार तो यह सब ढोंग है, पाखण्ड है क्योंकि वे ही शायद विश्व में ऐसी प्रजातियाँ हैं जो पाखंड नहीं करती | क्योंकि वे उसे पूजते हैं, जिसे कभी देखा ही नहीं, उसकी आराधना करते हैं जिसे कभी जाना ही नहीं, उन ईश्वरीय किताबों को महत्व महत्व देते हैं, जिसका कोई अनुभव ही नहीं, कोई ज्ञान ही नहीं | नास्तिक भी दूसरों के अनुभवों को रटे चले जा रहे हैं, खुद कोई अनुभव लिया ही नहीं |

लेकिन मूर्ती पूजा तभी तक ढोंग है, जब तक उसे कर्मकांड समझकर किया जा रहा है | जब तक मूल भाव को न समझा जाए, तब तक सारे पूजा-पाठ व्यर्थ है |

तो माँ काली की पूजा यह समझाने के लिए है कि समाज में रक्तबीजों की कोई कमी नहीं है, एक मरता है तो सौ पैदा हो जाते हैं | और जितने भी भ्रष्ट, दुष्ट प्रवृति व प्रकृति के व्यक्ति यानि राक्षस, दानव, असुर या दैत्य आदि होते हैं, वे हमेशा ही बलशाली होते हैं, शासक ही होते हैं और निर्बलों असहायों पर वे शासन करते हैं | व्यावहारिक जीवन में भी हम यही देखते हैं कि दुष्ट, अपराधी प्रवृति का व्यक्ति ही सत्ता सुख पाता है और नेक व्यक्ति को न समाज में सम्मान मिलता है और न ही सत्ता में, उसे या तो उठाकर बाहर फेंक दिया जाता है दुष्टों द्वारा, या फिर उसकी हत्या ही कर दी जाती है | और यह भी हम देखते हैं कि जो दुर्बुद्धि होता है, वे विवेकवान को जिस आरोप में घेरता है, वही कार्य जब वही करता है, तो समाज मूकदर्शक बना देखता रहता है | यानि समाज हमेशा दानवों का दास ही रहा क्योंकि दानव बाहर नहीं भीतर है | हमारा लोभ, स्वार्थ ही वह दानव है जो हमें गुलाम बना देता है और हमारी इसी कमजोरी के कारण बाहरी दानव हमें अपना गुलाम बना लेते हैं | हम जानबूझ कर इन्हें  ही वोट देते हैं, इन्हें ही सत्ता सौंपते हैं… क्योंकि हम विवश हैं व्यक्तिगत स्वार्थो के कारण, लेकिन साथ ही हम यह आशा भी करते हैं कि कोई दुर्गा, काली आये और इन सबसे मुक्ति दिलाये | तो इन भ्रष्ट, दुष्ट दानवों को  अमरता का वरदान प्राप्त है यानि किसी भी युग में इन भ्रष्टाचारियों, अपराधियों, दुष्टों से मुक्ति नहीं मिलेगी | आप घर से बाहर निकलेंगे और आप पायेंगे कि हर तरफ ये रक्तबीज बिखरे पड़े हैं… इन सब से स्वयं को बचाने के साथ साथ दूसरों को भी इनसे राहत दिलाने का संकल्प लेना ही माँ काली की साधना है | यह साधना सर्वाधिक कठिन साधना है, और इस साधना में अस्त्र-शस्त्र से आहत होने या अकालमृत्यु तक की सम्भावना रहती है | इसलिए इस साधना को करने से लोग बचते हैं और जय जय करके शॉर्टकट मारने की कोशिश करते हैं |

आज काली-उपासकों को आप देखें तो उनमें और अन्य निराकार या साकार उपासकों में कोई अंतर नहीं है  | माँ काली कि उपासना के साथ माँसाहार भी इसलिए ही जुड़ा है, ताकि कल हथियार चलाना पड़े तब हाथ ना काँपें | कल किसी का खून देखकर बेहोश न हो जाएँ | सारे कर्मकांडों और पूजा-पाठ का उद्देश्य यही है कि दुष्टों के विरुद्ध अभियान चलाने वाले काली-उपासक किसी भी परिस्थिति में भयभीत न हों | और रक्तबीज यानि ऐसी मानसिकता, जो दूसरों को दुखी-पीड़ित देखकर प्रसन्न होती है, वह न अपने भीतर जन्म ले सके और न ही अपने आसपास | सदैव अपने बच्चों को भी ऐसे ही संस्कार देना, ताकि वे सदैव परोपकार को महत्व दें और व्यक्तिगत स्वार्थ में किसी ऐसे कार्य में संलग्न न हों, जिनसे मानव जाति व सृष्टि की हानि होती हो |

रक्तबीज की कहानी से यह समझाने का प्रयास किया गया, कि यदि दुष्टों को पनपने का अवसर मिला, उनके लिए भूमि उपलब्ध करवाई गयी, तो वे बड़ी तेजी से बढ़ेंगे.. क्योंकि रक्तबीज का वह रक्त हर मानव में है, बस अवसर की ही प्रतीक्षा में हैं | जिसे अवसर मिलेगा, वही रक्तबीज बन जायेगा | इसलिए ऐसा वातावरण ही न बनने दें कि रक्बीज जन्म ले सके |

तो माँ काली की अराधना अवश्य कीजिये, किसी भी गुरु या ईष्ट को स्नान आदि अवश्य करवाइए, लेकिन मूल उद्देश्य को समझिये | यह जानने का प्रयास कीजिये कि उनका मिशन क्या है, वे क्यों आये थे इस धरा में और क्या सन्देश देकर गये थे | जब तक आप उनके दिखाए मार्ग पर नहीं चलते, आगे नहीं बढ़ते.. तो सैंकड़ों जन्म उनकी प्रतिमाओं को नहलाते-धुलाते रहिये… पूजा पाठ करते रहिये, कर्मकांडों में उलझे रहिये… कोई लाभ नहीं होने वाला | लाभ तभी होगा जब आप यह मान लेंगे कि जिसे आप पूज रहे हैं, वह और कोई नहीं, आप स्वयं हैं | आपके भीतर ही माँ काली है, आपके भीतर ही गुरु हैं | द्वैत ही मिट जाना चाहिए.. तब जाकर आप कह सकते हैं कि आपने गुरुभक्ति निभाई, तब जाकर का सकते हैं कि आप सच्चे साधक हैं अपने ईष्ट के | वरना सिवाय नौटंकी के और कुछ नहीं | ~विशुद्ध चैतन्य

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