मुझे वर्तमान सैनिक शहीद नहीं जान पड़ते

जब भी किसी सैनिक के शहीद होने की खबर आती है, दुःख तो होता ही है क्योंकि सैनिकों से हम सभी का गहरा लगाव रहता है | और यह लगाव कोई आज का नहीं, तभी से है, जब से मानव जाति शत्रुओं से अपनी भूमि, स्त्री व धन-संपत्ति की सुरक्षा के लिए युद्धरत हुआ | लेकिन तब और अब में बहुत अंतर है यह भी हमें समझ लेना चाहिए |


तब प्रोफेशनल सैनिक नहीं हुआ करते थे, बल्कि वही नागरिक होते थे, जो कृषि, व्यवसाय आदि में व्यस्त रहते थे | उन्हीं में से जो क्षत्रिय वर्ण (युद्ध में रूचि रखने वाले) होते थे, वे युद्ध के लिए रणभूमि में जाते थे | वे कृषि भी करते थे और नियमित युद्धाभ्यास भी | एक फसल कट जाने के बाद जो समय व आराम उन्हें मिलता था, उसका सदुपयोग करते थे शस्त्र विद्या व युद्ध कौशल सीखने में | चूँकि कृषि में शारीरिक श्रम बहुत अधिक होता था, तो इस कारण उनका शरीर स्वाभाविक रूप से ही हृष्ट-पुष्ट रहता था |

तो जब ये लोग युद्ध पर जाते थे, तब वे जानते थे कि शत्रुओं ने आक्रमण किया है और अपने प्राणों को गँवाकर कर भी अपने लोगों की रक्षा करनी है | इनमें से जो मारे जाते थे रणभूमि में, वे वीरगति को प्राप्त बलिदानी कहलाते थे | लेकिन फिर जब लगातार कई शत्रुओं द्वारा राज्य को क्षति पहुँचने लगी होगी, तब सैनिक (आजीविका के लिए युद्ध व हत्याएं करनेवाला) रखने का चलन शुरू हुआ | इन्हें वेतन में अन्न, वस्त्र व धन आदि दिए जाते थे और उसके बदले उन्हें अपने परिवारों से दूर रहना पड़ता था |

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यहाँ यह भी समझ लें कि सैनिक और प्रहरी दो अलग शब्द हैं और दोनों के कार्य एक नहीं हैं | सैनिकों को आदेश मिलने पर शत्रुओं पर आक्रमण करना होता था, जबकि प्रहरी तभी आक्रमण करता था किसी पर, जब कोई सीमा का उल्लंघन करता था | यानि प्रहरी अपनी सीमा पर रहता था और सीमा के बाहर जाकर आक्रमण नहीं करता था | उसी प्रहरी को हम आज गार्ड के नाम से जानते हैं |

चलिए यह तो हुआ संक्षिप्त विवरण सैनिक और प्रहरी का | लेकिन शहीद की बात जब हम करते हैं, तो मुझे वर्तमान सैनिक शहीद नहीं जान पड़ते, बल्कि नेताओं की लापरवाही से मारा गया प्रहरी ही जान पड़ता है | सैनिक व उसका परिवार यह जानता है कि उसने जो प्रोफेशन चुना है, उसमें शत्रुओं के हाथों मृत्यु भी हो सकती है | लेकिन क्षत्रिय गुणधर्म के कारण वे ऐसा प्रोफेशन चुनते हैं | यहाँ कोई विवशता नहीं है जैसे कि क्रांतिकारियों के साथ रही | यहाँ सीमा पर जो तनाव है, जो उपद्रव है, वह इसलिए है, क्योंकि शासकवर्ग योग्य नहीं हैं | कोई सैनिक सीमा पर खड़े खड़े ही मारा जाता है, अचानक आतंकी हमले में मारा जाता है… तो यह कोई गर्व करने वाली बात नहीं है | यह शर्म की बात है हम भारतीयों के लिए कि हम सदियों से अयोग्य नेताओं को चुनते आये | हम ऐसे नेताओं को चुनते रहे, जो व्यक्तिगत सुख व कुछ व्यवसायियों के पाले कठपुतलियों को सत्ता सौंपते आये | और ये लोग अपने कारोबार में व्यस्त हैं, न कि समस्याओं को सुलझाने में इनकी कोई रूचि है |

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तो जब हम किसी सैनिक के मारे जाने पर शोक प्रकट करते हैं, उसे शहीद कहते हैं, तो सबसे पहले हमें यह सोचना चाहिए कि वह शहीद राष्ट्र के लिए हुआ या राजनेताओं के स्वार्थ के लिए हुआ | सैनिक आज भी अधिकाँश किसानों के बेटे ही बनते हैं, किसी नेता या व्यापारी का बेटा नहीं | क्षत्रिय खून आज भी किसानों में ही बहता है और प्राचीन काल में भी | लेकिन व्यापारीवर्ग अपने लाभ के लिए क्षत्रियों की बलि चढ़ा रहा है | एक किसान और उसका बेटा, दोनों ही बर्बाद हो जाते हैं नेताओं, भूमाफियाओं, अपराधियों और व्यापारियों के आपसी गठबंधन के कारण | किसानो से उसका बेटा और जमीन दोनों ही छीन ली जाती है | और वह भी देश के नाम पर, लेकिन कोई व्यापारी अपनी भूमि का एक इंच नहीं देता देश के नाम पर | और यदि देगा भी तो मुनाफा सबसे उपर रखेगा |

इसलिए समाज को इस बात पर चिंतन-मनन करना चाहिए कि जो सैनिक बिना शत्रु देश के सैनिकों से युद्ध किये है, केवल आतंवादियों के ही हाथो मारे जा रहे हैं, तो उन्हें शहीद कहकर खुश होना चाहिए या फिर उन आतंकियों से युद्ध के लिए उनके मुख्य ठिकानों को ही ध्वस्त कर देना चाहिए | इन आतंकियों को जो भी पाल-पोस रहा है, सबसे पहले तो उसे ही ध्वस्त करना चाहिए | क्योंकि जो सैनिक मारे जा रहे हैं, वे मशीन नहीं, इंसान हैं | उनका भी अपना परिवार है, उसका भी कोई अपना कोई घर में प्रतीक्षा कर रहा होता है | यूँ बिना वजह शहीद बनाकर जनभावना से खिलवाड़ करना कोई अच्छी बात नहीं है | कहीं ऐसा न हो कि शहीद शब्द भी वैसे ही महत्वहीन बन जाये, जैसे राम, गाय, देशभक्ति, भक्त, नेता आदि शब्द बन गये | ~विशुद्ध चैतन्य

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किसी सैनिक या उसके परिवार को मेरे विचारों से भावनात्मक कष्ट पहुँचा हो, तो मैं उसके लिए क्षमा चाहता हूँ |

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