क्या सारा दोष पुरुष की कामुक मानसिकता का ही है ?

“स्त्रियों के प्रति बढ़ते अत्याचार के लिए न तो परिधान दोषी है, न ही अश्लीलता परोसती फिल्में और न ही समाज | सारा दोष है पुरुष की मानसिकता का | क्योंकि पुरुष स्त्रियों को अपना गुलाम मानता है और यह मान्यता वह जन्मजात लेकर आता है | वह पैदा ही होता है स्त्रियों पर अत्याचार करने के लिए….उसे फाँसी चढ़ा दो, गुप्तांग काट दो, सड़क पर संगसार कर दो…..क्योंकि पुरुष ही स्त्रियों का शत्रु है ” -अत्याधुनिक समाज की मानसिकता |

आज कोई भी समाचार पत्र उठाओ और बलात्कार की खबर न हो ऐसा नहीं होता | पहले हम बलात्कार की खबर सुनते अवश्य थे लेकिन इतनी विभत्सता और क्रूरता बहुत ही कम सुनने और देखने को मिलती थी, जितनी की आज देखने को मिलती है | आज तो बलात्कारी मानो प्रचार प्रसार के लिए ही यह सब कर रहा है ऐसा लगता है | अचानक एक ही जैसी घटनाओं के बढ़ने के साथ ही ऐसा भी  लगने लगा है कि शायद को बलात्कार माफिया या गेंग इस काम को अंजाम दे रहे हैं | कभी कभी सोचता हूँ कि क्या पुरुष वास्तव में इतना गिर गया है या मानसिक रूप से इतना विकृत हो गया है ? क्या भारत में कोई ऐसी संस्था है जो जाकर बलात्कारियों के मनोविज्ञान पर अनुसंधान कर रही हो ? क्या किसीने जानने का कभी प्रयास किया कि क्यों वह पुरुष इतना क्रूर हो गया और क्यों मानवता से दूर हो गया ?

एक ओर बलात्कार पीड़िता की मृत्यु से पहले हुई पीड़ा और आतंक की कल्पना से ही आत्मा तक काँप जाती है और ऊपर पुलिस और मीडिया जब उस पीडिता की नग्न शरीर को लोगों के घर घर तक परोसने कर पूण्य कमाती है, तब लगता है कि शायद स्त्रियों के नग्न शरीर की कीमत मरने के बाद भी उतनी ही रहती है जितने कि जीते जी रही होगी | लेकिन क्या स्त्रियों का सम्मान ऐसे ही हो सकता है ? स्त्री केवल भोग के लिए ही है ?

न्याय प्रणाली भी ऐसी कि न्याय कम और नौटंकी अधिक लगता है | कई कई साल तक न्याय के नाम पर वकीलों के लिए कमाई का साधन बन जाता है पीड़ित | तीन चार साल तो कम से कम लगते हैं किसी पीडिता को न्याय मिलने में और तब तक पेशियाँ और हर बार वही वही प्रश्न और वही उत्तर | बचाव पक्ष के वकीलों के अपने अपने हथकण्डे केस को खींचने और दोषियों को बचाने के लिए | निचली अदालत में पीडिता जीत भी गई तो फिर उससे ऊपर की अदालत और फिर और ऊपर और फिर राष्ट्रपति महोदय बैठे होते हैं अपराधी के संरक्षक बनकर | कई बार इस बात की गारंटी भी नहीं होती कि पुलिस ने वास्तविक अपराधी को ही पकड़ा है जैसे अभी हाल ही में एक गार्ड को दोषी ठहराया गया लेकिन उसकी पत्नी ने कहा कि उसने अपने बेटे की जान बचाने के लिए दबाव में अपराध स्वीकार किया है | एक वीभत्स बलात्कार और हत्याकांड और वह भी एक अकेला व्यक्ति ?

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उपरोक्त सारी बातों पर यदि गौर करें तो स्त्रियों पर हो रहे अत्याचार का कारण केवल क्षणिक आवेग तो नहीं हो सकता | न ही केवल किसी अपराधिक मानसिकता के व्यक्ति की ही बात है | पूरा समाज और न्याय व सुरक्षा व्यवस्था ही कटघरे में खड़ा हो जाता है | वे लोग भी कटघरे में आ जाते हैं जो जुलुस निकालकर अपराधी को कठोर सजा की मांग कर रहे होते हैं | क्योंकि स्त्री और पुरुष से मिलकर ही समाज बनता है और एक को दूसरे का शत्रु बनाने का काम तो यही लोग कर रहें हैं | कभी किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की सहायता करना पुन्य मानने वाले भारतीयों को आज दुर्घटना पीड़ित की सहायता से दूर भागने की मानसिकता बनाने में हमारे न्यायप्रणाली का ही दोष है | पीड़ित की सहायता करने की सजा के रूप में सालों साल चलने वाले कोर्ट में गवाही दे दे कर वह व्यक्ति उस दिन को कोसता है जब उसने सहायता को परम धर्म माना था | कानून समाज को यह सन्देश देने में सफल रहा कि सेवा करने से पुन्य नहीं मिलता बल्कि कोर्ट के चक्कर में जीवन व्यर्थ हो जाता है |

इस तरह न्याय व्यवस्था अपनी दूकान आराम से चला रही है और लोग जानते हुए भी कुछ नहीं कर सकते क्योंकि कानून के अपने दांव पेंच हैं और अपने लोग हैं | इसलिए आज प्रत्यक्षदर्शी मिलना कठिन हो गया | मिल भी गया तो उसकी सुरक्षा की कोई जिम्मेदारी नहीं लेता | आये दिन हम पढ़ते हैं कि गवाह की हत्या कर दी गयी या किडनैप हो गया… या दबाव में मुकर गया |

कुछ लोग बहुत ही तर्कवादी होते हैं कि पाँच साल की बच्ची से बलात्कार हुआ, या ६० साल की बुढ़िया से बलात्कार हुआ तो वह कौन सा शरीर का प्रदर्शन कर रही थी ? ….बलात्कार का कारण महिलाओं की नग्नता नहीं, पुरुष की घटिया मानसिकता है…..महिलाओं को क्या पहनना है क्या नहीं, वह मत सिखाओ अपनी सोच में बदलाव लाओ….जैसे महान तर्क दिए जाते हैं |

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अब जो नारीवादी लोग इस तरह के तर्क देते हैं, उनसे मेरा प्रश्न है की तुम लोगों ने अपनी मानसिकता का इलाज क्यों नहीं करवाया ? क्यों तुम्हें स्त्रियों के शरीर पर कपड़े अच्छे नहीं लगते ? क्यों तुम नंगी स्त्रियों की तस्वीरें खींचने के लिए लालायित रहते हो और नग्नता को अजंता एलोरा के नाम पर परोस रहे हो ? क्यों ऊप्स मोमेंट्स मीडिया में सुर्खियाँ बटोरता है ? …..क्यों ?

सारा दोष पुरुष के कुत्सित मानसिकता को देने वाले जरा यह बताएं कि यह कुत्सित मानसिकता की नींव रखता कौन है ? स्त्रियों को आईटम गर्ल बनाने वाले क्या यह नहीं सोचते कि एक बच्चे की मस्तिष्क में क्या प्रभाव पड़ता होगा जब वह अंगप्रदर्शन कर रही स्त्री को देखता होगा तब ? क्या आप उससे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वह बड़ा होकर स्त्रियों के प्रति सम्मान का भाव रख पायेगा ? स्त्रिर्यों को पुरुषों जैसे काम करने के लिए उकसाने वाले आरक्षण क्यों माँगते हैं स्त्रियों के लिए बसों में या सार्वजनिक स्थलों में ? समाज ने शिक्षा में ऐसा क्या परिवर्तन किया है कि स्त्रियों को पुरुष अपना विरोधी न समझ कर सहयोगी समझे ? क्या समाज दहेज़ के लिए स्त्रियों को प्रताड़ित करने वालों का बहिष्कार करती है कभी ?

समाज स्वयं तो कभी स्त्रियों का सम्मान कर नहीं पाया और उसी का परिणाम अब सामने आ रहे हैं, जब अपनी बहन, बेटी और माँ को भी नहीं छोड़ रहे ये कुंठित और मानसिक रूप से विकृत लोग | लेकिन क्या कानून के आढ़ में समाज अपनी असफलता को छुपा पायेगा ? क्या समाज का अपना कोई दायित्व नहीं बनता ?

चलिए छोडिये सब कुछ क्या रक्खा इन सब पचड़ों में पड़ने से… कौन सी हमारी बेटी या बेटा मुसीबत में पड़ रहा है, जिसका है वह जाने | एक कहानी सुनिए बिलकुल अभी अभी दिमाग में आई है और बिलकुल ताज़ा है |

एक दिन एक सिपाही अपने खोजी कुत्ते के साथ एक गाँव में आया रहने | पहले वह शहर में रहता था इसलिए गाँव का मकान में कभी आना नहीं हुआ था और अब आया तो अपने कुत्ते को भी ले आया था | उस कुत्ते की खासियत थी कि वह चोरों को पकड़ने में पुलिस की सहायता करता था | और उसकी तनखा सिपाही से भी अधिक थी | गाँव में बड़ी जिज्ञासा थी उस कुत्ते के विषय में | खैर धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया और सिपाही भी अब कुत्ते को खुला छोड़ देता था क्योंकि गाँव में सभी से कुत्ते का परिचय हो गया था और कुत्ता किसी को कोई नुकसान भी नहीं पहुँचाता था |

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एक दिन गाँव का एक बच्चा दौड़ता हुआ उधर से गुजरा तो कुत्ता उसके पीछे दौड़ पड़ा | लड़का डर कर और तेज दौड़ा तो कुते ने झपट कर उसे गिरा दिया | तब तक गाँव के कुछ लोग आ गये और कुत्ते से उस लड़के को छुड़ा लिया | सभी शिकायत लेकर सिपाही के पास पहुंचे और बोले कि अपने कुत्ते को बाँध कर रखो यह हमारे बच्चों पर ही हमला कर देता है | सिपाही बोला कि देखिये अपने बच्चे को समझा दीजिये कि इसके सामने से दौड़ कर न जाया करें यह भड़क जाता है | गाँव वाले बोले अरे वाह अपने कुत्ते को सम्भाल नहीं सकते और हमें सिखा रहे हो को बच्चों को क्या सिखाना है और क्या नहीं ? हमने पहले कभी बच्चे पाले नहीं क्या ?

इसी प्रकार हर आये दिन कोई न कोई उस कुत्ते का शिकार बनने लगा और अंत में सिपाही को विवश होकर कुत्ते को बाँध कर ही रखना पड़ा | लेकिन गाँव के बच्चों ने कुत्ते के सामने से जान बुझ कर दौड़ना नहीं छोड़ा और अब गाँव के लोग भी रोज आ जाते उसके पास और किसी न किसी को दौड़ाते उसके सामने से और कुत्ता उछलता और गुस्से में जंजीर में छट पटाता और सभी तालियाँ बजाते |

यही हाल पुरुषों के साथ भी हो रहा है | पुरुषों के लिए जंजीर तैयार की जा रही है और स्त्रियों के कपड़े उतारे जा रहें हैं नारी स्वतंत्रता के नाम पर | नारी समझ रही है कि उसका सम्मान हो रहा है जबकि ये शरीर के भूखे नारी वादी लोग नारी मुक्ति के नाम पर कपड़ों से ही मुक्त करवाने पर तुले हैं नारी को | -विशुद्ध चैतन्य

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