किले की सुरक्षा घंटी बजाकर

शिक्षक, धर्मगुरुओं संत-महंतों और विद्वानों का कार्य व कर्तव्य था कि समाज व राष्ट्र के हित व समृद्धि के लिए मार्गदर्शन करते नयी पीढ़ी का | लेकिन वे अपने कर्तव्यों से भटक गए और कठपुतली बन गए राजनेताओं, अपराधियों और देश के सौदागरों के | जो धर्म राष्ट्र को संगठित करने व आत्मनिर्भर होने में सहायक होता है, वही हमारे विनाश का कारक बन गये | वही माध्यम बन गए नागरिकों में फूट डालने में |

हिन्दू-मुस्लिम, ब्राह्मण-शुद्र, शाकाहारी-माँसाहारी, मराठी-बिहारी, उत्तरी भारत-उत्तरपूर्वी भारत-दक्षिणी भारत, साधारण जाति-अनुसूचित जाति, सामान्य सीट-आरक्षित सीट, उच्चवर्ग-निम्नवर्ग…. भाषाओँ की अलग तना-तनी है | शिक्षकों का कार्य था सभी को यह समझाते कि हमारा महान भारतवर्ष इतना विशाल है कि पूरी पृथ्वी कि संस्कृति व भाषा ही यहाँ समा गई है | हम सीरिया और इराक जैसे फुटकर राष्ट्र के नागरिक नहीं हैं कि दूसरों से घृणा करते फिरें | हमें एक दूसरे का सहयोगी होकर राष्ट्र के उत्थान के लिए कार्य करना चाहिए | लेकिन वे पढ़ाने लगे कि अंग्रेजी से ही भविष्य है अमेरिका ही जीवन का उद्देश्य है, भारत तो भिखमंगों का देश है….

धर्म गुरु लग गए साईं के मंदिर में चढ़ रहे चढ़ावों के हिसाब किताब रखने, हिन्दुओं को मुस्लिमों के विरुद्ध और मुस्लिमों को हिन्दुओं के विरुद्ध भड़काने | भूल गये कि वे सबसे प्राचीन धर्म के धर्मगुरु हैं तो कम से १४०० साल पहले आये सम्प्रदाय के गुरुओं से तो अधिक ज्ञान और अनुभव रखते हैं | वे अपने शास्त्रों को नहीं समझ पाए इसलिए वे उपद्रव करते हैं लेकिन आप तो समझे हुए थे अपने शास्त्रों को…फिर क्यों उनकी नकल पर उतर आये ? क्यों हर विवाद को साम्प्रदायिक और राजनैतिक रंग दे दिया जाता है ?

अब मेरे जैसा कोई यह सब कहता है तो समझाने चले आते हैं कि सन्यासी को ईश्वर पर ध्यान लगाना चाहिए, सांसारिक बातों से दूर रहना चाहिए, फेसबुक नहीं चलाना चाहिए, समाचार नहीं पढना चाहिए, कीर्तन करना चाहिए, घंटे-घड़ियाल बजाना चाहिए….. आदि इत्यादि | इस बात पर एक छोटी सी कहानी याद आयी….

कई हज़ार साल पहले की बात है | किसी देश में एक बहुत ही सुरक्षित किला था जिसमें कई सौ सैनिक रहते थे और उनके उस किले की वजह से दुश्मन उस देश पर जब कभी भी हमला करता था तो मुँह की खानी पड़ती थी |

एक दिन शत्रु देश का सेनापति तांत्रिक का भेष धरकर उस किले में पहुँचा | सैनिक उसे पहचान नहीं पाए और बहुत ही आवभगत की उसकी | उसने कई चमत्कार दिखाए जैसे भभूत निकालना, हवा में सेब पैदा कर देना, टोपी से मुर्गी के चूजे निकालना आदि | सभी उससे बहुत ही प्रभावित हुए और उन्होंने किले को और अधिक सुरक्षित रखने के लिए कोई उपाय बताने के लिए उससे कहा |

तांत्रिक तो यही चाहता भी था उसने झट से एक घंटी निकाल कर दिखाई और कहा इस घंटी कि ही तरह सभी के पास एक एक घंटी होनी चाहिए और अमास्या की रात को आप सभी एक जगह खुले मैदान में बैठकर बजाओगे और ईश्वर का नाम जपोगे तो ईश्वर स्वयं प्रकट हो जायेंगे | ठीक वैसे ही जैसे भभूत और सेब प्रकट हुए थे | फिर आप उनसे वे सारी शक्तियां मांग लेना जो आपको चाहिए | सभी को बात जंच गयी और तांत्रिक उनसे विदा लेकर निकल गया वहाँ से |

अमावस्या की रात सभी के पास घंटी थी और सभी किले के बीचों बीच मैदान में बैठकर घंटी बजाते हुए ईश्वर का जाप करने लगे | आधी रात के समय अचानक उन्हें आवाज सुनाई दी कि आप लोगों कि पूजा सफल हुई और अब आप सभी को ईश्वर के पास अभी ही जाना होगा | सभी ने आँख खोली तो देखा वही तांत्रिक खड़ा था लेकिन दुश्मन देश के सेनापति के भेष में | वे एक साथ बोले यह क्या मजाक है और वे अपने तलवार लेने के लिए लपके | लेकिन पीछे खड़े दुश्मन सैनिकों ने उनके सर धड से अलग कर दिए |

इसी प्रकार आज के ज्ञानीजन सभी नागरिकों को घंटी बजाने की सलाह देते हैं या फिर ईश्वर का नाम जपने की | लेकिन राष्ट्र, समाज के जागरूकता के लिए कोई कुछ कहने लगता है तो वह अधार्मिक हो जाता है | ईशनिंदक बन जाता है | धर्म/सम्प्रदाय का अपमान होने लगता है | –विशुद्ध चैतन्य

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