लोग शरीर से बड़े दीखते ज़रूर हैं, लेकिन वास्तव में बड़े नहीं हो पाते

मेरे छोटे भाई के लिए शायद मैं एक आदर्श रहा था | कई बार ऐसा लगता था कि वह मेरी नक़ल कर रहा है और मैं चिढ़ कर कहता था, “तुम मेरी नक़ल करके कहीं नहीं पहुँचोगे | अपने आपको जानने की कोशिश करो….” मेरे मित्र कभी भी नहीं जान पाते थे फ़ोन पर कि हम दोनों में से कौन बात कर रहा है क्योंकि आवाज और स्टाइल भी एक ही था हम दोनों का |

आज उसकी एक बात मुझे याद आ गयी कि वह अक्सर कहा करता था कि लोग शरीर से बड़े दीखते ज़रूर हैं, लेकिन वास्तव में बड़े नहीं हो पाते | और यह बात उसकी इतनी सही थी कि मैंने भी बहुत ही कम लोगों में बड़प्पन देखा | हर कोई किसी न किसी बड़े की खोज कर रहा है | बहुत ही कम लोग हैं जो स्वयं के भीतर खोजने निकलते हैं |

लोग कहते हैं कि मैं जो कुछ कहता हूँ उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, राजीव दीक्षित जैसा कोई होना चाहिए | अब राजीव जी को जो करना था कर दिया, मुझे क्यों राजीव दीक्षित बनाने पर तुले हुए हैं लोग ? जब कृष्ण और राम आकर समझा गये, तब समझ में नहीं आया, विवेकानंद और ओशो समझा कर चले गये तब समझ में नहीं आया, तो मेरे समझाने से भला कैसे समझ में आ जाएगा ?

ओशो ने कहा था कि समाज सुधार के लिए निकले लोग भ्रम में हैं कि वे कुछ बदल सकते हैं | समाज तो वैसा ही रहेगा जैसा है, आदि काल से वैसा का वैसा ही है कुछ नहीं बदला | बस हम अपने को बदल लेते हैं तो समाज बदला हुआ दिखने लगता है |

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मेरे भाई ने भी ऐसा ही किया और हो सकता है वह आज अपनी ही दुनिया में खुश हो, जैसे मैं | क्योंकि हम दोनों को ही वह समाज वह दुनिया कभी रास नहीं आई जिसके पीछे दुनिया पागल है | ये नकली चेहरे लगाए लोग, ये विद्वानों की दुनिया जिसमें विद्वान् सदियों में कभी कभार ही आते हैं और लोग उन्हें ज़हर दे देते हैं या देश निकाला | समाज तो अपने ढर्रे पर चलता ही रहेगा उसे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला | जैसे राम और कृष्ण को भगवान् बना दिया कि काम तुम कर सकते हो हम नहीं कर सकते क्योंकि तुम भगवान् हो और हम इंसान | उनकी सारी शिक्षा केवल रटने तक ही सीमित रह गयी और आचरण में कभी किसीने उतारने का प्रयत्न ही नहीं किया | क्योंकि यदि को राम या कृष्ण के आदर्श पर चलने लगेगा तो लोग कहेंगे कि भगवान् बनने की कोशिश कर रहा है | इसलिए जिसके आदर्शों पर न चलना हो उसे भगवान् बना दो बस… समस्या खत्म !

फिर ये लोग बड़े कहलाते हैं, बुद्धिमान कहलाते हैं, विद्वान् कहलाते हैं…. क्योंकि ये लोग भगवान् को पूजते हैं…. क्योंकि ये उनके आदर्शों पर चल कर उनका अपमान नहीं करते बल्कि खुद को ही भगवान् मान बैठते हैं | फिर ये फतवा जारी करते हैं और बाकी सब इनके जयकारा लगाते हैं क्योंकि फतवों से उनके स्वार्थों की पूर्ती होती हैं | फिर ये लोग साईं को मंदिरों से बाहर फेंकते हैं क्योंकि इन बड़े लोगों के भगवान् मंदिरों में कैद हैं और वहां किसी फ़कीर का क्या काम भला ?

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भाई की शायद ठीक ही कहता था कि लोग बड़े दीखते जरुर हैं लेकिन बड़े होते नहीं है | उन्हें गुड्डे गुड़ियों का खेल आज भी उतना ही रास आता है, जितना कि बचपन में रास आता था | वे आज भी ऐसी ऐसी मुर्खता करते हैं कि बच्चे भी उन्हें बच्चा समझ कर माफ़ कर देते हैं | – विशुद्ध चैतन्य

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